गुरुवार, 19 मई 2016

वास्तु व विवाह सुख

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वास्तु व फेंगशुई टिप्स

वास्तु व फेंगशुई टिप्स

1)नकद पैसे व धन संबंधी कागजात उत्तर दिशा मे रखे |

2)मुख्य द्वार के सामने रसोई नहीं होनी चाहिए |

3)घर पर टूटा दर्पण व कैक्टस का पौधा नहीं रखना चाहिए |


4)दरवाजे के समीप कूड़ा दान व जूते नहीं रखना चाहिए |

5)बच्चो का कोना जाग्रत करने के लिए पश्चिम दिशा मे धातु के बने बक्से मे कंचे,सिक्के व रत्न इत्यादि रखे |

6)कार्यक्षेत्र मे हमेशा सकारात्मक सोचे जैसे “आज का दिन मेरा बहुत अच्छा गुजरेगा,मैं अपने काम से बहुत प्रेम करता हूँ“ इससे आपके कार्यक्षेत्र का वातावरण सकारात्मक होगा |

7)जिन कार्यो व वस्तुओ मे बदलाव चाहते हो उन्हे उत्तर पश्चिम मे रखे |

8)स्त्रीया अपने पैसे लाल रंग के पर्स मे रखे |

9)कभी भी उपहार स्वरूप घड़ी ना किसी से ले ना दे,बच्चो को भी अपने बड़ों कि घड़ी प्रयोग करने ना दे |

10)उत्तरपूर्व दिशा ज्ञान व शिक्षा की हैं इसे जगाने हेतु क्रिस्टल का ग्लोब इस दिशा मे रखे |

11)उत्तर पश्चिम दिशा दोस्तों व सहायता प्रदान करने वालो की होती हैं इसे जाग्रत करने के लिए धातु के बने सिक्के इस दिशा मे रखे |

12)दक्षिण दिशा प्रसिद्दि व मान्यता प्रदान करने वाली होती हैं इसे जगाने के लिए 9 लाल रंग की मोमबत्ती इस दिशा मे रखे |

13)पश्चिम दिशा स्रजनात्मकता से जुड़ी हैं इसे जाग्रत करने के लिए अपने कलम इत्यादि इस दिशा मे रखे |

14)दक्षिण पूर्व दिशा धन से संबन्धित होती हैं इसे जाग्रत रखने हेतु लकड़ी के फ्रेम वाला बड़ा दर्पण यहाँ लगाए |

15)स्वास्थ्य व धन के लिए काँच के पात्र मे 6 तांबे के व 1 चाँदी का सिक्का रखकर उसे आधा नमक से भरे और बाकी हिस्से को पानी से भर कर इस पत्र को छेद किए हुये कपड़े से ढक दे इसे पूर्व दिशा मे रखे, ठीक 3 माह बाद नमक व पानी बदल दे इसे जब तक चाहे कर सकते हैं

16)संबंधो को मधुर बनाने के लिए दक्षिण पश्चिम मे रोशनी ज़रूर रखे जो कम से कम 3 घंटे तक रोज़ शाम को प्रदर्शित हो |

17)व्यापार बढ़ाने हेतु दक्षिण दिशा मे दुनिया का नक्शा रख उस पर उन देशो मे जहां आप व्यापार चाहते हैं लाल निशान लगा दे |

18)भोजन की मेज(डायनिंग टेबल )के केंद्र मे क्रिस्टल की कटोरी मे फल हमेशा भरकर रखे |


19)बीमारी से छुटकारा पाने हेतु पूर्व दिशा मे लकड़ी की बनी चकोर कटोरी मे पानी भर कर रखे पानी रोजाना बदलते रहे ध्यान रखे की कोई नुकीली वस्तु जैसे चाकू,छुरी,केची इत्यादि इस दिशा मे ना रखी हो |

सोमवार, 16 मई 2016

आरूढ़ लग्न (एक शोध)

आरूढ़ लग्न (एक शोध)

जैमिनी ज्योतिष मे विभिन्न प्रकार के लग्नों का उल्लेख मिलता हैं जिनमे प्रमुख कारकांश लग्न,आरूढ़ लग्न,वर्णद लग्न,उपपद लग्न आदि हैं प्रस्तुत लेख मे हम आरूढ़ लग्न के विषय मे प्रकाश डालने का प्रयास कर रहे हैं | इस आरूढ़ लग्न को पद लग्न भी कहा जाता हैं |

लग्न जहां यह बताता हैं की हम क्या हैं वही आरूढ़ लग्न यह बताता हैं की दुनिया की नजरों मे हम क्या हैं अर्थात दुनिया की नजरों मे हमारी छवि क्या हैं लोग हमें कैसा समझते या मानते हैं | आरूढ़ का अर्थ ऊंचे स्थान से हैं जिसमे जातक विशेष का सामाजिक आस्तित्व,उसका कार्यक्षेत्र,उसकी प्रकृति आदि का अंदाज़ा दूसरों के द्वारा लगाया जाता हैं आरूढ़ लग्न हमारी छवि द्वारा निर्धारित होने के कारण बेहद सटीक व बिलकुल अलग भी हो सकता हैं |

