शनिवार, 5 फ़रवरी 2022

नक्षत्र और बीमारी

हर व्यक्ति के जन्म के समय सभी ग्रह किसी न किसी राशि और किसी नक्षत्र पर अवस्थित होते ही हैं किन्तु जन्म के समय चन्द्रमा जिस नक्षत्र सम्बंधी पर अवस्थित होता है उसे ही सबसे महत्वपूर्ण माना जाता हैं इसे जन्म नक्षत्र कहा जाता है । अब स्वाभाविक प्रश्न है कि आखिर चन्द्र नक्षत्र का ही प्रभाव सर्वाधिक क्यों पड़ता है ? इसकी सीधी सी वजह यह है कि सब आकाशीय पिंडो में चन्द्रमा हमारे सबसे नजदीक है अत: इसी का सर्वाधिक प्रभाव हमारे मन मस्तिष्क व स्वास्थ्य पर पड़ता है । नक्षत्रानुसार राशि व सौर-मण्डल के ग्रहों की स्थित राशि का मनुष्य के स्वाभाव चरित्र व स्वास्थ्य पर पड़ता हैं |

इस प्रकार नक्षत्रानुसार राशि व सौर मंडल ग्रहो की राशि का मनुष्य के स्वभाव चरित्र व स्वस्थ्य पर प्रभाव विशेष रहता ही रहता है और वह भी ग्रहों के अंश / शक्ति, स्थिति और दशा - अतर्दशा अनुसार घटता बढ़ता रहता है।

नक्षत्र और स्वास्थ्य : जन्म नक्षत्र से संबंधित स्वस्थ्य व रोगो  का विवरण नीचे प्रस्तुत हैं |

1) अश्विनी – इस नक्षत्र वालों को अनिद्रा,नकसीर,चक्कर आना,मूर्छा/बेहोशी,स्नायु शूल आदि होने की संभावना रहती हैं |

2) भरनी - इन्हे सिर दर्द,नेत्र पीड़ा,ज्वार,दिमागी बुखार तथा प्रजान संबंधी रोग होते हैं |

3) कृतिका – इस नक्षत्र के जातकों को कंठरोग (टांसिल डिपथीरिया आदि) अनिद्रा, सिर दर्द और पैतृक रोगों की संभावना रहती हैं ।

4) रोहिणी - इन्हे त्रिदोष संबंधी रोग,जोडो का दर्द, महिलाओं में मासिक धर्म सम्बन्धी रोग होते हैं। 

5) मृगशिरा   - कंठरोग, चर्मरोग, बुखार कधे-बाजू दर्द व गुप्त रोगों की संभावना रहती है।

6) आर्द्रा - कान पीड़ा, सर्व गात्र पीड़ा, ज्वर,अनिद्रा व त्रिदोष रोग की संभावना रहती है।

7) पुनर्वसु - ब्रोंकाइटिस,न्यूमोनिया,टांसिल्स/अपच की शिकायतें हो सकती है ।

8) पुष्य - पेट - अल्सर,श्वास-विकार,पीलिया जैसे रोग बहुतायत से हो सकते हैं।

9) अश्लेषा -  गैस विकार, अजीर्ण,पैरों के कष्ट,जोड़ों के दर्द, ज्वर आदि हो सकते हैं ।

10)  मघा - हृदय रोग और रीढ़ की हड्डी के रोग होते है ।

11) पूर्वाफाल्गुनी - हृदय रोग, उच्च रक्तचाप,अल्सर,बुखार होने की सम्भावना होती है ।

12) उत्तराफाल्गुनी - जातकों को आंत-सम्बन्धी विकार,डिसेन्ट्री, अपेंडिसाइटिस,सिर पीडा,हृदय रोग की संभावना रहती है ।

13) हस्त - कब्ज, अजीर्ण, पेट गैस अफारा,उदरशूल होते है ।

14)  चित्रा - मूत्र रोग,रक्तचाप,आंत,अल्सर,हर्निया बहुतायात से हो सकते है।

15) स्वाती - मूत्र मार्ग व पथरी का रोग,ल्यूकोडर्मा,ज्वर,हृदय पीडा प्रायः होती रहती है।

