1. आवासीय भवन के लिए यथासम्भव वर्गाकार या आयताकार भूखण्ड का चयन करें क्योंकि वे शुभ होते हैं ।
2.. शुभ लग्न, तिथि, वार और मास में ही, उत्तरायण में, चर लग्न में गृहारम्भ करें ताकि गृहनिर्माण कार्य शीघ्र पूरा हो ।
3. गृह प्रवेश स्थिर लग्न में ही करें इससे भवन को स्थायित्व प्राप्त होता है ।
4. भवन निर्माण के लिए चयनित भूमि दोषरहित व चिकनी तथा ठोस मिट्टी से युक्त होनी चाहिए।
5. भूखण्ड का ढलान पूर्व की ओर शुभ व उत्तरोत्तर प्रगतिदाता होता है और उत्तर की और धन प्रदायक होता है ।
6. भवन निर्माण में ईशान में अधिक खुली जगह छोड़नी चाहिए ।
7. इस बात का विशेष ध्यान रखें कि ब्रह्म स्थान दूषित न हों ।
8. कुआं, बोरिंग, भूमिगत टैंक, ईशान में पुष्टिवर्द्धक,पूर्व में ऐश्वर्यशाली, पश्चिम में सम्पत्ति व लाभवर्द्धक और उत्तर में सुखदायी होते हैं । भूमिगत जल दक्षिण दिशा में कदापि नहीं होना चाहिए ।
9. भवन का दक्षिण-पश्चिम भाग हमेशा अन्य भागों से ऊंचा बनाना चाहिए- इससे यश, प्रतिष्ठा, स्वास्थ्य, अर्थलाभ, संतति विकास और अधिकार मिलते हैं ।
10. सेप्टिक टैंक पूर्व-पश्चिम में अधिक लंबा और उत्तर-दक्षिण में कम लंबा होना चाहिए तथा मकान की दीवार, नींव, चारदीवारी या बेसमेंट से कम से कम साढ़े चार फीट दूरी पर बनाना चाहिए।
11. सेप्टिक टैंक की ऊंचाई भूमि के तल से अधिक नहीं होनी चाहिए।
12. भवन का एक ही द्वार रखना हो तो पूर्व दिशा में ही बनाना श्रेष्ठ होता है।
13. देवस्थान,यज्ञ मण्डल,सभागार,सार्वजनिक भवनों, स्मारकों एवं जैन मंदिरों में चारों दिशाओं में द्वार बनाए जा सकते हैं ।
14. द्वार के सामने और द्वार के ऊपर द्वार नहीं बनाने चाहिए।
15. पदवास्तु में जिन स्थानों के स्वामी ईशा,अग्नि, सूर्य, सोम एवं ब्रह्मा हैं- भूखण्ड में उनकी दिशा के स्थान शुभ ऊर्जा स्थान हैं । वहां सूर्य का प्रकाश आने देना चाहिए- इससे जीवन में शक्ति एवं स्फूर्ति आती है।
16. पूर्व या उत्तर दिशा में खुली जगह छोड़कर लॉन या पौधे लगाए जा सकते हैं।
17. बिजली का मीटर, स्विच बोर्ड, जनरेटर आदि आग्नेय कोण या पूर्व से दक्षिण दिशा में लगाने चाहिए।
18.मुख्य द्वार पर स्वस्तिक का चिह्न तथा दोनों ओर शुभ-लाभ एवं रिद्धि-सिद्धि लिखना शुभ होता है।
19. चम्पा, चमेली, गुलाब, केले, केतकी के वृक्ष घर के पास शुभ माने गए हैं।
20. देवताओं, प्राकृतिक फूल, कलियों के चित्र, घर में प्रसन्नतादायक होते हैं।
21. स्नानघर पूर्व दिशा मध्य में प्रशस्त हैं।
22. शयन कक्ष दक्षिण दिशा मध्य में प्रशस्त है।
23. लोग घरों में कई-कई मूर्तियां और चित्र लगा लेते हैं, उनका कोई अर्थ नहीं है। मूर्तियां प्राण-प्रतिष्ठा के बिना फल देने में सक्षम नहीं होती, अत: प्राण-प्रतिष्ठा के बिना पूजा-पाठ की जगह व पद्धति का अधिक महत्त्व है। इस दृष्टि से ईशान कोण में बैठकर पूजा करना श्रेष्ठ रहता है। वायव्य कोण में बैठकर पूजा करने से उच्चाटन की स्थिति होती है। एकाग्रता प्राप्त नहीं होती। नैऋत्य कोण में प्राणायाम या समाधि की स्थिति में निद्रा अधिक आती है।
24. मूर्तियां यदि हों तो गणेश जी दो से अधिक नहीं होने चाहिए। शालिग्राम एक हो सकते हैं।
25.अष्टधातु से निर्मित अंगूठी पहनने से नवग्रहों के दोषों का निवारण होता है।
26. ईशान कोण में तुलसी और केले का पौधा लगाना और उनकी पूजा करना शुभ होता है।
27. मृदु ध्रुवसंज्ञक नक्षत्र तथा पुष्य और स्वाति नक्षत्रों में नए और पुराने घर में प्रवेश शुभ होता है।
28. विद्वानों और विद्यार्थियों को पूर्व दिशा में सिर करके सोने से विद्या का लाभ होता है।
29. दक्षिण दिशा में सिर करके सोने से सुख- संपत्ति का लाभ होता है।
30. फल वाले वृक्षों की लकड़ी, चंदन की लकड़ी और हाथी दांत से अलंकृत आसन व पलंग शुभ होते हैं।