आरूढ़ लग्न लग्न से लग्नेश की जितनी दूरी होती हैं उससे उतनी ही दूरी के भाव पर माना जाता हैं जैसे यदि लग्नेश लग्न से पंचम भाव मे होतो इस पांचवे भाव से पाँच आगे अर्थात नवम भाव मे आरूढ़ लग्न माना जाएगा,इसी प्रकार यदि लग्नेश तीसरे भाव मे होतो तीसरे भाव से तीन आगे अर्थात पंचम भाव मे आरूढ़ लग्न माना जाएगा |

विशेष –1)चूंकि आरूढ़ लग्न हमारी छवि को दर्शाता हैं वह कभी भी लग्न अथवा सप्तम भाव मे नहीं आ सकता इसके लिए नियम मे अपवाद रखा गया हैं यह जब भी लग्न अथवा सप्तम भाव मे पड़ता हैं तब उसे वहाँ से दस भाव आगे के भाव मे रख दिया जाता हैं जैसे यदि लग्नेश लग्न मे ही होतो आरूढ़ लग्न लग्न से दशम भाव मे माना जाएगा इसी प्रकार यदि लग्नेश चतुर्थ भाव मे होतो उसे वहाँ से चतुर्थ भाव सप्तम भाव मे ना मानकर सप्तम से दस भाव आगे अर्थात चतुर्थ भाव मे ही मानेंगे | 

2)आरूढ़ लग्न कभी भी 6,8 व 12 वे भाव मे नहीं आता हैं |

आरूढ़ लग्न से मिलने वाले प्रभाव इस प्रकार से होते हैं |

1)आरूढ़ लग्न पर ग्रहो का प्रभाव जन्म लग्न की भांति ही देखना चाहिए | आरूढ़ लग्न शुभ ग्रह की राशि मे हो,शुभ ग्रह हो अथवा शुभ ग्रह के प्रभाव मे हो तो जातक भाग्यशाली व धनी होता हैं जबकि पाप ग्रहो के प्रभाव मे होने से जातक विवादित,भाग्यहीन व असफल होता हैं |

2)आरूढ़ लग्न से केंद्र,त्रिकोण मे शुभ ग्रह जातक को प्रसिद्द,धनी,सफल व ताकतवर बनाते हैं जबकि पाप ग्रह अशुभता प्रदान करते हैं |

3)आरूढ़ लग्न से चतुर्थ भाव मे चन्द्र शुक्र का प्रभाव जातक को अनेक भवनो का स्वामी बनाता हैं |

4)आरूढ़ लग्न या इससे सप्तम मे ऊंच,स्वग्रही अथवा मित्र राशि का ग्रह जातक को समाज मे प्रसिद्दि,सफलता व ऊंच स्थान प्रदान करता हैं |

5)आरूढ़ लग्न से राजसिक ग्रह केंद्र मे,सात्विक ग्रह पणफर मे तथा तामसिक ग्रह 3,6,12 भावो मे शुभता देते हैं |

6)आरूढ़ लग्न से 3,6 भावो मे पाप ग्रह पराक्रम की वृद्दि करते हैं तथा अपनी दशा मे शुभफल देते हैं |

7)आरूढ़ लग्न से दूसरे भाव मे शुभग्रह जातक को सम्मानित व धनी बनाता हैं | जबकि दूसरा भाव बली होतो जातक को दुनिया वाले धनी समझते हैं |

8) आरूढ़ लग्न से 11वे भाव मे सब ग्रहो की दृस्टी होतो जातक राजा समान होता हैं |

9)आरूढ़ लग्न से 11वे भाव मे अधिक ग्रहो का प्रभाव जातक का एक से अधिक श्रोतों द्वारा  धनार्जन करवाता हैं जिस कारण जातक बहुत धनी होता हैं |

10)आरूढ़ लग्न से 11वे भाव को ग्रह देखे पर 12वे को नहीं तो जातक को आसानी से लाभ प्राप्त होता हैं |

11)आरूढ़ लग्न से 12वे भाव पर अधिक ग्रहो का प्रभाव जातक को खर्चीला बनाता हैं जिस कारण जातक धन अभाव मे रहता हैं |

12)आरूढ़ लग्न से दूसरे अथवा सप्तम भाव मे राहू केतू होतो जातक के पेट मे कीड़े होते हैं अथवा जातक को पेट संबंधी बीमारी होती हैं |