16) विशाखा - गुदामार्ग, हदय पीडा मधुमेह गर्भाशय/जनेन्दिय रोग की सम्भावना रहती होते है।

17) अनुराधा - कब्ज,बवासीर,कफ विकार,जनेन्द्रिय रोग,मासिक धर्म विकार व गुर्दा रोग होते हैं |

18) ज्येष्ठा - पित्तरोग, मस्तिक विकार,घाव,फोडे,नासूर,भगन्दर,फिस्टुला गर्भाशय का विकार होते है ।

19) मूल – इन नक्षत्र वालों को सन्निपात,स्नायु दुर्बलता,जांघ विकार आदि पाये जाते है।

20) पूर्वाषाढ़ा – सायटिका,कटिपीडा,गठिया,कफ विकार,कम्पन रोग, सिर की पीड़ा होने की सम्भावना रहती हैं |

21) उत्तराषाढा - जननांग विकार,लकवा,जोड़ों का दर्द,एग्जीमा जैसा चर्म रोग,धमनी विकार की संभावना रहती हैं |

22) श्रवण - सफेद दाग, अतिसार,प्लुरिसी,उदर विकार,टीबी रोग हो सकते है।

23) धनिष्ठा - रक्त विकार/साव, अतिसार कम्पन रोग, बैंक बोन्स घुटने व हृदय दुर्बलता की सम्भावना रहती है।

24) शतभिषा - हृदय रोग, गठिया, उच्च रक्ताचाप,लकवा,पैर विकार वायु रोग सम्भावित होते हैं |

25) पूर्वाभादपद - जातकों को त्रिदोष विकार,सिरदर्द, गुर्दे के रोग,यकृत विकार हर्निया,वमन, मासिक धर्म विकार,गुर्दा रोग,चिन्ता व्याकुलता देखी जाती है।

26) उत्तराभादपद - पीलिया, अतिसार ज्वर, वायुशूल गठिया एनीमिया,मिर्गी जैस एरोग हो सकते हैं |

27) रेवती - त्रिदोष विकार उरुशूल, कान विकार,गठिया,यकृत विकार तलुआ विकार प्रायः होते रहते हैं |

 ज्योतिष शास्त्र में सत्ताईस नक्षत्रों नवग्रहों और द्वादश राशियों के द्वारा रोग के सम्बन्ध में जानकारी प्राप्त की जा सकती हैं कालपुरुष के विभिन्न अंगों को नियंत्रित और निश्चित करने वाली राशियों ग्रहों से शरीर के किसी न किसी अंग पर रोग का जो प्रभाव पड़ता है उसे एक ज्योतिषी व चिकित्साविद ग्रह दान,जप औषधी के द्वारा इत्यादि ठीक कर सकता है क्योकि ज्योतिष विज्ञान का और चिकित्सा शास्त्र का सम्बन्ध प्राचीन काल से रहा है।

 

 

बुधवार, 2 फ़रवरी 2022

पंचांग मे करण

करण  

एक तिथि के आधे भाग को “करण” कहते हैं (एक तिथि मे दो करण होते हैं) इसे चन्द्र के भोगांश से सूर्य के भोगांश को घटाकर शेषफल को 6 अंशो से भाग देकर जाना जाता हैं |

करण = (चन्द्र भोगांश - सूर्य भोगांश) / 6अंश

करण मुख्यत: 11 होते हैं जिनमे 7 चर करण (बव,बालव,कौलव,तैतिल,गर,वनिज व विष्टि) तथा 4 स्थिर (शकुनि,चतुष्पाद,नाग व किन्तुघ्न) करण होते हैं | यह 7 चर करण एक महीने मे 8 बार आते हैं जबकि स्थिर करण 4 बार आते हैं जिनसे कुल 60 (7*8+4=60) करण हो जाते हैं |

