लग्नेश निर्बल होकर अष्टमेश के साथ सुख, सुत या भाग्य भाव में बैठा हो तो जातक दिवालिया हो जाता है।
लग्नेश लग्न में हो तो जातक जीवनभर सुखोपभोग करता है।
लग्नेश धन भाव में, धनेश लाभ भाव में और लाभेश लग्नस्थ हो तो जातक आकस्मिक रूप से धनी बन जाता है।
लग्न में पाप ग्रह हों तो जातक भगीरथ प्रयत्न करने पर भी दुःखों से छुटकारा नहीं पाता अर्थात् जीवनभर दुःखी रहता है।
लग्न में शनि, रिपु भाव में मंगल और अष्टम भाव में राहु हो तो जातक जीवनभर कष्ट भोगता है।
लग्नेश और पंचमेश एक साथ हों या पंचमेश को बली लग्नेश देखता हो या लग्नेश-नवमेश सप्तमस्थ हों, तो जातक को उत्तम सन्तान की प्राप्ति होती है।
यदि लग्नेश बुध के साथ लग्न के अतिरिक्त कहीं बैठा हो, तो जातक को सन्तानहीन बनाता है।
लग्न, सप्तम और व्यय भाव में पापी ग्रह स्थित हों तो जातक का विवाह नहीं होता । लग्नेश और अष्टमेश लग्नस्थ हों तो जातक दीर्घायु होता है।
लग्नेश और पंचमेश में स्थान-परिवर्तन योग होने से जातक अटूट सम्पत्ति का स्वामी बनता है।
दूसरे तथा सातवें भाव के स्वामी लग्न में हों तो जातक के उत्तम विवाह का योग घटित होता है।
लग्नेश बलवान् हो या केन्द्र या कोण में स्थित हो, तो जातक दीर्घायु होता है। निर्बल लग्नेश पापराशिस्थ या त्रिक स्थान में स्थित हो तो जातक अल्पायु होता है ।
मेष लग्न में लग्नेश और सुखेश युक्त होकर स्थित हों तो जातक महान् धनी होता है। लग्न सहित चारों केन्द्र स्थान रिक्त हों तो जातक अरबपति के घर उत्पन्न होकर भी दरिद्र बन जाता है।
लग्नेश शुक्र हो तथा केन्द्र में हो और गुरु भी केन्द्र में हो, तो जातक प्रसिद्ध गायक होता है।
लग्नेश कोण में तथा धनेश एकादश में होकर धन भाव को देख रहा हो, तो जातक लक्ष्मीवान् होता है। एकादश से द्वितीय भाव चौथा है और मंगल ही ऐसा ग्रह है जो अपने से चतुर्थ स्थान को पूर्ण दृष्टि से देखता है तो यह योग मीन लग्न और तुला लग्न में ही घटित होता है।
षष्ठेश सूर्य से युक्त होकर लग्न में हो तो मुखरोग होता है।
लग्नेश अष्टमेश के साथ लग्न के अतिरिक्त कहीं बैठा हो, तो रोगी बनाता है।
उच्च का बृहस्पति लग्न में हो तो जातक उत्तम विद्या प्राप्त कर लेता है।