13)आरूढ़ लग्न से दूसरे अथवा सप्तम भाव मे केतू पाप ग्रह से दृस्ट या युत होतो जातक जवानी मे ही बूढ़ा नज़र आने लगता हैं |

14)आरूढ़ लग्न से दूसरे अथवा सप्तम भाव मे गुरु,चन्द्र,शुक्र या इनमे से कोई दो ग्रह होतो जातक धनी होता हैं |

15)चिकित्सको मे आरूढ़ लग्न उनके लग्न से 9वे व 11वे भाव मे होता हैं | जबकि वकीलो व पुलिस कार्य करने वालों का आरूढ़ लग्न लग्न से पंचम भाव मे होता हैं |

आइये अब कुछ कुंडलियों का अध्ययन करते हैं |

1)लता मंगेशकर 28/9/1929 22:32 इंदौर वृष लग्न की इनकी पत्रिका मे आरूढ़ लग्न सिंह बनता हैं जिसमे इनकी पत्रिका का लग्नेश शुक्र स्थित हैं जो आरूढ़ लग्न का तृतीयेश-कर्मेश  बनकर इनके अपने शौक (गायन) का ही व्यवसाय करना निश्चित कर रहा हैं इसी आरूढ़ लग्न के दूसरे भाव मे ऊंच का बुध इनकी वाणी द्वारा धन प्राप्ति दर्शा रहा हैं | आरूढ़ लग्न के लग्नेश (सूर्य),पंचमेश (गुरु) व नवमेश (मंगल) का संबंध राजयोग के साथ साथ विश्वप्रसिद्द होने का योग भी बना रहा हैं |

2)राजीव गांधी 20/8/1944 7:11 दिल्ली सिंह लग्न का आरूढ़ लग्न वृष लग्न बना जिससे केंद्र मे सभी शुभ ग्रहो ने जहां इन्हे प्रसिद्द,धनी व ताकतवर बनाया हैं वही आरूढ़ लग्न स्वामी शुक्र के जन्म लग्न मे सात्विक ग्रहो के संग होने से इन्हे समाज मे साफ सुधरी छवि भी प्राप्त रही |

3) 17/9/1950 12:21 वदनगर वृश्चिक लग्न मे जन्मे नरेंदर मोदी जी की पत्रिका का आरूढ़ लग्न सिंह आता हैं जिसके केंद्र मे शुभ गृह होने से मोदी विश्वस्तर पर प्रसिद्द हैं आरूढ़ लग्न से दूसरे भाव मे स्थित ऊंच के बुध ने इन्हे ज़बरदस्त वक्ता बनाया हैं वही इस लग्न से सप्तम भाव मे शनि व मंगल के प्रभाव ने इन्हे विवाह सुख से वंचित रखा हैं |

4)11/10/1942 16:00 इलाहाबाद कुम्भ लग्न मे जन्मे श्री अमिताभ बच्चन का आरूढ़ लग्न वृष आता हैं जिसमे इनकीं पत्रिका का लग्नेश शनि     स्थित हैं | इस लग्न के एकादश भाव मे जहां कई ग्रहो के प्रभाव ने इन्हे धनवान बनाया हैं वही पंचम भाव मे ऊंच के बुध(आरूढ़ लग्न से द्वितीयेश) ने इन्हे वाणी मे विशिष्टता प्रदान की हैं तथा केंद्र मे पाप ग्रहो के प्रभाव ने इनकी छवि को विवादित भी बनाकर रखा हैं |

5)2/10/1869 8:40 पोरबंदर तुला लग्न मे जन्मे गांधीजी की पत्रिका का आरूढ़ लग्न कर्क आता हैं जिसमे स्वग्रही चन्द्र स्थित हैं जिसके केंद्र मे शुभ ग्रहो के प्रभाव ने इन्हे प्रसिद्द व आमजन का चहेता बनाया लोग इनके एक इशारे पर मर मिटने को तैयार रहते थे |

6)8/2/1971 3:20 देहरादून वृश्चिक लग्न मे जन्मे इस जातक का आरूढ़ लग्न सिंह आता हैं केंद्र मे पाप ग्रहो के प्रभाव व लग्नेश का छठे भाव मे होना जातक को विवादित होना बता रहा हैं जातक अपने क्षेत्र मे विवादित भी हैं वही एकादश भाव मे कई ग्रहो के प्रभाव ने जातक को एक से ज़्यादा आय के श्रोत प्रदान किए हैं |

7)11/12/1931 17:19 कुचवाड़ा वृष लग्न मे जन्मे इस जातक का आरूढ़ लग्न कर्क आता हैं जिस पर ऊंच का गुरु (नवमेश) वक्री अवस्था मे स्थित हैं जिस कारण जातक धर्म अथवा अध्यात्म को एक अलग ही दृस्टिकोण से देखता था त्रिकोण मे स्थित पाप ग्रहो ने जातक को जहां लीक से हटकर चलने की प्रेरणा दी वही छठे भाव मे लग्नेश चन्द्र व अधिक ग्रहो के प्रभाव ने जातक को हमेशा विवादो मे ही रखा, यह पत्रिका ओशो की हैं |