करणो का क्रम - 1)बव, 2) बालव, 3) कौलव, 4) तैतिल, 5) गर, 6) वनिज, 7) विष्टि

8) शकुनि (कृष्णपक्ष की चतुर्दशी का दूसरा भाग),9) चतुष्पाद (अमावस्या का पहला भाग),10) नाग (अमावस्या का दूसरा भाग),11) किन्तुघ्न (शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा का पहला भाग)

किन्तुघ्न से गणना आरंभ करने पर 7 (चर करण) 8 बार पुनरावरत होते हैं अर्थात दोबारा आते हैं (शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से कृष्णपक्ष की चतुर्दशी तक) अंत मे तीन स्थिर करण (कृष्ण पक्ष चतुर्दशी के दूसरे भाग से शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा के पहले भाग तक) आते हैं |

आइए इसे एक उदाहरण से समझते हैं |

23-3-2010 को सूर्य भोगांश 11राशि 8अंश 14मिनट हैं तथा चन्द्र भोगांश 2राशि 2अंश 26मिनट हैं तो करण बताए ?

= (2राशि 2अंश 26मिनट) - (11राशि 8अंश 14मिनट)/12अंश

= (14राशि 2अंश 26मिनट) - (11राशि 8अंश 14मिनट)/12अंश

= 2राशि 24अंश 12मिनट /12अंश

= 84अंश 12मिनट /12 अंश  

= 7.01(अष्टमी तिथि )

करण = 84अंश 12मिनट /6अंश        

=14.02 (पंद्रहवा करण) जो की किन्तुघ्न शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से गिनने पर “विष्टि” करण हुआ |

यदि भोगांश अंतर 0 से 180 के बीच आए तो तिथि शुक्लपक्ष की तथा 180 से 360 के बीच आए तो तिथि कृष्ण पक्ष की होगी इसी प्रकार यदि तिथि 0.50 से पहले की हो तो दिन का पहला करण व तिथि 0.50 से अधिक की हो तो दिन का दूसरा करण होगा |

इस प्रकार हम पंचांग के पांचों तत्वो को गणितीय दृस्टी से निकाल कर मुहूर्त स्वयं प्राप्त कर सकते हैं |  

     

पंचांग मे योग

योग  

कुल योगो की संख्या 27 हैं जो सूर्य और चन्द्र के भोगांश से जुड़कर समन्वय बनाते हैं | 

योग ज्ञात करने के लिए सूर्य व चन्द्र के भोगांशों को जोड़कर 13अंश 20मिनट अर्थात 800 मिनट से भाग देते हैं,जो भागफल आता हैं उसमे एक जोड़ देते हैं |

यदि सूर्य का भोगांश 4राशि 23अंश 34मिनट हैं और चन्द्र का भोगांश 5राशि 16अंश 12मिनट हैं तो योग = (4राशि 23अंश 34मिनट +5राशि 16अंश 12मिनट) =10 राशि 9अंश 46 मिनट हुआ,इसे 13 अंश 20मिनट अर्थात 800 मिनट से भाग देने पर हमें 23॰2325 प्राप्त होता हैं |

{(10*30) + 9=309अंश 46मिनट/13अंश 20मिनट=(309*60)+46/800=18586/800=23.2325 }

इस 23 मे एक जोड़ने पर 24 हुआ जो की 24वा योग अर्थात “शुक्ल” योग हुआ |

योगो के नाम निम्न हैं |

1) विषकुंभ 10) गण्ड 19) परिधि

2) प्रीति 11) वृद्धि 20) शिव

3) आयुष्मान 12) ध्रुव 21) सिद्धा

4) सौभाग्य 13) व्याघात 22) साध्य

5) शोभन 14) हर्षना 23) शुभ

6) अतिगण्ड 15) वज्र 24) शुक्ल

7) सुकर्मा 16) सिद्धि 25) ब्रह्म

8) घृती 17) व्यतिपात 26) इंद्र

9) शूल 18) वरियान 27) वैधृति

आइए अब एक उदाहरण देखते हैं |

सूर्य भोगांश 11राशि 8अंश 14मिनट हैं तथा चन्द्र भोगांश 2राशि 2अंश 26मिनट हैं योग बताए ?

