सोमवार, 29 नवंबर 2010

भाग्य अंक द्वारा शुभ मुहूर्त जानिए

ज्योतिष शास्त्र में किसी विशेष कार्य को करने  के लिए चन्द्र की गति एवं नक्षत्र आदि की गणना  से उचित समय (मुहूर्त ) को निकाला जाता हैं परन्तु अंक ज्योतिष में भाग्यांक के अनुसार दिए गए समय में कोई भी अपना शुभ मुहूर्त का समय जान सकता हैं | यहाँ मैं उसी भाग्यांक मुहूर्त तालिका को पाठको हेतु प्रेषित कर रहा हूँ |

भाग्यांक १) प्रात: ५.२० से ८ तथा दोपहर १.२० से ४ बजे तक 

भाग्यांक २) प्रात: ८ से १०.४० तथा सायं ६.४० से ९.२० बजे तक 

भाग्यांक ३) प्रात: ५.२० से ८ तथा दोपहर १.२० से ४ बजे तक

भाग्यांक ४) प्रात: ८ से १०.४०  तथा सायं ६.४० से ९.२० बजे तक 

भाग्यांक ५) प्रात: ६.४०  से १.२०  तथा सायं ४ से ६.४० बजे तक 

भाग्यांक ६) प्रात: ५.२० से ८ तथा दोपहर १.२० से ४ बजे तक

भाग्यांक ७) प्रात: १०.४० से १.२० तथा सायं ५ से ६.४० बजे तक 

भाग्यांक ८)प्रात: ८ से १०.४० तथा सायं ६.४० से ९.२० बजे तक 

भाग्याक ९) दोपहर १.२० से ४ तथा रात्रि ९.२० से १२ बजे तक 

अंक ज्योतिष के आधार पर दिन के २४ घंटो में प्रत्येक २.४० मिनट के अंतराल पर "समय खंड"के लिए एक खास अंक रखा गया हैं जिसे "समयांक" कहाँ जाता हैं और अगर यह समयांक आपके भाग्यांक के मित्रो में आता हैं तो अवश्य ही वह आपके लिए हितकर होगा | दी  गयी तालिका के समयानुसार आ़प कोई भी शुभ कार्य कर सकते हैं |

शुक्रवार, 26 नवंबर 2010

भाग्य अंक का मंत्र

हमारी जन्म तारीख का योग भाग्यांक कहलाता हैं यह भाग्यांक बहुत सी  जानकारी व्यक्ति विशेष के बारे में देता हैं प्रत्येक भाग्यांक का  एक निश्चित मंत्र होता हैं जिस को प्रतिदिन  जपने से भाग्य प्रबल  होता हैं  यहाँ प्रत्येक भाग्यांकानुसार मंत्र दिया जा रहा हैं आशा हैं पाठकगण इनसे लाभान्वित होंगे |

भाग्यांक १ का मंत्र हैं "ॐ"हैं जिसे १० बार प्रतिदिन जपना चाहिए इस अंक के इष्ट देवता "श्री विष्णु" हैं |

भाग्यांक २ का मंत्र "श्री माँ "हैं जिसे ११ बार जपना चाहिए इस अंक के इष्ट "माँ लक्ष्मी" हैं |                             

भाग्यांक ३ का मंत्र "श्री राम "हैं जिसे २१ बार जपना चाहिए इस अंक के इष्ट "श्री राम " हैं |

भाग्यांक ४ का मंत्र "हरे कृष्ण "हैं जिसे ११ बार जपना चाहिए इस अंक के इष्ट "श्री कृष्ण " हैं | 

भाग्यांक ५ का मंत्र "नमः शिवाय"हैं जिसे २१ बार जपना चाहिए इस अंक के इष्ट "भगवान शंकर" हैं |

भाग्यांक ६ का मंत्र "ॐ नमः शिवाय"हैं जिसे २१ बार जपना चाहिए इस अंक के इष्ट "भगवान शंकर " हैं |

भाग्यांक ७ का मंत्र "श्री गणेशाय नमः"हैं जिसे २१ बार जपना चाहिए इस अंक के इष्ट " श्री गणेश " हैं |

भाग्यांक  ८  का मंत्र "ॐ नमो नारायणाय" हैं जिसे ११ बार जपना चाहिए इस अंक के इष्ट "श्री विष्णु "हैं |

भाग्यांक ९ का मंत्र "ॐ गं गणपतये नमः "हैं जिसे २१ बार जपना चाहिए इस अंक के इष्ट देवता "श्री गणेश "हैं |

शुक्रवार, 19 नवंबर 2010

मांगलिक दोष परिहार

ज्योतिष शास्त्र में अनेक स्थानों पर लिखा गया है कि यदि मंगल ग्रह जन्मकुंडली  मे प्रथम,चतुर्थ,सप्तम,अष्टम और द्वादस भावो  में हो तो व्यक्ति विशेष को मांगलिक दोष होता हैं | दक्षिण भारत में दुसरे भाव स्थित मंगल ग्रह को भी मंगल दोष में रखा गया हैं |