8)रतन टाटा 28/12/1937 6:30 मुंबई धनु लग्न मे जन्मे श्री टाटा का आरूढ़ लग्न कुम्भ आता हैं जिसके एकादश भाव मे बहुत से ग्रहो का प्रभाव जातक के बहुत से आय के श्रोत होने की पुष्टि कर रहे हैं वही लग्नेश का दूसरे भाव मे होकर एकादश को देखना जातक के धनी होने जबद्स्त योग बता रहें हैं | केंद्र मे पाप ग्रहो के प्रभाव ने इन्हे अपने क्षेत्र मे विवाद भी प्रदान किए हैं |

9)19/8/1946 8:30 हॉप अमरीका मे कन्या लग्न मे जन्मे बिल क्लिंटन का आरूढ़ लग्न वृष आता हैं जिसमे लग्नेश नीच का होकर सप्तमेश शुक्र संग पंचम भाव मे हैं जो विवाहेत्तर संबंध की पुष्टि कर रहा हैं वही केंद्र मे पाप ग्रहो के प्रभाव ने उन्हे अपने कार्यकाल मे विवादित भी बनाया था जबकि केंद्र मे स्वग्रही सूर्य ने उन्हे प्रसिद्दि भी प्रदान करी |


10)हिलेरी क्लिंटन -26/10/1947 20:00 शिकागो मिथुन लग्न मे जन्मी हिलेरी की पत्रिका मे आरूढ़ लग्न कुम्भ आता हैं जिस पर सभी ग्रहो की जेमिनी दृस्टी हैं जिस कारण हिलेरी को ना सिर्फ अमरीकी राष्ट्रपति की पत्नी बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ बल्कि स्वयं भी उन्हे कई ऊंच पद प्राप्त हुये हैं व भविष्य मे भी कई अच्छे पद प्राप्त होते रहेंगे |  

गुरुवार, 12 मई 2016

शनि का स्वरूप

शनि का स्वरूप

शनि के चारो और 27 अंश के कोण पर झुके हुये 3 छल्ले बने हैं जो शनि के वृष,मिथुन व कुम्भ राशि पर होने पर दिखाई देते हैं जबकि इन छल्लो के कोने शनि के सिंह व कुम्भ राशि पर होने पर दिखते हैं शनि के द्वारा धरती पर बैंगनी तरंगे परावर्तित की जाती हैं जो की सभी ग्रहो द्वारा परावर्तित की जाने वाली तरंगो से शक्तिशाली होती हैं | बैंगनी रंग की वेवलेंथ प्रकाशित किरणों मे छोटी होती हैं जबकि इसकी विकिरण ऊर्जा लाल विकिरण की ऊर्जा से भी अधिक होती हैं, शनि के नक्षत्र कर्क राशि मे पुष्य,वृश्चिक मे अनुराधा तथा मीन मे उत्तराभाद्रपद होते हैं तथा हथेली मे शनि का क्षेत्र मध्यमा उंगली व उसके नीचे का क्षेत्र होता हैं |

मकर व कुंभ राशियो के नक्षत्रो द्वारा जामुनी,बैंगनी व बैंगनी रंग परिवर्तित किए जाते हैं सूर्य व ग्रहो की दूरी के अनुसार ग्रहो को राशियो का स्वामित्व दिया गया हैं मकर व  कुम्भ राशि के नक्षत्र द्वारा जो रंग परिवर्तित किया जाता हैं वह शनि का ही रंग हैं |

प्राचीन विद्वान सिंह राशि को सूर्य का स्वामित्व व मुलत्रिकोण प्रदान करते हैं व सूर्य को देवताओ का तथा शनि को शैतानो का राजा मानते हैं सूर्य को चुनौती देने हेतु कुम्भ राशि को शनि का स्वामित्व व मुलत्रिकोण प्रदान किया गया हैं | वैज्ञानिक दृस्टी से देखे तो कुम्भ राशि व शनि की रोशनी एक समान हैं शुभग्रहों को कर्क राशि से विपरीत दिशा मे मुलत्रिकोण राशियाँ दी गयी हैं जबकि अशुभ ग्रहो को सिंह राशि से सीधी दिशा मे मुलत्रिकोण प्रदान किए गए हैं |

अप्रैल माह मे सूर्य अश्विनी नक्षत्र, मेष नामक अग्नि राशि मे प्रवेश करता हैं जहां से उत्तरी ध्रुव मे दिन की अवधि,गर्मी व प्रकाश बढ़ जाते हैं इस कारण मेष सूर्य की ऊंच तथा तुला सूर्य की नीच राशि होती हैं जबकि शनि ग्रह के लिए यह विपरीत स्थिति होती हैं |