(सूर्य भोगांश व चन्द्र भोगांश) जोड़ने पर = {11राशि 8अंश 14मिनट+ 2राशि 2अंश 26मिनट}/13अंश 20मिनट = (13राशि 10अंश 40मिनट)/13राशि 20मिनट

=1राशि 10अंश 40मिनट/13अंश 20मिनट (12 राशियो से ज़्यादा होने पर 12 राशिया घटाए)

=(1*30)+10=40 अंश 40 मिनट =(40*60)+40/800=2440/800=3.05

=3+1=4 अर्थात चौथा योग जो की “सौभाग्य” नामक योग हुआ |

 

पंचांग मे नक्षत्र

 नक्षत्र - 

वैदिक ज्योतिष मे नक्षत्र का विशेष स्थान हैं प्रत्येक नक्षत्र का भोगांश 360/27=13 अंश 20 मिनट होता हैं कोई भी ग्रह किस नक्षत्र मे हैं इसका पता लगाने के लिए ग्रह के भोगांशों को 13 अंश 20 मिनट से भाग देकर भागफल मे एक जोड़ देना चाहिए जिससे ग्रह का नक्षत्र ज्ञात हो जाता हैं | हमारे यहाँ (भारत मे) चंद्रमा के नक्षत्र को जन्म नक्षत्र कहा गया हैं अत; इसी जन्म नक्षत्र से शेष भोग्य दशा की गणना होती हैं |

यदि चन्द्र का भोगांश 236 अंश 43 मिनट हैं (चन्द्र राशि को 30 से गुना किया गया हैं) तो नक्षत्र होगा |

(236*60)+43/(13*60)+20=14203/800=17.75375 अर्थात 18वा नक्षत्र जो की ज्येष्ठा नक्षत्र हैं जिसका चौथा चरण चल रहा हैं (नक्षत्र के चार चरण होते हैं) यदि दशमलव 0 से 25 हो तो पहला चरण 25 से 50 हो तो दूसरा चरण 50 से 75 हो तो तीसरा चरण और 75 से ऊपर हो तो चौथा या अंतिम चरण होता हैं |

नक्षत्रो के नाम व स्वामी इस प्रकार से हैं |

1)अश्वनी 10) मघा,19) मूल स्वामी {केतू}   |

2)भरणी 11) पूर्वाफाल्गुनी 20) पूर्वाषाढ़ा स्वामी {शुक्र} |

3)कृतिका 12) उत्तराफाल्गुनी 21) उत्तराषाढ़ा स्वामी {सूर्य} |

4)रोहिणी 13) हस्त 23) श्रवण स्वामी {चन्द्र} |

5)मृगशिरा 14) चित्रा 23) धनिष्ठा स्वामी {मंगल} |

6)आद्रा 15) स्वाति 24) शतभिषा स्वामी {राहू} |

7)पुनर्वसु 16) विशाखा 25) पूर्वा भाद्रपद स्वामी {गुरु} |

8)पुष्य 17) अनुराधा 26) उत्तरा भाद्रपद स्वामी {शनि} |

9)आश्लेषा 18) ज्येष्ठा 27) रेवती स्वामी {बुध} |

आइए अब एक उदाहरण देखते हैं |

चन्द्र का भोगांश 2राशि 2अंश तथा 26 मिनट हैं नक्षत्र बताए ?     

चन्द्र दो राशि चल चुका हैं इसलिए (2*30)+2=62 अंश 26 मिनट = (62*60)+26/800 =3746/800 =4.68 अर्थात 5 वा नक्षत्र जो की “मृगशिरा” हैं चूंकि दशमलव 50 से 75 के बीच हैं इसलिए नक्षत्र का तीसरा चरण चल रहा हैं |

 

शनिवार, 29 जनवरी 2022

पंचांग मे वार


सूर्योदय से अगले सूर्योदय तक के समय को वार कहा जाता हैं जिससे उस दिन के स्वामी की गणना की जाती हैं | वार मुख्यत; सात माने जाते हैं जिन्हे रवि,सोम,मंगल,बुध,गुरु,शुक्र व शनि वारो के नाम से  बुलाया जाता हैं,यह वार पृथ्वी से इन ग्रहो की दूरियो के अनुसार रखे गए हैं | 

