कॉमेडी नाटक पाश्चात्य नाट्य-रचना की एक
ऐसी विधा है जिसमें टाइप पात्रों (वर्ग विशेष) की सहायता से एक ऐसे कथानक का गठन
किया जाता है जो बहुत छिछले और अगंभीर स्तर पर होता है । अरस्तू ने त्रासदी से कॉमेडी का स्वरूप अलग करते हुए यह विचार व्यक्त किया कि त्रासदी में मनुष्य के
सामाजिक नैतिक व्यवहार को सामान्य से अर्थात् समाज के सामान्य रूप से अधिक
उत्कृष्ट बनाकर प्रस्तुत किया जाता है जबकि कॉमेडी मे इस सर्वसाधारण समाज के
व्यवहार को, उसकी नैतिकताओं को सामान्य से गिरे हुए और हेय रूप में उपस्थित किया
जाता है। नाटक का कथानक रचते समय नाटककार इसी हेय जीवन में अंतर्निहित विकृत
उक्तियों,
चेष्टाओं, असंगत विचारों और अश्लील भावनाओं को
हास्यास्पद रूप से दर्शक को हँसाने के लिये नियोजित करता है । जैसा कि ग्रीक संबंध
से कॉमेडी का अर्थ है कि वह आमोद -प्रमोद का व्यंजक है । ग्रीक (यूनानी) लोग
डायोनिसिस की पूजा के अवसर पर सुरापान आदि करते हुए अश्लील और भोंडे रूप से
आमोद-प्रमोद मनाते थे । यही उनकी क्रियाएँ आगे चलकर कलात्मक वस्तु-विधान के रूप
में संयोजित की जाती हुई कॉमेडी नामक नाट्य विधा को रूप देती हैं ।
कॉमेडी नाटक की आत्मा का संबंध सामाजिक
जीवन से होता है सामाजिक जीवनयापन के लिये समाज कुछ आदर्शों, कुछ नैतिक मूल्यों को संयम आदि को
महत्व देते हुए समाज में शिष्ट आचरण का रूप प्रस्तुत करता है। इस शिष्ट आचरण से
हटकर जब व्यवहार किया जाता है और क्षुद्रतापूर्ण अश्लील व्यवहार किया जाता है तो
उसकी दो प्रतिक्रियाएँ होती हैं । एक तो यह कि पोएटिक्स जस्टिस (काव्यन्याय) के
अनुरूप दंड दिया जाये अथवा उसे अबोध, अज्ञानी, मूर्ख, अशिक्षित व्यक्ति को ना समझी का रूप मानकर
सहानुभूति के आश्रय से उसके आचरण पर हँसकर टाल दिया जाये । कॉमेडी के वस्तु-विधान
में यह दूसरा रूप ही प्रधान होता है । इसमें चरित्र अज्ञानी और
मूर्ख- प्रकृति के सामाजिक वर्ग के कुछ निम्न स्तर के लोगों के हैं । वे ऐसा
व्यवहार करते हैं जो अतार्किक होता है, विसंगतियों से भरा हुआ होता है जिसमें सामाजिक, नैतिक व्यवस्था के औचित्य से छेड़छाड़
करने की भौतिक वासनाओं और कमजोरियों से भरी हुई प्रवृत्ति होती है । जिसे प्रस्तुत
करते हुए कॉमेडी कार दर्शक को केवल हँसाते हुए उनके भीतर अंगर इस प्रकार का विकास
छिपा है तो उसका संशोधन करते हैं । जॉर्ज मैरेदिठ ने भी लिखा है कि कॉमेडी की आत्मा
सामाजिक जीवन से संबंधित होती है, उसमें सहानुभूति की मात्रा विशेष रूप से रहती
है । वह हर समय कॉमेडी के सृजन में सतर्क - सी दिखाई पड़ती है । जब कभी वह समाज में
अथवा व्यक्ति के चरित्र में अज्ञानता के कारण या छिछलेपन के कारण अथवा अशिक्षा के
कारण अनुचित गर्व, पाखण्ड, बनावटीपन, अनौचित्य, दुश्शीलता, छलछा, तर्कहीनता, अशिष्टता, अज्ञान, डींग, शेखी, मिथ्याभिमान, अस्थिरता, निर्लज्जता, अंधविश्वास, असंयम और असंगति देखती है तो उन
चरित्रों के प्रति हमारी सहानुभूति के कारण सहज हो हँसी फूट पड़ती कॉमेडी में कोई गंभीर संवेदनाएँ नहीं जागृत की जाती हैं, उसकी दृष्टि तो समाज के मूल्यों की
दृष्टि से समाज के व्यक्ति में संशोधन परिमार्जन का कार्य करना है। इसी चेतना के
आधार से जब नाटककार कॉमेडी का सृजन करता है तो उसकी कथावस्तु की रूपरेखा एक
निश्चित चाल में ढलती है.