12 राशियो के अलग अलग रंग के प्रकाश होते हैं जो उन राशियो मे स्थित नक्षत्रो के रंगो के प्रकाश होते हैं ग्रहो को उनका स्वामित्व व मुलत्रिकोण भी इसी आधार पर दिया गया हैं |

तुला राशि का रंग जामुनी हैं जो शुक्र ग्रह को दिया गया हैं शुक्र शनि का मित्र हैं तुला का चिह्न तराज़ू हैं जो न्याय व शांति का प्रतीक हैं जो भौतिकता व आध्यात्मिकता की साम्यता बताता हैं | मानव शरीर मे कुंडलिनी भी इसी भौतिकता व आध्यात्मिकता को दर्शाती हैं तुला राशि मे 3 नक्षत्र हैं चित्रा जो भौतिक संपन्नता,स्वार्थी व असामाजिक प्रकृति तथा वासना को बताता हैं,स्वाति जो सामाजिक,आर्थिक,धार्मिक,सांस्कृतिक और वासनात्मक जीवन मे संतुलन बताता हैं तथा विशाखा जो जप,नियम,ध्यान,धारण,समाधि,आसन,प्राणायाम तथा विद्रोही प्रकृति को बताता हैं | यदि ध्यान से देखे तो यह सभी विशेषताए शनि की प्रकर्ति से मेल खाती हैं इसलिए शनि को तुला राशि मे ऊंच का माना गया हैं |

शनि का उद्देश्य परेशानी देना,कुछ भौतिक संपन्नता देना और आध्यात्मिक नेत्र खोलने हेतु कष्ट प्रदान करना होता हैं जिससे व्यक्ति स्वयं को जान पाता हैं शनि तुला लग्न हेतु योगकारक तथा मेष लग्न हेतु बाधाकारक माना जाता हैं |

वैदिक ग्रंथो मे जो सात लोक दिये गए हैं उनमे शनि प्रेत लोक का प्रतिनिधित्व करते हैं मानव शरीर के सात चक्रो मे शनि सहस्त्रार चक्र के स्वामी माने जाते हैं शरीर के हिस्से विभिन्न रंगो के दर्शाते हैं जो स्पेक्ट्रोमीटर से देखे जा सकते हैं इनमे मानव शरीर के दिमाग  का रंग बैंगनी होता हैं इस बैंगनी रंग की अन्य रंगो के मुक़ाबले कमी या अधिकता जातक को मस्तिष्क व स्नायु रोग दे सकती हैं आयुर्वेद मे शनि को वाप्रकृति दी गयी हैं जो की इसके बैंगनी रंग के कारण होती हैं इस बैंगनी रंग को सही करने हेतु नीलम रत्न धारण करवाया जाता हैं जिससे हमारे शरीर मे वा,पिव कफ नियंत्रण मे आ जाते हैं |

शनि स्वयं पर पड़ने वाले 42% प्रकाश को वापस भेज देते हैं शनि की विशेषता यह भी हैं की वह सभी शक्तिशाली विकिरणों जैसे एक्स रे व अल्ट्रावोयलट किरणों को वापस भेज देता हैं इतना परिवर्तन होने से इसकी आंतरिक सतह ठंडी रहती हैं जिस कारण वैज्ञानिक इस शनि ग्रह पर जीवन होना मानते हैं |

देखे जाने वाले किरणों की वेवलेंथ 5810 ए होती हैं जो गुरु ग्रह के समान होती हैं इससे कम वेवलेंथ वाली किरणे जो दिखाई देती हैं वो शनि की मित्र होती हैं जिनमे बुध शुक्र ग्रह की किरणे होती हैं चन्द्र,मंगल व सूर्य,शनि के शत्रु हैं जबकि गुरु,शनि से समता रखता हैं इस कारण शनि गुरु का संबंध शुभता देता हैं |

