महामानव अग्रसेन भगवान श्रीराम के वंशज विश्व शान्ति के आधार क्षमावान, समता के समन्वयक नारि गरिमा के प्रतिपादक अद्भुत और अलौकिक दिव्यता के स्वरूप थे।
नारायणं नमस्तुभ्यं नरं चैव नरोत्तमम्।।
देवी सरस्वती व्यास शिष्यो जयमुदीरयत्।।
परीक्षित की मृत्यु के उपरांत महर्षि वेद व्यास के पटशिष्य ऋषि जैमिनी द्वारा परीक्षित के पुत्र जन्मेजय को नाग-विध्वंसयज्ञ से रोकने के लिए हिंसा त्यागकर अहिंसाधर्म-अर्थात् वैश्यधर्म को अपनाने वाले महाराजा अग्रसेन का इतिहास सुनाया गया जो श्री अग्रोपाख्यानाम् में जय भारत नाम से उद्धृत है। यह प्रसंग भीमभागवत का अंतिम कथानक भी है जिसे किसी कारणवश दबा दिया गया था। अग्रोपाख्यानाम् में 1408 श्लोक हैं जो अग्रसेन भागवत् के नाम से अनुवादित होकर व्यास पीठ से देश भर में प्रचारित किये जा रहे हैं। आज के सर्वाधिक अग्र-ग्रंथ के मुख्य अंश यहां दिये जा रहे हैं।
1. महाराजा अग्रसेन जी का जन्म आज से 5137 वर्ष पूर्व आश्विन मास की प्रथमा दिन रविवार को मध्यान्ह के महेन्द्र समय में शुभ मुहूर्त में हुआ था।
2. महाराजा अग्रसेन जी के पिता का नाम राजा बल्लभ था जो प्रतापपुरी के राजा थे।
3. अग्रसेन जी की माता का नाम भगवती था भाई का नाम शौर्यसेन था।
4. अग्रसेन जी परीक्षित से 15 वर्ष तथा शौर्यसेन से 14 वर्ष बड़े थे।
5. अग्रसेन जी की प्रारम्भिक शिक्षा घर पर ही हुई थी।
6. अपने शास्त्र, शस्त्र एवं महाबल की शिक्षा-दीक्षा उज्जैन नगरी से 10 कि.मी. दूर 'अगर' में एक वर्ष रहकर अन्य ऋषि कुमार एवं ब्रह्मचारियों के साथ प्राप्त की थी।
7. आपके गुरु का नाम ताण्ड्य ऋषि था जो संदीपनी गुरु के शिष्य थे।
8. आपने 15 वर्ष की आयु में ही करूणा भाव का प्रदर्शन कर दिया था जब दुष्ट राजा रतीन्द्र ने मुनिकुमारी शुभा का अपमान करना चाहा था।
9. आपने दुष्ट राजा रतीन्द्र के सिर के बाल एवं मूंछे मुंडवा दिया और चेहरे पर कीचड़ मलकर उसे प्राणदान दिया था।
10. 15.5 वर्ष की आयु में पिता के साथ पांडवों के पक्ष में अग्रसेन जी ने महाभारत के युद्ध में भाग लिया था।
11. राजा बल्लभ का वध युद्ध के दसवें दिन पितामह भीष्म द्वारा किया गया था।
12. किशोर अवस्था में अग्र ने महाभारत युद्ध के शेष आठ दिनों में भयंकर युद्ध करके भगवान् श्रीकृष्ण एवं धर्मराज युधिष्ठिर को अपना प्रशंसक बना लिया था।
13. युद्ध की समाप्ति पर भगवान् श्रीकृष्ण ने अग्रसेन को ईर्ष्या त्यागकर प्राणिमात्र के हित में रत रहकर समाजवाद की स्थापना का आशीर्वाद प्रदान किया था।
14. अग्रसेन जी के चाचा कुंदसेन ने अपने कपटी पुत्र वज्रसेन के बहकावे में आकर अग्रसेन को बंदी बनाकर कारागृह में डाल दिया था।