पात्रों की वर्गगत चारित्रिक विशेषताओं
का स्वरूप सामने आता है। उसमें सामाजिक सशाधन का विचार उभरता है, उसकी हास्यमूलक प्रवृत्तियाँ और
विधियों सामने आती हैं
।
पात्रों के द्वारा प्रयुक्त भाषा की
विकृत उक्तियाँ, असंबद्धताएँ, अशिक्षित व्यक्ति के गलत उच्चारणों आदि के माध्यम से एक अनैतिहासिक
कथानक को एक सुखांतक ढंग से विकसित किया जाता है कॉमेडी का पात्र कथानक के आरंभ में
जिन परिस्थितियों में उलझा हुआ दिखलाई पड़ता है और अपनी मूर्खता के कारण उनमें
फँसा रहता है, वे ऐसी नहीं होती हैं कि जिनका आसानी से समाधान न हो सके। दर्शक यह
समझता है कि यह ऐसी कोई परिस्थिति नहीं है जिससे उबरा न जा सके इसीलिए परिस्थिति
में फँसे हुए पात्र विशेष की असंगत क्रियाओं पर वह हँसता है। व्यापक सहानुभूति से
ग्रस्त होकर ही हँसता है। उसके अपराधों के प्रति उसे कठोर दंड दिया जाये, ऐसी प्रवृत्ति से वह ग्रस्त नहीं होता
है। यही कॉमेडी के रचना विधान में केंद्रीय अवधारणा है जिसके आधार से कॉमेडी का
कथानक गठित होता है, उसमें पात्रों का वर्ग विशेष रूप प्रकाशित होता है, उसके संवादों या संलाप-विधान को रोक
दिया जाता है। उसकी गद्यमयी भाषा या फूहड़ गानों को प्रस्तुत किया जाता है, अभद्र शैली में नाचने को दिखलाया जाता
है। इसी रीति से 'कॉमेडी की संरचना करते हुए नाटककार सामाजिकों का नैतिक विरेचन करता
है।
कॉमेडी के तत्व - सामान्यतः कॉमेडी रचना
के भी तत्व वे ही होते हैं जो त्रासदी के होते हैं या किसी अन्य नाटक के होते हैं
किंतु उनका संरचनात्मक स्वरूप भिन्न हो जाता है। कामद नाट्यवस्तु के स्वरूप को
व्यक्त करते हुए अरस्तू ने लिखा है कि कॉमेडी में सामान्य जीवन से डेय रूप वाला
जीवन प्रस्तुत किया जाता है। इससे स्पष्ट होता है कि कॉमेडी में त्रासदी जैसे किसी
खास इतिवृत्त का कोई महत्व नहीं होता है। कॉमेडी की कथावस्तु जिन उपकरणों से गठित
होती है वे ऐसे व्यक्तियों के क्रियाकलाप को प्रस्तुत करती है जो समाज में हीन
पात्र समझे जाने वाले लोग होते हैं जिनकी प्रकृति दुष्ट-प्रकृति होती है, जिनका व्यवहार सभ्य व्यक्ति को अभद्र
लगता है परंतु उन व्यक्तियों का जो सामाजिक निर्माण होता है उसकी कमी के कारण ही
वे ऐसा करते हैं। इसलिये उनके प्रति हमारी सहानुभूति भी होती है और उनके असंगत
व्यवहारों पर हँसी भी आती है। ऐसी ही घटनाओं और परिस्थितियों का अवतरण करके उनके
परिप्रेक्ष्य में हेय पात्रों का क्रियाकलाप दिखलाना. कामदी के वस्तु गठन की मूल प्रवृत्ति होती है (कॉमेडी के वस्तु-विन्यास में
किसी गंभीर• नैतिकतार्किकता की अपेक्षा नहीं होती है, उसमें अनियोजित घुमाव देकर कथानक को
