गुरुवार, 9 अप्रैल 2026

ज्योतिष अनुसार स्त्री जातिका

 


ज्योतिष जिस जगह स्त्रियों का सम्मान होता है वहाँ लक्ष्मी का निवास होता है । जिस घर की स्त्रियां हमेशा खुश रहती हैं, वहाँ हमेशा समृद्धि व खुशहाली रहती है । हमारी संस्कृति में स्त्री को घर की लक्ष्मी, सहभागी, सहयोगी, सृष्टि को जन्म देने वाली, उसका पालन-पोषण करने वाली समझा जाता है ।

कुछ ज्योतिषीय लक्षणों के आधार पर हम यह जान सकते हैं कि जातिका में क्या सद्गुण हैं । हम सभी जानते हैं कि ज्योतिष के अनुसार मानव की प्रकृति ज्ञात की जा सकती है ।

यदि किसी स्त्री जातिका की जन्म कुंडली के लग्न में गुरू, सूर्य व बुध स्थित हो तो ऐसी जातिका उपदेशक, श्रेष्ठ कवियत्री, बुद्धिमान व धनी महिला होती है ।

यदि किसी स्त्री जातिका की जन्म कुंडली के लग्न में बुध और शुक्र लग्न में स्थित हो तो ऐसी जातिका सुन्दर, आकर्षक, मोहक व्यक्तित्व वाली, कला प्रिय, विद्वान, धनवान होती है तथा अपनी आयु से कम नज़र आती है ।

यदि किसी स्त्री जातिका के लग्न में बुध स्थित हो तो ऐसी स्त्री रचनात्मक कार्य करने वाली, कवियत्री तथा अपनी बात को तथ्य पूर्ण ढंग से प्रस्तुत करने वाली होती है ।

यदि किसी स्त्री जातिका की जन्मपत्री में लग्न से सप्तम भाव का स्वामी गुरू हो अर्थात मिथुन या कन्या लग्न हो लग्नेश बुध का संबंध सप्तमेश गुरू से हो तो जातिका मासल व मजबूत शरीर वाली स्वस्थ महिला होती है । वह सुन्दर, जीवों पर दया करने वाली, अच्छे चरित्र की महिला होती है । वह व्यवहारिक तथा धार्मिक प्रवृत्ति की होती है। यह सारे गुण तभी सम्भव है जब बुध व गुरू पर कोई पाप प्रभाव नहीं हो।

यदि किसी स्त्री जातिका की जन्म कुंडली में लग्न, चतुर्थ व नवम भाव में ग्रह स्थित हो तो जातिका अच्छे चरित्र की भाग्यवान महिला होती है । इसके साथ ही यदि शुक्र भी शुभ स्थिति में हो तो वह जीवन के सभी सुखों का भोग करने वाली महिला होती है ।

यदि स्त्री जातिका की जन्मकुंडली में चन्द्रमा जहाँ स्थित होता है वहाँ से सप्तम भाव में शुभ ग्रह स्थित हो तो ऐसी स्त्री अच्छे स्वभाव वाली, उच्च मानसिक स्तर की महिला होती है ।

यदि किसी जातिका की जन्मकुंडली में गुरू लग्न, तृतीय अथवा नवम भाव में स्थित हो तो ऐसी स्त्री आध्यात्मिक विचारों की महिला होती है तथा पतिव्रता होती है ।

यदि किसी स्त्री जातिका की जन्मकुंडली में लग्न से सप्तम भाव में गुरु स्थित हो तथा उस पर बुध व शुक्र की भी दृष्टि हो तो ऐसी स्त्री पति की प्रिया, श्रेष्ठ वक्ता होती है जो गहनों, गहनों के निर्माण तथा कपड़ों आदि से सम्बंधित कार्यों में सफल होती है ।


यदि किसी स्त्री जातिका की जन्मपत्री में सप्तम भाव का स्वामी विवाह कारक शुक्र के साथ स्थित हो तथा इन पर गुरू की दृष्टि हो तो ऐसी स्त्री अपने पति के लिए शुभ फलदायक होकर उसकी उन्नति में सहायक होती है |