15. अग्रसेन जी एक श्यामवर्णी कृशकाय वृद्ध एवं फूफा अनांगपाल की सहायता से बंदीगृह से मुक्त हुए थे।
16. कारागृह से भाग जाने पर काका कुंदसेन एवं चचेरे भाई वज्रसेन की सेना ने उस वन में आग लगा दी जिसके कारण वन के जीवजंतु आकाल मृत्यु को प्राप्त होने लगे थे।
17. अग्रसेन जी ने फूफा जी की तलवार से वज्रसेन का वध कर दिया और काका कुंदसेन का दायां बाजू काट दिया था। बाद में कुंदसेन वहां से जान बचाकर भाग गया।
18. बचते-बचाते घायल अग्र गर्गाचार्यजी के आश्रम तक आ पहुँचे थे।
19. गर्गाचार्यजी वृष्टिवंश के कुलगुरु थे जिन्होंने बलराम एवं श्रीकृष्ण का नामकरण-संस्कार किया था।
20. गर्ग-मुनि ने अग्र को निज आश्रम में शरण दी थी।
21. गर्गदेश के अग्र ने निज आश्रम में माता महालक्ष्मी की तप साधना की थी तब जाकर महालक्ष्मी ने प्रसन्न होकर अग्रसेन को 'यशस्वी भव!' समृद्ध भव एवं शक्तिशाली भव का विशेष आशीर्वाद प्रदान किया था।
22. अग्रसेन जी को महर्षि गर्ग की पत्नी गार्गी पुत्रवत् स्नेह करते थे।
23. अग्रसेन जी ने गर्गदेश से आश्रमकुमारों के साथ आश्रम के निकट स्थित टीलों की खुदाई करके प्रगाढ़ धन प्राप्त किया था जो आग्नेयपुरी के निर्माण में काम आया था।
24. यह गढ़ा हुआ धन इक्ष्वाकु वंश के राजा मरूत द्वारा अश्वमेघ यज्ञ पूर्ण होने पर ब्राह्मणों को दिया गया दानरूपी धन था, जो अधिक होने पर ब्राह्मणों द्वारा इस धन को त्याग दिया गया था।
25. याचक द्वारा त्यागा गया दान भूमि के मालिक के स्वामित्व में आ जाता है।
26. महर्षि गर्ग ने अग्रसेन जी का अभिषेक करके उन्हें भावी राज्य का राजा घोषित कर दिया था।
27. इससे पूर्व गर्ग ऋषि ने आदर्श राजा में चार बल-धर्मबल, धनबल, ज्ञानबल एवं भुजबल होने चाहिए को आवश्यक बतलाया जो अग्रसेन जी में थे।
28. इस ताँबई बालू से युक्त भूमि का आकार बारह योजन लंबा तथा चार योजन चौड़ा था।
29. राजसिंहासन के ठीक ऊपर माता महालक्ष्मी जी की विशाल छवि विद्यमान थी।
30. अग्रसेन जी ने ग्यारह सौ दिन एक पांव पर खड़े होकर माता महालक्ष्मी जी तप-साधना करके उनसे कुलदेवी बनने का अभीष्ट वर प्राप्त किया था।
31. अग्रसेन जी द्वारा निर्मित राज्य का नाम आग्नेयपुरी रखा गया जो आज अग्रोहा के नाम से विश्वविख्यात है।
32. अग्रसेन जी का विवाह पूर्व दिशा में स्थित मणि प्रदेश के राजा महीश्वर की ज्येष्ठ पुत्री देवी माधवी के साथ सम्पन्न हुआ था।
33. आज के सप्त पूर्वोत्तर राज्य मणिपुर, नागालैण्ड, त्रिपुरा, मेघालय, असम, मिजोरम एवं सिक्किम उस समय के सप्त जल लोक थे। मणि प्रदेश पाताललोक था। जिसके राजा महीधर थे जिनकी पत्नी का नाम नागेन्द्र था।
34. अग्रसेन जी ने नाग-कन्या माधवी से विवाह करके नागवंश एवं वैष्णववंश को एक करने का कूटनीतिक कार्य किया था।