शनि ग्रह अपने समस्त प्रभाव निम्न तरीको से प्रदान करते हैं |

1)भाव मे बैठे गृह व नक्षत्र स्वामी होने पर |

2)भाव मे स्थित होने पर |

3)भाव स्वामी के नक्षत्र स्वामी होने पर |

4)भाव स्वामी होने पर |

5)इन सबको द्वारा देखे जा रहे गृह होने पर |

इन प्रभावों की प्रकृति शनि की स्थिति पर निर्भर करती हैं |

दृस्टी –सभी ग्रहो की भांति शनि की सप्तम के साथ साथ तीसरी व दसवी दृस्टी भी हैं शक्तिशाली बैंगनी किरणे सहस्त्रार चक्र की होने के कारण शनि को आयु कारक माना गया हैं अष्टम भाव आयु बताता हैं अष्टम से अष्टम तीसरा भाव होता हैं और तीसरे से आठवा भाव दसवा होता हैं इस कारण शनि आयु कारक होने से सातवे के अलावा तीसरे व दसवे भाव को भी देखता हैं | शनि की दृस्टी खतरनाक बैंगनी किरणों के कारण अशुभ मानी जाती हैं जबकि गुरु की पीली किरणे शुभ मानी जाती हैं जिस कारण शनि की स्थिति शुभ व दृस्टी अशुभ मानी जाती हैं इसी कारण शनि का अशुभ भाव 3,6,11 मे होना शुभ फल देता हैं परंतु गुरु की दृस्टी शुभ व स्थिति अशुभ या सम मानी जाती हैं ऐसे मे यह दोनों ग्रह जब एक दूसरे पर दृस्टी डालते हैं तो बहुत शुभ परिणाम देते हैं | इसी प्रकार शनि,शुक्र का दृस्टी संबंध भी शुभ होता हैं परंतु विवाह हेतु यह संबंध अशुभता व विलंबता अवश्य देता हैं क्यूंकी  शुक्र भोग,व भौतिक आनंद प्रदाता हैं वही शनि आंतरिक सच व आध्यात्मिकता देते हैं चूंकि चन्द्र बुध अपना स्थान तेजी से बदलते हैं उनका शनि को दृस्टी देना शुभाशुभ नहीं होता |

शनि आंतरिक सत्य की सीख,शोक व पीडा द्वारा देते हैं जिससे भौतिकता नष्ट होकर आध्यात्मिकता मिलती हैं शनि का निर्बल लग्न,लग्नेश,चन्द्र,चंद्रेश अथवा 5,9 भावो से संबंध व्यक्ति को हठयोगी बनाता हैं | शनि वृष,तुला लग्नों हेतु योगकारक तथा 1,3,5 लग्नों हेतु योगभंग कारक होता हैं अन्य लग्नों मे यह शुभाशुभ प्रभाव अपनी स्थिति द्वारा देते हैं राशियो मे यह 2 लगातार राशियो के स्वामी होते हैं जिनमे से एक शुभ व एक अशुभ होती हैं शुभ शनि के लग्न से संबन्धित होने पर ही व्यक्ति लोकप्रिय होता हैं ऐसा शनि का प्रभाव संत सन्यासीयो की पत्रिकाओ मे भी पाया जाता हैं | शनि का असल मक़सद सत्य को बताना हैं व्यक्ति जितना पीड़ित होता हैं उतना ही वह सीखता हैं यही शनि के प्रभाव की विशेषता हैं शनि शुक्र की दशा अंतर्दशा मे यह दोनों एक दूसरे का फल प्रदान करते हैं शनि भौतिकता हेतु अशुभ व व आध्यात्मिकता हेतु शुभ हैं मोक्षदाता हैं मारक रूप मे यह सभी ग्रहो से बली हैं जीवन की ऊंच नीचता से यह हमें सबक देता हैं शनि के बिना कोई भी शख्शियत ना तो भौतिक जगत मे और नाही आध्यात्मिक जगत मे महान बन सकती हैं कोई भी अन्य गृह शनि से इस संदर्भ मे मुकाबला नहीं कर सकता |


मंगलवार, 10 मई 2016

मुक प्रश्न –

मुक प्रश्न –

ज्योतिष शास्त्र की एक अन्य विधा प्रश्न ज्योतिष का अध्ययन करते समय यह जानना की जातक विशेष का आपके पास आने का क्या प्रयोजन  अथवा वह आपसे क्या जानने के लिए आप के पास आया हैं मुक प्रश्न के अंतर्गत आता हैं प्रस्तुत उदाहरणो मे हमने ऐसे ही कुछ प्रश्नो का हल जानने के विषय मे बताने का प्रयास किया हैं |

जब कोई जातक आपके पास आता हैं तब उस समय की कुंडली देखे जिसे प्रश्न कुंडली भी कहते हैं जातक के आपके पास आने की वजह निम्न तथ्यो से ज्ञात होती हैं |

1)जिस भाव मे अधिक ग्रह होंगे जातक उसी से संबन्धित प्रश्न लाया होगा |

2)जिस भाव मे चन्द्र होगा उस भाव से संबन्धित प्रश्न होगा |

3)लग्नेश व एकादशेश मे से जो ग्रह बली होगा उससे चन्द्र जितने भाव आगे होगा चन्द्र से उतने ही भाव आगे गिने उस भाव से संबन्धित ही जातक का प्रश्न होगा |