यदि जातिका की जन्म कुंडली के लग्न में सम राशि हो, चन्द्रमा भी सम राशि में हो तो ऐसी महिला स्त्री सुलभ आकृत्ति वाली होती है,वह शीलवान, सुन्दर व आकर्षक होती है तथा पति की प्रिय होती है |

यदि किसी स्त्री जातिका के जन्म लग्न का सप्तमेश गुरू के साथ स्थित हो तथा इनका पाप रहित शुक्र संबंध हो तो ऐसी स्त्री पतिव्रता व अपने पति की आज्ञा का पालन करने वाली होती है ।

यदि किसी जातिका का जन्म लग्न कर्क हो,कुटुम्ब भाव का स्वामी सूर्य सप्तम भाव में मकर राशि में स्थित हो, सूर्य पर भाग्येश गुरू की लग्न, तृतीय या एकादश भाव से दृष्टि हो तथा चन्द्रमा भी शुभ स्थिति में हो तो ऐसी स्त्री समझदार, बुद्धिमान महिला होती है इन्हें पुत्र सुख की प्राप्ति होती है तथा यह श्रेष्ठ विचारक भी होती हैं ।

यदि किसी जातिका की जन्मकुंडली में सूर्य, गुरू व मंगल की युति होती है तथा यह युति पाप रहित हो तो इस प्रकार की महिला प्रशासनिक दृष्टि से एक सफल महिला होती है । नेतृत्व क्षमता होने की वजह से ये अपने माता-पिता का गौरव बढाने वाली होती है ।

यदि किसी स्त्री जातिका की जन्मकुंडली में चन्द्रमा, गुरू व बुध की युति हो तो ऐसी स्त्री वाक्पट प्रतिभाशाली, धन-सम्पदा से युक्त महिला होती है । ऐसी महिलाएं समाज कल्याण के कार्यों में भी रूचि लेती हैं । कई बार यह राजनीति के क्षेत्र में भी सक्रिय होने में रूचि रखती है ।

यदि किसी स्त्री जातिका की जन्मकुंडली में गुरू, शुक्र व शनि की युति हो तो ऐसी जातिका न्याय प्रिय होती है। बहुत सम्भव है कि इनका कार्य क्षेत्र न्याय से संबंधित हो । जैसे:- जज, वकील आदि परन्तु इनका वैवाहिक जीवन सामान्य ही माना जाता है लेकिन आर्थिक दृष्टि से यह अपने पति से कंधे से कंधा मिला कर कार्य करती हैं ।

यदि किसी स्त्री जातिका का गुरू जन्मकुंडली में स्वराशि, उच्च राशि में स्थित होकर कुंडली के केन्द्र या त्रिकोण में स्थित हो और उस पर कोई पाप प्रभाव नहीं हो तो ऐसी स्त्री सचरित्र, धन-सम्पदा से युक्त, गुणवान तथा शीलवान होती है ।

यदि किसी स्त्री जातिका की जन्मकुंडली में सप्तम भाव का स्वामी अपने ही भाव में स्थित हो तथा उस पर कोई पाप प्रभाव नहीं हो तो ऐसी स्त्री पतिव्रता और पारिवारिक सुखों का आनन्द लेने वाली महिला होती है ।

ऊपरलिखित ज्योतिषीय सूत्रों में केवल ग्रहों की विवेचना ही की गई है इनमें लग्न के अनुसार शुभाशुभ ग्रहों की चर्चा नहीं की गई है जो उक्त फलों में परिवर्तन ला सकते हैं। साथ ही ग्रहों के बल पर भी विचार करना अनिवार्य है ।

शनिवार, 28 मार्च 2026

सुखमय जीवन की अनमोल कुंजियाँ

लक्ष्मी तथा आयु प्राप्ति हेतु

अग्नि पुराण में धन्वंतरिजी सुश्रुतजी को कहते हैं : "श्रीदः, श्रीशः, श्रीनिवासः, श्रीधरः, श्रीनिकेतनः, श्रियः पतिः तथा श्रीपरमः