विकसित करना, समाज की सामाजिक व्यक्ति की विसंगतियों आदि का रूप प्रकट किया जाता
है। इस कथानक के संयोजन में आरंभ, मध्य और अंतमूलक संयोजन तो होता है किंतु उसका
विकास करते हुए कवि या नाटककार असंभावित रूप से भी किसी परिस्थिति या घटना को
उपस्थित कर सकता है और नाटक की एक सुखांतक परिणति कामदी की अनिवार्य अपेक्षा है। कॉमेडी के कथानक के विकास का मूल समाज की व्यवस्था और उसके प्रति असंगत आचरण करते हुए
व्यक्ति का वह रूप है जो एक प्रकार का ऐसा अंतर्विरोध उपस्थित करती है जो दुखपूर्ण
नहीं होता है। त्रासदी से कामद का यही अंतर है कि सामाजिक, नैतिक व्यवस्था के साथ त्रासदी में
नायक का अंतर्विरो आचरण जहाँ दुःखात्मक परिणति वाला होता है वहीं कॉमेडी के हेय
पात्रों का सम नैतिक व्यवस्था के साथ अंतर्विरोध मूलक आचरण दुःखरहित होता है
क्योंकि इन आचरण का साध्य कोई गंभीर नैतिकता नहीं होती न ही वह उनकी प्रेरणा बनती
है जो भौतिक जीवन के भोग-विलास और
आमोद-प्रमोद के छिछले स्तर से वे हेय पात्र जुड़े रहते हैं।
उनकी चेतना को कोई महान उद्देश्य
आंदोलित नहीं करता है इसीलिए उनके आचरण सहानुभूति से स्पर्शित होकर दुःखरहितता की
संवेदनीयता पैदा करते हैं। हास्योत्भावक होते हैं। हम उनकी बुराइयों पर हँसते तो
हैं पर साथ ही अपने अंदर छिपी ऐसी बुराइयों से बचने की आशंका से भी भर जाते हैं और
जागृत होते हैं। यही कॉमेडी का साध्य है और कथावस्तु विधान का एक संरचनात्मक रूप
देने का कारण बनती है। कथावस्तु ऐसे असंबद्ध घटनाओं और व्यवहारों के संयोग से रची जाती है जिन
असंबद्धताओं का लक्ष्य या सारतत्व हँसी पैदा करना होता है। ऐसी योजना कभी व्यंग्य
के आधार से विकसित होती है जिसे Sattaire (व्यंग्यात्मक कॉमेडी) कहते हैं, कभी रोमांस के आधार से विकसित होती है
जिसे रोमांटिक कॉमेडी कहते हैं, कभी व्यक्ति की भौतिक अंतर्वृत्तियों से विकसित होती है जिसे 'कॉमेडी ऑफ ह्यूमर' कहते हैं और कभी बनावटी गंभीरता वाले
व्यवहार के रूप में विकसित होती है जिसे 'कॉमेडी ऑफ मैनर्स' कहते हैं। कथावस्तु इस प्रकार काल्पनिक
होती है. असंबद्ध घटनाओं के संयोग से निर्मित होती है। यद्यपि उसके विकास में
सामाजिक व्यवस्था के महत्व और नैतिक चेतना को जागृत करना अभीष्ट होता है और यही
केंद्रीयता कथानक को कलात्मक रूप देने में सहायक होती है। सामाजिक संशोधन वह
केंद्र है जिससे नाट्य-वस्तु असंबद्ध रूप से विकसित होने पर भी कलात्मक प्रतीत
होने लगती है।
कॉमेडी में
पात्रों के चरित्र को टाइप चरित्र (वर्ग प्रतिनिधि चरित्र) के रूप में अवतरित किया
जाता है। वे अपने वर्ग विशेष की प्रवृत्तियों के अनुरूप व्यवहार करने वाले होते