मांगलिक दोष प्राय: लग्न कुंडली से देखा जाता हैं परन्तु शास्त्रों में इसे चन्द्र कुंडली से भी देखने के लिए कहाँ गया हैं | कुंडली में इस प्रकार देखने पर मंगल दोष लगभग आधी कुंडलियो में प्राप्त होता हैं जिससे अधिकाँश मेलापक कुंडलियो  में मांगलिक दोष मिलना स्वाभाविक हो जाता हैं | शास्त्रों में इसी आधार पर मांगलिक दोष होने पर उसके परिहार सम्बन्धी नियम भी  बताये गए हैं जिनसे मंगलदोष समाप्त अथवा प्रभावहीन माना जाता हैं | ऐसे नियम या योग हैं जो मांगलिक दोष को भंग कर देते हैं ऐसे ही कुछ योग निम्न हैं | 

१) यदि मंगल स्वराशी अथवा ऊँच राशी का हो |
२) यदि मंगल गुरु ग्रह की राशी में हो अथवा राहू के साथ हो |
३) केंद्र त्रिकोण में शुभ ग्रह,तीसरे,छठे,ग्यारहवे भावो में पाप ग्रह तथा सप्तमेश सप्तम में हो |
४) सप्तमस्थ मंगल पर गुरु की दृष्टी हो |
५) यदि एक कुंडली में मंगली योग हो तथा दुसरे की कुंडली में उन्ही भावो में पाप ग्रह(राहू,शनि ) हो |
६) यदि अधिक गुण मिलते हो |
७) वर या कन्या की  कुंडली में से एक मंगली हो और दुसरे की कुंडली में ३,६,११,भावो में मंगल,राहू या शनि हो |
८) यदि १२ भाव में मंगल,शुक्र व बुध स्वराशि का हो |
९) यदि मंगल वक्री,नीच या अस्त हो |
१०) ४ तथा ७ भाव में मेष अथवा कर्क का मंगल हो |
११) यदि गुरु बली हो और शुक्र ऊँच अथवा स्वराशी का होकर सप्तम भाव  में हो |
१२) मंगल,सूर्य,राहू या शनि संग स्थित हो |
१३)चन्द्र मंगल् का योग हो(केंद्र व धन स्थान में ) |
१४) मंगल गुरु की युति हो अथवा गुरु मंगल पर दृष्टी ड़ाल रहा हो |
१५) कुंडली में गुरु व शनि अधिक बलवान हो | ............................................

गुरुवार, 11 नवंबर 2010

मंगलवार, 2 नवंबर 2010

" ज्योतिष एवं दीपावली"

ज्ञान (प्रकाश) और साधना(दीपक) के द्वारा दिवाली  के दिन माँ लक्ष्मी की लक्ष्मी प्राप्ति हेतु पूजा,अर्चना की जाती हैं, आदिकाल से ही चंचला लक्ष्मी को अपने घर परिवार में बुलाने का उपक्रम दिवाली की रात्रि को किया जाता हैं इस विश्वास के साथ की माँ लक्ष्मी प्रसन्न  होकर साधक अथवा जातक को सम्पतिवान कर देंगी |

ज्योतिष के अनुसार सूर्य को राजा एवं चन्द्र को रानी का दर्जा दिया गया हैं अमावस की रात इन दोनों के मिलन की रात होती हैं (इसी प्रकार भगवान राम और सीता का मिलन भी इसी अमावस की रात में हुआ था ) चन्द्रमा मन के अतिरिक्त जनता का तथा सूर्य आत्मा,पद व मान का प्रतिनिधित्व करते हैं, अयोध्या की जनता ने शायद अपने सुर्यवंसी राजा राम के दर्शनों हेतु इसी कारण अमावश (जब सूर्य चन्द्र मिलते हैं ) का दिन चुना होगा | धरती पर अमावस का दिन सूर्य (आत्मा) व चन्द्र (मन) का आत्मरूप होना दर्शाता हैं जो की अध्यात्मिक दृष्टी से एक दुर्लभ संयोग हैं | यहाँ ये भी ध्यान दे की चन्द्र (उच्च) का वृष राशी में तृतीय अंश (सूर्य के कृतिका नक्षत्र में) में होना ही उसे उच्चता प्रदान करता हैं जो इस बात का घोतक हैं की बिना आत्मा के मन नहीं हो सकता इसलिए मन और आत्मा के भेद बताने की रात्रि हैं "दीपावली"

जहाँ  प्रकाश होता हैं वहां अन्धकार नहीं रह सकता हैं और जहाँ अन्धकार  नहीं होता वहां धन समृद्दी को आना ही पड़ता हैं वैसे भी वर्षा ऋतू के बाद कार्तिक मास ठण्ड की अधिकता दर्शाने लगता हैं जिससे दीपक  की गर्मी व आरोग्यता का आगमन जन साधारण हेतु लाभदायक हो जाता हैं |

दीप अथवा दिया (मंगल) तेल (शनि)के मिलने से प्रकाश (बिजली) जन्म लेती हैं जिसके बिना ये संसार चलायमान नहीं रह सकता | पीली लौ (गुरु) तथा सफ़ेद प्रकाश (शुक्र) व इनके योगो से हरा (बुध) व धुंआ राहू केतु का प्रतीक बनते हैं जो की दिवाली की रात्रि सम्पूर्ण नवग्रह व ब्रह्माण्ड की उपयोगिता ज्योतिष शास्त्र में सम्पूर्ण करते दिखाई देते हैं |