सूर्य (1),बुध (4),शुक्र (6),चन्द्र (2),मंगल (3),गुरु (5),शनि (7)

वार ज्ञात करने की गणितीय विधि इस प्रकार से हैं – 

एक वर्ष मे सप्ताह निकालने पर एक दिन तथा लीप वर्ष मे दो दिन शेष मिलते हैं (365/7 = 52 शेष 1) जिससे 100 वर्षो मे 5 दिन अधिक हो जाते हैं (100+24 लीप दिन /7=17 शेष 5)

आइये इसे एक उदाहरण से सीखते हैं |

3 अप्रैल 2010 का वार क्या होगा ?

2000 वर्षो मे अधिक दिन =00

9 वर्षो मे अधिक दिन (9/7)=02

लीप वर्षो मे अधिक दिन =02

जनवरी 2010 के दिन (31/7)=03

फरवरी 2010 के दिन (28/7)=00

मार्च 2010 के दिन (31/7)=03

अप्रैल 2010 के दिन =03

कुल दिनो का योग =13 जिसे 7 से भाग देने पर हमें 6 शेष मिला जो की सोमवार से गिनने पर शनिवार का दिन हुआ |

प्रस्तुत तरीके मे हम दिन सोमवार से ही गिनेंगे क्यूंकी एडी (एंटी डोमिनो) का आरम्भ सोमवार से माना गया हैं,सोमवार को 1,मंगल को 2,...........तथा शनि को 6 गिना जाता हैं |

वार निकालने का एक अन्य सूत्र इस प्रकार से हैं –इसके लिए हमे एक ध्रुवांक सारणी की ज़रूरत पड़ती हैं |

क्रम माह जन  फर मा अ म जू जु अ सि अ न दि

1 समान्य  1  4 4  0 2  5 0 3 6  1 4  6

2 लीपवर्ष  0  3  3  0 2  5 0 3 6  1 4  6

1) सर्वप्रथम दिये गए सन के दहाई अंक को 4 से भाग करे | (शताब्दी वर्ष मे 100 को भी जोड़ेंगे)

2) भागफल मे दिया गया वर्ष जोड़े (केवल दहाई)

3) इसमे दी गयी तारीख जोड़े  |

4) फिर माह का ध्रुवांक जोड़े |

5) अब इसमे 7 का भाग कर शेष को रविवार से गिने |

आइए इसे एक उदाहरण से समझते हैं |

15-8-1947 का वार इस प्रकार देखेंगे ?

दहाई के अंक 47 को 4 से भाग देने पर भागफल 11 आया

इसमे दिया गया वर्ष 47 जोड़ा तो (11+47=58) आया

इसमे दि गयी तारीख जोड़ने पर 58+15=73 आया

जिसमे अगस्त माह का ध्रुवांक जोड़ने पर 73+3=76 आया

इसे 7 से भाग देने पर 6 शेष आया जो की रविवार से गिनने पर शुक्रवार आया यानि 15-8-1947 को शुक्रवार का दिन था |

 

पंचांग मे तिथि

 पंचांग शब्द पाँच अंगो से मिलकर बना हैं जिसमे निम्न पाँच अंग होते हैं तिथि,वार,नक्षत्र,योग व करण | किसी भी कार्य करने हेतु उपयुक्त समय ज्ञात करना इन्ही पांचों अंगो पर निर्भर करता हैं जिसे मुहूर्त निकालना कहा जाता हैं |

आइए मुहूर्त के इन्ही पांचों अंगो को गणितीय विधि से निकालने का प्रयास करते हैं |

1)तिथि – अमावस्या के दिन से सूर्य ओर चन्द्र के भोगांशों का अंतर बढ्ने लगता हैं (अमावस्या को दोनों के भोगांश समान होते हैं) इस अंतर का बढ़ना ही तिथि कहलाता हैं | जिसे गणितीय दृस्टी से निम्न सूत्र द्वारा ज्ञात किया जाता हैं |