1)प्रस्तुत कुंडली मकर लग्न की हैं जिसमे दूसरे भाव मे चन्द्र शनि,चतुर्थ भाव मे गुरु(वक्री),पंचम भाव मे मंगल,छठे भाव मे सूर्य,बुध,शुक्र(वक्री) व राहू स्थित हैं तथा द्वादश भाव मे केतू हैं | स्पष्ट रूप से देखने पर ज्ञात होता हैं की प्रश्न छठे भाव से संबन्धित होना चाहिए क्यूंकी छठे भाव मे अधिक ग्रह हैं और जातक का प्रश्न भी उसी भाव से संबन्धित हैं |
छठे भाव मे मिथुन राशि (वायु तत्व,हरे रंग) हैं जिसमे शुक्र पंचमेश,सूर्य अस्तमेश,बुध षष्ठेश व राहू हैं शुक्र चन्द्र अर्थात मन से भी पंचम हैं वही सभी ग्रह  शनि (लग्नेश) से भी पंचम हैं जो किसी वस्तु की पसंद बता रहे हैं जो छठे भाव व वायु तत्व तथा हरे रंग की हो सकती हैं संभवत; जातक अपने पालतू पक्षी जो की तोता हो सकता हैं उसका प्रश्न लेकर आया हैं जातक ने पूछने पर ऐसा ही बताया की आज सवेरे से उसका पालतू तोता गायब हैं अब चूंकि छठे भाव व षष्ठेश दोनों पर पाप प्रभाव ज़्यादा हैं उसे बताया गया की उसका पालतू पक्षी कहीं उड़ गया हैं जो वापस नहीं आएगा |

2)यह पत्रिका कुम्भ लग्न की हैं (20/6/1995 22:55 मुंबई) जिसमे दूसरे भाव मे चन्द्र शनि,तीसरे मे केतू,चौथे मे शुक्र बुध,पंचम मे सूर्य,सप्तम मे मंगल,नवम मे राहू तथा दशम भाव मे गुरु स्थित हैं | लग्नेश द्वादशेश शनि चन्द्र(मन) संग दूसरे भाव मे हैं जिससे यह ज्ञात होता हैं की प्रश्न दूसरे भाव से ही संबन्धित होगा जातिका से पूछा गया की क्या उसकी कोई वस्तु खो गयी हैं जो चेहरे व पीले रंग (मीन राशि जो की गुरु ग्रह की होती हैं) से जुड़ी हो सकती हैं जातिका ने कहा की उसकी नाक की बाली जो सोने की थी नहीं मिल रही हैं अर्थात खो गयी हैं | अब द्वितीयेश (गुरु अर्थात वस्तु) देखे तो कर्म भाव वृश्चिक राशि पर हैं जो की छिपी हुई जगह बताती हैं और गुरु स्वयं दूसरे भाव (मीन राशि) को देख रहा हैं जहां लग्नेश शनि व चन्द्र हैं जो खोई वस्तु का संबंध जातक के पैर व चमड़े (मीन राशि,षष्ठेश चन्द्र व शनि जातिका स्वयं) से स्पष्ट रूप से बता रहे हैं जातिका को उसके चमड़े के जूतो मे नाक की बाली ढूँढने को कहा गया जो उसे घर जाकर जूतो मे देखने पर मिल गयी   
3)प्रस्तुत कुंडली कर्क लग्न की हैं (5/6/1994 8:32 दिल्ली) जिसमे चतुर्थ भाव मे गुरु व राहू,आठवे मे शनि,दशम मे चन्द्र मंगल केतू,एकादश मे सूर्य तथा द्वादश मे बुध शुक्र हैं | लग्नेश चन्द्र दशम भाव मे ऊंच अभिलाषी हैं तथा दशम भाव मे सबसे ज़्यादा ग्रह भी हैं जिससे प्रश्न के दशम भाव से होने का भान होता हैं लग्न पर दशमेश व पंचमेश मंगल की दृस्टी,लग्न का सम व पहले नवांश मे होना जातक को जीव संबंधी चिंता बता रहा हैं |
यह जातक स्वयं (जीव) को भविष्य मे अनुबंध के द्वारा होने वाले कार्य के बारे मे जानना चाहता हैं
लग्नेश चन्द्र गुरु (नवमेश) से दृस्त हैं तथा बुध व गुरु लगभग समान अंशो मे हैं जो व्यवसाय हेतु राजयोग व विदेशी श्रोत बता रहे हैं | कार्येष मंगल बुध संग ईथसाल बना रहा हैं जो होने वाली घटना और षष्ठेश गुरु वक्री होकर मंगल संग इशरफ पिछली घटना बता रहे हैं जिससे जातक जिसने की तीन दिन पहले निविदा भरी थी के आगे तीन माह मे कार्य होने की पुष्टि हो रही हैं (क्यूंकी बुध एकादश स्वामी बुध संग हैं) केतू के दशम भाव मे होने से तथा शनि अष्टमेश की दशम भाव मे दृस्टी होने से उसे आंशिक अनुबंध ही मिलेगा जातक ने कुछ दिनो बाद बताया की उसे आधा ही कार्य मिला हैं |
यहाँ नक्षत्रो का प्रभाव भी बहुत अच्छा बन पढ़ा हैं लग्नेश चन्द्र केतू नक्षत्र मे दशम भाव मे दशमेश मंगल संग होकर व्यसाय अथवा कर्म का प्रश्न बता रहा हैं दशमेश एकादशेश शुक्र के नक्षत्र मे हैं जो उपलब्धि बता रहा हैं तथा बुध द्वादशेश से संबंध विदेश से व्यवसाय बता रहा हैं |    