हैं। इस प्रकार कॉमेडी के पात्रों को उनके सामाजिक संदर्भ में विकसित किया जाता है। कॉमेडी में पात्रों के व्यक्तिगत जीवन की स्थितियों को कोई महत्व नहीं दिया जाता
है। क्योंकि य वर्ग के पात्र होते हैं। अतः भौतिक मौज-मस्ती की प्रेरणा से ही वे
कुछ छिछले स्तर की क्रियाएँ करते हैं। उनका सामाजिक संदर्भ सांस्कृतिक न होने के
कारण उनके चरित्र को एक हास्यास्पद रूप में रखने
की
प्रवृत्ति हो कॉमेडी के चरित्र चित्रण की सीमा होती है। उनके पात्रों के चरित्र में
जो अनुचित गर्व तर्कहीनता, अशिष्टता, अंधविश्वास, असंगति देखी जाती है। वह उनके हेय रूप को प्रकाशित करती है, जिस हेयता से सामान्य सामाजिक बचना
चाहता है। अतः पात्रों के चरित्र चित्रण के द्वारा सामाजिकों को चरित्र की संगति
को बनाये रखने की शिक्षा देना व्यंजित होता है। पाठक के मन में इतना तो आता ही है
कि हम ऐसा आचरण न करें कि हमें इन हेय पात्रों की तरह हास्यास्पद बना दे।
पात्रों के स्वरूप विकास में कॉमेडी की
भिन्न-भिन्न अवस्थाएँ उभरती हैं और उनके महत्व का उसी के अनुरूप मूल्यांकन किया
जाता है। शेक्सपियर का कॉमिक पात्र फालस्टाफ है जिसका मूल्यांकन करते समय हम वही
दृष्टि नहीं रख सकते जो कॉमेडी के हेय पात्रों के मूल्यांकन के समय रखते हैं। उसको
अधिक गंभीर स्तर से समझने की जरूरत का अहसास होता है। इसी प्रकार कॉमेडी के
भिन्न-भिन्न भेदों में चरित्र-शिल्प भी भिन्न-भिन स्वरूप और महत्व वाला बन जाता है।
किंतु सबके केंद्र में हास्यास्पदता तो रहती है जो कामदी की चरित्र सृष्टि को अपनी
निजता (अस्मिता) प्रदान करती है।
कॉमेडी अपने स्वरूप विकास के लिये हेय
पात्रों के भाषा प्रयोग पर बहुत कुछ अलग है । पात्र जिस भाषा का प्रयोग करते हैं
उसमें शब्दों का उल्टा-पुल्टा उच्चारण हास्यो महत्व का होता है। शब्दों को
गड्डमड्ड ढंग से रखने की प्रवृत्ति भी हास्य का सृजन करती है।
अश्लील और अभद्रता के गान की योजना
होती है। भाषा इस प्रकार ऐसे संवेगों से प्रेरित होकर व्यक्त की जाती है जो शिष्ट
समाज के अंकुश को सर्वथा उपेक्षा करने वाली लगती है। भाषा न सुसंबद्ध होती है और न
ही किसी महत्वपूर्ण प्रयोजन की दृष्टि से संयोजित होती है। भाषा का स्तर
विषयानुरूप नहीं होता । कभी बहुत छोटी-सी बात को ऐसी गंभीर भाषा शैली में उपस्थित
किया जाता है जो बहुत असंबद्ध लगता है और यह असंबद्धता दर्शक को हँसाने का कारण
बनती है। कभी ऐसे गंभीर प्रसंग को ऐसे छिछले रूप में व्यक्त किया जाता है जिससे
प्रसंग की अभिव्यक्ति बहुत अमर्यादित और हास्यास्पद लगने लगती है। भाषा-संवाद में
विवेचनात्मक स्वगत उक्तियाँ नहीं मिलती हैं। तरंग शैली की स्वगतोक्तियाँ ही रखी