तिथि = (चन्द्र भोगांश - सूर्य भोगांश) /12अंश

यदि चंद्रमा के भोगांश सूर्य भोगांश से कम हो तो चन्द्र भोगांश मे 12 राशियाँ जोड़ देते हैं |

आइये एक उदाहरण से तिथि निकालना सीखते हैं |

चन्द्र भोगांश 2 राशि 02 अंश 26 मिनट हैं तथा सूर्य भोगांश 11 राशि 08 अंश 14 मिनट हैं तो तिथि होगी |

= {(2-02-26) - (11-08-14)} /12अंश

= {(14-02-26) - (11-08-14)} /12अंश

= {(13-32-26) - (11-08-14)} /12अंश

= (2-24-12) /12अंश  

= (2*30=60)+24 = 84अंश 12मिनट /12अंश   

(2 राशि यानि साठ अंश +24 अंश = 84 अंश 12 कला को 12 से भाग देने पर हमें)   

7-01 अर्थात “अष्टमी” तिथि प्राप्त होती हैं |

जैसे ही चन्द्र सूर्य से आगे बढ़ता हैं तो तिथि आरंभ होती हैं और जैसे ही इनका अंतर 12 अंश का हो जाता हैं

तब तक पहली तिथि ही रहती हैं | जब तिथि का अंतर 0-180 होता हैं तब वह शुक्ल पक्ष की तिथि होती हैं जब यह अंतर 180-360 होता हैं तब तिथि कृष्ण पक्ष की होती हैं उपरोक्त उदाहरण मे हमारी तिथि 84 अंश 12 कला की थी जो की 0-180 के मध्य मे आती हैं यानि यह तिथि शुक्ल पक्ष की अष्टमी हुई |

तिथियो के नाम- शुक्ल पक्ष तथा कृष्ण पक्ष मे तिथियो के नाम एक से ही रहते हैं परंतु शुक्ल पक्ष की 15वी तिथि पूर्णिमा तथा कृष्ण पक्ष की 15वी तिथि अमावस्या कहलाती हैं | कृष्ण पक्ष की तिथिया 1 से 15 के स्थान पर 16 से 30 भी लिखी जाती हैं |

तिथियो के नाम व संख्या –

प्रतिपदा (1,16),

द्वितीया (2,17),

तृतीया (3,18),

चतुर्थी (4,19),

पंचमी (5,20),

षष्ठी (6,21),

सप्तमी (7,22),

अष्टमी (8,23),

नवमी (9,24),

दशमी (10,25),

एकादशी (11,26),

द्वादशी (12,27),

त्रियोदशी (13,28),

चतुर्दशी (14,29),

पुर्णिमा/अमावस्या (15,30)

रविवार, 23 जनवरी 2022

लोशु ग्रिड में मिसिंग नंबर के चमत्कारी उपाय

 



यदि 1 (एक) नंबर मिसिंग हो तो आपको सूर्य के उपाय करने के लिए सूर्य नमस्कार करे,तांबे के लोटे में सूर्य को जल चढ़ाना,गायत्री मंत्र का जाप करना,सोने की अंगूठी पहनना,शिव पूजा करना,शहद खाना,उत्तर दिशा में पानी का फव्वारा रखें,नीला रंग करना जैसे उपाय करना चाहिए|

यदि 2 (दो) नंबर मिसिंग होतो चांदी का प्रयोग ज़्यादा करें,दक्षिण पश्चिम दिशा साफ रखे,गणेश जी की पूजा करें तथा पानी बेकार ना करें |

3 (तीन) नंबर ना होने पर बड़े बुजुर्गों से आशीर्वाद ले,पीला धागा अथवा पीपल की जड़ पहने,केले अथवा चने की दाल का दान करें,हल्दी मिले जल से सूर्य को अर्घ्य दे,सत्यनारायण पूजा करें तथा पूर्व दिशा में विंड चाइम लगाएं |