35. नागराज महीधर ने अपनी सत्रह कन्याओं के विवाह का प्रस्ताव अग्रसेन जी के समक्ष रखा था जिस पर अग्रसेन जी ने कहा कि पत्नी की बहनें मेरी बहनें हैं।
36. अग्रसेन जी का एक ही विवाह इस प्रामाणिक ग्रन्थ में उल्लिखित है।
37. देवराज इन्द्र माधवी पर आसक्त थे। इन्द्र और अग्रसेन में युद्ध होने पर गुरु बृहस्पति ने सन्धि करवायी थी।
38. इन्द्र ने अग्रसेन जी को धर्मदेव अग्रदेव कहकर सम्बोधित किया और समत्वदर्शन का पालन करने का सुभाशीष दिया।
39. अग्रसेन जी के 18 पुत्र थे जिनका विवाह सर्पराज वासुकि की 18 कन्याओं के साथ सम्पन्न हुआ।
40. आज की विदिशा नगरी ही वासुकि विवाह द्वारा समधी अग्रसेन को दिया गया दहेज था। महीधर द्वारा अपने राज्य के श्रेष्ठ तल को अग्रसेन जी के नाम पर अग्रतल रखा गया था जो बिगड़ते-बिगड़ते आज अगरतला के नाम से जग-विख्यात है।
41. अग्रसेन जी जब 85 वर्ष से ऊपर हो गये तो उन्होंने वंशकर यज्ञ का आयोजन किया। सत्रह यज्ञों में दी जा रही पशुबलि से क्षुब्ध श्री अग्रसेन ने 18वां यज्ञ जिसके पुरोहित गर्ग थे को बीच में छोड़ दिया था।
42. अग्रसेनजी ने क्षत्रिय धर्म को त्यागकर अहिंसा एवं प्रेम से सराबोर वैश्यधर्म को अपनाया।
43. गोपालन, कृषि एवं वाणिज्य ही उस समय वैश्यधर्म के प्रमुख सिद्धांत थे। यह वैश्य-वंश सर्वलोकहितधर्मम् सूत्र पर आधारित था।
44. अन्य राजाओं द्वारा क्षत्रिय राजा दिग्गेसजेन के नेतृत्व में षड़यंत्र करने पर युवराज विभु ने उन्हें बंदी बना लिया किन्तु अग्रसेनजी ने पृथ्वी के समस्त क्षत्रिय राजाओं को करूणा का दान दिया। तभी से अग्रसेन महाराजा कहलाने लगे।
45. अग्रसेन जी ने अपने राज्य को 18 जनपदों में बांटा। सत्रह पुत्रों को सत्रह राज्यों का राजा बनाकर आग्नेयपुरी को राजधानी बनाकर आग्नेयगणराज्य की स्थापना की।
46. अग्रसेन जी ने जनता के परामर्श पर ज्येष्ठ गुणी पुत्र विभु को आग्नेयपुरी का राजा बनाया था।
47. अग्रसेन जी ने आग्नेयपुरी में आने वाले हर आगन्तुक को एक रुपया और एक ईंट देने का नियम बनाया था।
48. राजा रघु की तरह अग्रसेन जी ने भी वंशकर यज्ञ किया था। तभी से हम क्षत्रिय (वैश्य) अग्रवंशी कहलाये जाने लगे।
49. अग्रसेन जी भगवान राम के छोटे पुत्र कुश की चौंतीसवीं पीढ़ी हैं।
50. 108 वर्ष की आयु में अग्रसेनजी देवी माधवी के साथ हरिद्वार गये जहाँ माता महालक्ष्मी की आराधना करते-करते पहले माधवी और फिर अग्रसेन मोक्षधाम को प्राप्त हो गये।
51. महाराजा अग्रसेन जी 208 वर्ष तक पृथ्वी पर रहे, ऐसा माना जाता है।
52. महाराजा अग्रसेन जी ने मांस, मदिरा, असत्य, अनाचार, परनारीगमन, दुर्विचार, भ्रष्ट आचरण, कपटनीति, कुसंग, अशिक्षा, अकर्मण्यता, प्रमोद, अमर्ष, प्रपंच, कृतघ्नता, कुसोच, क्षुधा, दुष्ट-सराहना जैसे दुर्गुणों से बचने का सदुपयोग अग्रेयवासियों को दिया था।