4)धनु लग्न की इस पत्रिका मे पंचम भाव मे गुरु,छठे भाव मे केतू,आठवे मे मंगल,दशम मे सूर्य,शनि,बुध,शुक्र तथा द्वादश भाव मे चन्द्र-राहू हैं अब चूंकि दशम भाव मे ज़्यादा ग्रह हैं अत: स्पष्ट रूप से प्रश्न इसी भाव से संबन्धित होना चाहिए यहाँ बुध सप्तमेश व दसमेश ऊंच अवस्था मे हैं जो जातक के ऊंच दर्जे के व्यवसाय व रुतबे की ओर इशारा करता हैं,सूर्य नवमेश होकर भविष्य संबंधी प्रश्न अथवा योजना बता रहा हैं,षष्ठेश-एकादशेश शुक्र कर्ज़ व लाभ तथा शनि(द्वितीयेश –तृतीयेश) धन,खान पान,जोखिम संबंधी बातें स्पष्ट कर रहे हैं | वही पंचमेश-द्वादशेश मंगल की लाभ व धन दोनों भावो मे दृस्टी होने से विदेशी प्रभाव व गुप्तता भी नज़र आती हैं जातक से यह पुछने पर की क्या वह कोई ऐसा कार्य करना चाहते हैं जिसमे कर्ज़,खानपान,जोखिम,गुप्तता व विदेशी प्रभाव आते हैं उन्होने सहमति देते हुये कहा की वो कर्ज़ लेकर व विदेशी मित्र की सहायता से अपना होटल खोलना चाहते हैं |
नक्षत्रो से देखे तो लग्न केतू नक्षत्र मे हैं जो छठे भाव (कर्ज़) मे हैं चन्द्र अष्टमेश होकर द्वादश भाव शनि नक्षत्र मे हैं जो दशम भाव मे हैं अत: कर्ज़ और व्यवसाय  की पुष्टि होती हैं |   

  














रविवार, 8 मई 2016

शनि का नक्षत्र अनुसार फल-

शनि का नक्षत्र अनुसार फल-

प्राय:शनि की साढ़ेसाती के समय जातक विशेष को बहुत से कष्टो का सामना करना पड़ता हैं | शनि किस प्रकार से जातक को परेशान करेंगे यह शनि के नक्षत्र गोचर से आसानी से जाना जा सकता हैं प्रस्तुत लेख मे हम इसी विषय मे जानकारी प्रदान कर रहे हैं | शनि का गोचर जब जातक के विभिन्न नक्षत्रो से होगा तब निम्न प्रभाव जातक को प्राप्त होते हैं |

प्रथम अथवा जन्म नक्षत्र-प्रभाव चेहरे पर- भय लगने लगेगा व हानी की संभावना बनेंगी |

2 से 5-बायाँ कंधा –सफलता प्राप्त होगी |

6 से 11-पैर-मानसिक रोग व चिंता परेशान करेंगी |

12 से 16-हृदय-धनलाभ होगा |

17 से 20 दायाँ कंधा-डर सा लगा रहेगा |

21 से 23-सिर-समाज मे रुतबा बढ़े |

24-25-आँखें-आराम व सुख प्राप्ति होवे |

26,27-गुदा-मृत्यु भय लगने लगे |

ऐसे मे जातक विशेष को अपनी राशि के अनुसार निम्न उपाय करने से लाभ प्राप्त होता हैं |

मेष-हर हफ्ते काली गाय को घास खिलाये |

वृष-रोज़ कुत्ते को रोटी खिलाये|

मिथुन-शनिवार को मंदिर मे बादाम दान करे |

कर्क-कव्वे को चावल खिलाये |

सिंह-कानो के कोनो मे हल्दी लगाए |

कन्या-सिर पर तेल ना लगाए |

तुला-बंदरो को केला व गुड खिलाये |

वृश्चिक-सूर्यास्त के समय चींटियों को चावल चीनी व तिल खिलाये |

धनु-शराब ना पिये |

मकर-अनावशयक रूप से यात्रा ना करे |

कुम्भ-शनिवार शनि मंदिर मे तेल चढ़ाये |


मीन -800 ग्राम उड़द साबुत दाल बहते पानी मे जलप्रवाह करे |