इन श्रीपति- संबंधी नामात्मक मंत्रपदों के जप से मनुष्य लक्ष्मी (धन-सम्पत्ति) को पा लेता है ''

 

श्रीमद्देवीभागवत में भगवान नारायण कहते हैं कि गायत्री मंत्र जपते हुए दूधवाले वृक्षों (पीपल, गूलर, वट और पाकड़) की समिधा का हवन आयु प्रदान करनेवाला है।

 

सम्पूर्ण कार्यों की सिद्धि हेतु उपाय

नारद पुराण में आता है कि सम्पूर्ण कार्यों की सिद्धि के लिए पीपल और बड़ के मूल भाग में दीप देना चाहिए

शुक्रवार, 27 मार्च 2026

प्रथम भाव सम्बन्धी योग

 

लग्नेश निर्बल होकर अष्टमेश के साथ सुख, सुत या भाग्य भाव में बैठा हो तो जातक दिवालिया हो जाता है।

लग्नेश लग्न में हो तो जातक जीवनभर सुखोपभोग करता है।

लग्नेश धन भाव में, धनेश लाभ भाव में और लाभेश लग्नस्थ हो तो जातक आकस्मिक रूप से धनी बन जाता है।

लग्न में पाप ग्रह हों तो जातक भगीरथ प्रयत्न करने पर भी दुःखों से छुटकारा नहीं पाता अर्थात् जीवनभर दुःखी रहता है।

लग्न में शनि, रिपु भाव में मंगल और अष्टम भाव में राहु हो तो जातक जीवनभर कष्ट भोगता है।

लग्नेश और पंचमेश एक साथ हों या पंचमेश को बली लग्नेश देखता हो या लग्नेश-नवमेश सप्तमस्थ हों, तो जातक को उत्तम सन्तान की प्राप्ति होती है।

यदि लग्नेश बुध के साथ लग्न के अतिरिक्त कहीं बैठा हो, तो जातक को सन्तानहीन बनाता है।

लग्न, सप्तम और व्यय भाव में पापी ग्रह स्थित हों तो जातक का विवाह नहीं होता लग्नेश और अष्टमेश लग्नस्थ हों तो जातक दीर्घायु होता है।

लग्नेश और पंचमेश में स्थान-परिवर्तन योग होने से जातक अटूट सम्पत्ति का स्वामी बनता है।

दूसरे तथा सातवें भाव के स्वामी लग्न में हों तो जातक के उत्तम विवाह का योग घटित होता है।

लग्नेश बलवान् हो या केन्द्र या कोण में स्थित हो, तो जातक दीर्घायु होता है। निर्बल लग्नेश पापराशिस्थ या त्रिक स्थान में स्थित हो तो जातक अल्पायु होता है

मेष लग्न में लग्नेश और सुखेश युक्त होकर स्थित हों तो जातक महान् धनी होता है। लग्न सहित चारों केन्द्र स्थान रिक्त हों तो जातक अरबपति के घर उत्पन्न होकर भी दरिद्र बन जाता है।

लग्नेश शुक्र हो तथा केन्द्र में हो और गुरु भी केन्द्र में हो, तो जातक प्रसिद्ध गायक होता है।

लग्नेश कोण में तथा धनेश एकादश में होकर धन भाव को देख रहा हो, तो जातक लक्ष्मीवान् होता है। एकादश से द्वितीय भाव चौथा है और मंगल ही ऐसा ग्रह है जो अपने से चतुर्थ स्थान को पूर्ण दृष्टि से देखता है तो यह योग मीन लग्न और तुला लग्न में ही घटित होता है।

षष्ठेश सूर्य से युक्त होकर लग्न में हो तो मुखरोग होता है।

लग्नेश अष्टमेश के साथ लग्न के अतिरिक्त कहीं बैठा हो, तो रोगी बनाता है।

उच्च का बृहस्पति लग्न में हो तो जातक उत्तम विद्या प्राप्त कर लेता है।