53. महाराजा अग्रसेन जी के पुत्रों के नाम-विभु, विक्रम, अजय, विजय, अनल, नीरज, अमर, नगेन्द्र, सुरेश, श्रीमंत, सोम, धरणीधर, अतुल, अशोक, सुदर्शन, सिद्धार्थ, गणेशव, लोकपति थे।
54. महाराजा अग्रसेन जी की पुत्रवधुओं के नाम-चित्रा, शुभा, शीला, कांति, स्वाति, रेणुका, क्षमा, गिरा, सखी, श्रीमाला, शांति, प्रिया, सुकन्या, सावित्री, हेमवती, तारा, नागमणि, प्रभावती थे।
55. यज्ञ पुरोहितों अर्थात् ऋत्विजों के नाम- कश्यप, वशिष्ठ, गौतम, अत्रि, जैमिनी, भारद्वाज, साकल, भारवी, शांडिल्य, श्रृंगी, ताण्डय, मुद्गल, कौशिक, कौण्डिन्य, आश्वलायक, माण्डय, मालव, गर्गाचार्य थे।
56. माधवी की अष्ट घनिष्ट सखियां थी। सखी नामक सहेली उनमें प्रमुख थी।
57. सिंह, गौ, बैल और हिरण को बिना हिंसा किये बचाने वाले महाबल से युक्त सुन्दर युवक को माधवी ने पहली नजर में ही मन में बैठा लिया था।
58. क्षत्रिय राजा दिग्गेसजेन को बंदी बनाकर राजभवन में लाने पर राजनीति में प्रवीण महारानी माधवी ने उसे मुक्त कर छीना हुआ धन वापस करने का परामर्श अग्रसेन जी को दिया। ऐसा करने से कोई भी राजा आग्नेयपुरी का शत्रु नहीं रहा।
59. इन्द्र द्वारा आग्नेय पुरी पर वृष्टि बंद करने पर भूमि, कुओं से जल निकालकर बांध बनाने पर विचार माधवी ने महाराजा अग्रसेनजी को दिया था।
60. कारागृह में बंद अग्र-मित्र वृद्ध ब्राह्मण को देखकर माधवी ने हर व्यक्ति को रोजगार उपलब्ध कराने की प्रार्थना अग्रसेन जी से की। तब से ही एक रुपया और एक ईंट व्यक्ति किसी दूसरे असहाय व्यक्ति को दे-ऐसी नीति बनाकर समताधारित विश्व की कल्पना की गयी थी।
61. शैव्य, वैष्णव और देव तीनों में प्रगाढ़ संबंध स्थापित करने में माधवी ने अपने कूटनीतिज्ञ होने का परिचय दिया था।
62. 18 पुत्रों का 18 राज्यों का राजा बनाकर देवी माधवी ने पति के माध्यम से यह संदेश दिया कि पुत्रों का व्यवसाय एवं घर अलग-अलग होना चाहिए। जिससे संबंधों में मधुरता बनी रहे।
63. राज्य का हस्तान्तरण उस पुत्र को करना चाहिए जो गुणवान तथा जनता में लोकप्रिय हो। साथ ही वह नीतिज्ञ, समत्ववादी, न्यायप्रिय और करुणा से युक्त हो।
64. पत्नी को चाहिए कि वह पति के साथ रहे। समय आने पर वह सर्वसुखों का परित्याग करके और 'परम' को पाने में पति की सहधर्मिणी बने।
65. परम स्वर्ग की अभिलाषा न करके तप-साधना में रत होकर मोक्षप्राप्ति का उपाय ढूंढना श्रेयस्कर है।
66. देवी माधवी एक पुत्री, बहू, भाभी राजरानी, सास, नीतिज्ञ जन महारानी, सहचरी, सहधर्मिणी भक्त एवं तपस्वी के रूप समस्त भारतखंड की सर्वाधिक योग्य विदुषी नारी थी।