वैदिक ज्योतिष पर आधारित यह लेख मुख्य रूप से इस बात पर केंद्रित है कि ग्रहों की स्थिति किसी व्यक्ति के धार्मिक झुकाव और इष्ट देव (किस देवता की पूजा करनी चाहिए) को कैसे प्रभावित करती है ।
1.शनि जब नौवें
भाव (धर्म और भाग्य का स्थान) में होता है, तो एक विशिष्ट
आध्यात्मिक स्थिति उत्पन्न करता है । यह बताता है कि
ऐसा व्यक्ति पारंपरिक विचारों से थोड़ा अलग (सर्वदर्शनविमुख) हो सकता है, लेकिन
वह गहराई से धार्मिक होता है और राजा
होकर भी धार्मिक विचारो मे अग्रसर होकर एक सच्चा उपासक
बनता है ।
2. पंचम भाव में
पुरुष ग्रह यदि पंचम भाव (बुद्धि और भक्ति का स्थान) में कोई पुरुष ग्रह बैठा हो
और उस पर किसी अन्य पुरुष ग्रह की दृष्टि होतो जातक किसी पुरुष देवता का उपासक
बनता है ।
3. पंचम भाव पर
स्त्री प्रभाव यदि पंचम भाव की राशि स्त्री राशि (जैसे वृष, कर्क
आदि) हो और उसमें चंद्रमा या शुक्र बैठा होतो जातक किसी देवी (शक्ति) का उपासक
होता है ।
सूर्य जातक को
स्वयं सूर्य की उपासना में अग्रसर करता है ।
चंद्रमा माता
पार्वती का उपासक बनाता है ।
मंगल कुमार
कार्तिकेय की उपासना की ओर झुकाव पैदा करता है ।
बुध भगवान
विष्णु की उपासना में दृढ़ बनाता है ।
गुरु भगवान शिव
(शंकर जी) की उपासना में निष्ठा देता है ।
शनि, राहु
या केतु: यदि ये पंचम भाव में हों या इनकी दृष्टि हो, तो
जातक "अन्य देवों" या कुछ अलग पद्धतियों की उपासना करता है ।
5वे या नौवें भाव में शनि एक
"विचित्र" धार्मिक प्रवृत्ति पैदा करता है । उदाहरण के लिए, ऐसा
व्यक्ति धर्म परिवर्तन कर सकता है या अवधूत (सांसारिक बंधनों से मुक्त फकीर) बन
सकता है ।
नवम भाव का
प्रभाव: यदि नौवें घर (भाग्य) का स्वामी बलवान होकर लग्न (पहले घर), चौथे,
सातवें या दसवें घर में बैठा हो और उस पर शुभ ग्रहों की दृष्टि हो,
तो ऐसा व्यक्ति बहुत धनवान होने के साथ-साथ कट्टर धार्मिक भी होता है
।
उच्च का नवमेश:
यदि नौवें घर का स्वामी अपनी उच्च राशि में हो, उस पर गुरु की
दृष्टि हो और नौवें घर में भी शुभ ग्रह बैठे हों, तो व्यक्ति
धार्मिक कार्यों में अग्रणी रहता है ।
गुरु और नवमेश
का संबंध: यदि नौवें घर का स्वामी (नवमेश) पूरी तरह बलवान हो और उस पर तथा लग्न के
स्वामी (लग्नेश) पर गुरु की पूर्ण दृष्टि हो, तो जातक महान
धार्मिक व्यक्तित्व वाला होता है ।
दानी होने की
स्थिति: यदि नौवें घर का स्वामी लग्न या लग्नेश पर पूर्ण दृष्टि डालता हो और वह
केंद्र या त्रिकोण भावों में स्थित हो, तो जातक धार्मिक
होने के साथ-साथ बहुत दानी भी होता है ।
सिंहासनांश
योग: यदि नौवें घर का स्वामी 'सिंहासनांश' (एक
विशिष्ट ज्योतिषीय गणना) में हो और उस पर लग्नेश या दशमेश (दसवें घर का स्वामी) की
दृष्टि हो, तो व्यक्ति पूर्णतः धर्मात्मा और दानवीर होता
है ।
परोपकारी
स्वभाव: यदि ग्रहों के योग के साथ चंद्रमा भी उच्च का हो और उस पर नवमेश की दृष्टि
हो, तो जातक धार्मिक और दूसरों का उपकार करने वाला
(उपकारी) होता है ।
गुरु, बुध
और मंगल: यदि कुंडली में गुरु, बुध या मंगल के साथ बैठा हो, तो
ऐसा व्यक्ति धर्म-कर्म के कार्यों में हमेशा आगे रहता है ।
दशम भाव (कर्म)
की भूमिका: यदि दसवें घर का स्वामी (दशमेश) अपने ही घर में हो, या
केंद्र/त्रिकोण में स्थित हो, तो व्यक्ति धर्म के मार्ग पर अडिग रहता
है ।
दशमेश बुद्ध हो
और जातक के गुरु भी बली हो या चंद्रमा तीसरे भाव में हो तो जातक धर्मशील होकर यश
प्राप्त करता है |
नवमेश यदि बृहस्पति के साथ हो और
षडवर्गों में बली हो या लग्नेश पर गुरु की पूर्ण दृष्टि हो तो जातक धर्म परायण
होता है |
बुद्ध दशमस्थ
होकर गुरु के साथ हो तो जातक धर्मात्मा होकर यश प्राप्त करता है |
दशमेश के साथ
बुद्ध भी दशम भाव में हो तो जातक धर्म में तत्पर हो जाता है |