4 (चार) नंबर मिस होने पर कुत्तों को दूध ब्रेड 20 दिन तक खिलाए,चांदी की गोली संग रखें,दहलीज पर चांदी का पत्रा रखिए,पानी में नारियल बहाये,साउथ वेस्ट में पीला बल्ब लगाएं |

5 (पांच) नंबर हेतु ब्रह्मस्थान साफ रखें,हरा रुमाल अथवा हरा पेन साथ रखें,गाय को हरा चारा खिलाएं |

6 (छह) नंबर मिसिंग होने पर सफेद वस्तुओं का दान करें,दूध से नहाए,शिवलिंग पर कच्चा दूध लाल गुलाब चढ़ाएं,फटे कपड़े ना पहने,अंगूठे में चांदी का छल्ला पहने तथा स्त्रियों का सम्मान करें |

7 (सात) नंबर हेतु कुत्तों को ब्रेड खिलाये,गणेश पूजा करे,9 मुखी रुद्राक्ष पहने,बाएं कान में सोना धारण करें,

 8 (आठ) नंबर मिसींग होने पर नॉर्थ ईस्ट में नीला रंग करें,नीलम पहने,नीला रुमाल संग रखें,शनि दान करें हनुमान पूजा करें |

 9 (नौ) नंबर मिसींग होने पर हनुमान चालीसा का पाठ करें,लाल वस्तु हमेशा साथ में रखें,घर में जोत जलाएं |

 

शुक्रवार, 21 जनवरी 2022

लाल किताब व आपका खर्च


 जन्म कुंडली मे 12वा भाव खर्च,व्यय,विदेश,हानी,आवास परिवर्तन अस्पताल,आदि को दर्शाता हैं | जिस व्यक्ति का खर्च बहुत अधिक हो रहा हो यानि हानी हो रही हो अर्थात बरकत ना होती हो पैसा ना रुकता हो तो उसे समझ लेना चाहिए की उसका 12वा भाव व उसका स्वामी अवश्य ही पीड़ित अवस्था मे हैं |

ऐसे व्यक्ति को अपनी जन्मपत्रिका के 12वे भाव के स्वामी को 12वे भाव मे पहुचाहने हेतु लाल किताब के निम्न उपाए करने चाहिए जिसके अनुसार भाव स्वामी की वस्तुओ को अपने मकान की छत पर खुले आकाश के नीचे रखने से इन सभी समस्याओ का समाधान हो जाता हैं |

मेष व मकर लग्न वालो को गुरु ग्रह हेतु केले के पत्ते पर 2 मुट्ठी चने की दाल लगातार 12 गुरुवार छत पर रखनी चाहिए |

वृष व धनु लग्न वालों को मंगल ग्रह के लिए लगातार 12 मंगलवार लाल कपड़े मे लाल मसूर की दाल छत पर रखनी चाहिए |

मिथुन व वृश्चिक लग्न वालों को शुक्र ग्रह के लिए 12 शुक्रवार किसी सुंदर देव प्रतिमा को अपने छत पर रखना चाहिए (प्रतिमा इस प्रकार से रखनी चाहिए की घर के बाहर से वह दिखाई दे) या लाल ज्वार भी रख सकते हैं |

कर्क व तुला लग्न वालों को बुध ग्रह के लिए 12 बुधवार छत पर हरी वनस्पतिया या साबुत मूंग की दाल रखनी चाहिए |

सिंह लग्न वालों को चन्द्र ग्रह के लिए 12 सोमवार चावल गंगाजल से धोकर छत पर रखने चाहिए या बारिश का पानी छत पर रखना चाहिए |

कन्या लग्न वालों को सूर्य ग्रह के लिए 12 रविवार तांबे के पात्र मे 6 मुट्ठी गेहूं भरकर छत पर रखना चाहिए या तांबे की छड़ी बनवाकर छत पर लगानी चाहिए |

कुम्भ व मीन लग्न वालों को शनि ग्रह के लिए 12 शनिवार काले तिल छत पर रखने चाहिए |