जाती हैं। यह मनमौजीपन ही कामदी की भाषा और शैली, उसके अंदर के हास्य और व्यंग्य को एवं
जीवन की असंगतियों को सामने लाने का एक महत्वपूर्ण साधन है।
कामी की दृश्य - योजना स्वभावतः अतिरिक्त
व्यापारमूलक ही होती है। दृश्यों का विधान ऐसे उपकरणों से किया जाता है जो हेय
वर्ग के जीवन का आभास देती हैं। जैसे शराब पीना, चरस पीना, गांजा पीना, पात्रों का बैठकर चण्डूखाने की बातें
करना अथवा बहुत भड़कीले रंगों के प्रयोग से या रासरंग से मंच को रंजक बनाना और उन
प्रवृत्तियों को उकसाना जो छिछली होती हैं, मंच व्यवस्था का अभीष्ट है। सारी मंच सज्जा ऐसे
रूप में व्यवस्थित की जाती है जो उसके असमजित होने का आभास देती है अथवा
अस्वाभाविकता का आभास देती है अथवा विसंगति व्यंजक होती है। वह ऐसे ढंग से सजायी जाती है जिसमें मनुष्य
के सामान्य रहन- सहन और व्यक्ति की पाशविक प्रवृत्तियों के बीच एक टकराव का बोध
होता है और इस प्रकार इन दोनों की आपसी टकराहट से सारे दृश्य उलट-पुलट से लगते
हैं. हास्यव्यंजक हो जाते हैं।
मैलोड्रामा - मैलो ग्रीक शब्द मैलोस का
रूप है जिसका अर्थ होता है गीत, और इसके साथ ड्रामा या नाटक संलग्न कर देने पर
मैलोड्रामा का रूप प्रकट होता है। इस प्रकार मैलोड्रामा गान और नाट्य का
सम्मिश्रित रूप होता है। वस्तुतः पश्चिम में इटैलियन पुनर्जागरण के समय अपेरा का
जो रूप विकसित हुआ था, वह मैलोड्रामा जैसा हो था। इस इटैलियन ऑपेरा का मैलोड्रामा के रूप
में भावन किया जा सकता है।
इटैलियन पुनर्जागरण काल में यह एक
प्रकार से ग्रीक क्लासिकल थियेटर का पुनविर्भाव था। 18वीं शताब्दी में आकर हम देखते हैं कि
हैंडल ने अपनी कुछ रचनाओं को ऑपेरा को संज्ञा दी और कुछ को मैलोड्रामा कहा। इस काल
में फ्रेंच नाटककारों ने ऐसे नाटकों का सृजन किया जिनमें संगीत पर बहुत जोर दिया
जाता था। अतिरिक्त संवेगों की अभिव्यक्ति पर बल दिया जाता था। चमत्कारपूर्ण
दृश्यों के अवतरण की विशेष प्रवृत्ति रहती थी और नाटक को प्रायः सुखांत रूप दिया
जाता था। इस प्रकार 18वीं शताब्दी के अंत तक फ्रेंच नाटककारों के द्वारा मैलोड्रामा का यह
एक रूप विकसित हुआ। इस कलाविधान में भावनाओं को अतिरंजित रूप में व्यक्त करने की विशेष प्रवृत्ति
विद्यमान रही है किंतु समय के साथ मेलोड्रामा का कलात्मक रूप भिन्न-भिन्न आकार
ग्रहण करता चला गया। उसमें परवर्ती काल में अथवा अति श्रेष्ठ पात्रों के भीतर के
अंतर्द्वन्दों को नायक-नायिकाओं के चरित्र के दिखलाया जाने लगा और इस प्रकार
मैलोड्रामा में श्रेष्ठ तथा निंदित पात्रों के गुणों अवगुणों के अतिरिक्त
संवेदनात्मक स्वरूप से संलग्न कर अंतर्द्वन्द्वों को प्रकाशित किया लगा, जिससे दर्शक चमत्कृत तो होता था |


