शनिवार, 17 मार्च 2018

दुर्गा सप्तशती के अध्याय से कामनापूर्ति



1) प्रथम अध्याय - हर प्रकार की चिंता मिटाने के लिए |

2) दूसरा अध्याय - मुकदमे,झगडे आदि मे विजय पाने के लिए |

3) तीसरा अध्याय - शत्रु से छुटकारा पाने के लिए |

4) चतुर्थ व पंचम अध्याय - भक्ति,शक्ति तथा दर्शन के लिए |

5) छठा अध्याय - डर,शक बाधा हटाने के लिए |

6) सप्तम अध्याय - हर कामना पूर्ण करने के लिए |

7) अष्टम अध्याय - मिलाप व वशीकरण करने के लिए |

8)नवम व दशम अध्याय - गुमशुदा की तलाश एवं पुत्र प्राप्ति के लिए |

9) एकादश अध्याय - व्यापार व सुख संपती के लिए |

10) द्वादश अध्याय - मान सम्मान व लाभ के लिए|

11) त्रियोदश अध्याय - भक्ति प्राप्ति के लिए |



गुरुवार, 15 मार्च 2018

ग्रह और माँ दुर्गा



प्रस्तुत लेख मे नवरात्रि मे किस ग्रह को शुभ करने हेतु किस देवी या महाविधा का पूजन करना चाहिए यह बताया गया हैं साथ साथ उन्हे किस खाद्य पदार्थ का भोग लगाना चाहिए यह भी बताया गया हैं आशा हैं इससे हमारे पाठकजन लाभान्वित होंगे |

ग्रह – नवदेवी - दस महाविधा – भोग


सूर्य – शैलपुत्री – मातंगी – गाय घी

चन्द्र - कुष्मांडा – भुवनेश्वरी - मालपूए

मंगल – स्कंदमाता – बगलामुखी - केले

बुध – कात्यायनी – षोडसी - शहद

गुरु – महागौरी – तारा - नारियल

शुक्र - सिद्दीदात्री – कमला - तिल

शनि – कालरात्रि – काली - गुड

राहू – ब्रह्मचारिणी – छिन्नमस्ता - शक्कर

केतू - चंद्रघंटा – धूमावाती - खीर



बुधवार, 14 मार्च 2018

कुंडली के शुभाशुभ ग्रहो का विश्लेषण

सर्वप्रथम कुंडली के शुभ अशुभ व सम ग्रहों का निर्धारण करें |

इसके बाद कुंडली में ग्रहों का भाव व अन्य ग्रहों पर प्रभाव का मूल्यांकन करें |

इसके बाद भाव पर पड़ने वाले शुभ अशुभ प्रभाव का अध्ययन करें |

इसके बाद नवांश कुंडली का अध्ययन करें |

दोनों कुंडलियों के प्रभावों को देख कर ही फलादेश दें |

कुंडली संख्या 1)5/11/1970 2:25 दिल्ली स्त्री की पत्रिका कुंभ लग्न की है सर्वप्रथम शुभ अशुभ ग्रहों का निर्धारण करते हैं |

सूर्य सप्तम भाव का स्वामी होने से शुभ है तथा साथ में मारकेश भी है जिससे हम विवाह,जीवन साथी व्यापार आदि का अध्ययन करेंगे | मारकेश से हमारा मुख्य तात्पर्य उस ग्रह से है जिसकी दशा अंतर्दशा में जातक को मृत्यु तुल्य कष्ट हो सकते हैं यह तभी संभव होता है जब मारकेश (दूसरे अथवा सातवें भाव का स्वामी ) निर्बल पीड़ित हो |

चंद्र छठे भाव का स्वामी होने से अशुभ है |

मंगल सम राशि दशम भाव में व मूल त्रिकोण राशि तीसरे भाव में होने से शुभ है अर्थात इसका संबंध व प्रभाव अन्य ग्रह व भाव पर शुभ होगा |

बुसम राशि पंचम में व मूल त्रिकोण राशि अष्टम में होने से अशुभ ग्रह है परंतु पंचम भाव के फल भी देगा इस स्थिति में पंचम भाव संबंधी फलों की जानकारी के लिए बुध व गुरु भाव कारक का अध्ययन भी करना पड़ेगा |

गुरु मूल त्रिकोण राशि लाभ स्थान व सम राशि दूसरे भाव में होने से सम ग्रह हैं और इसकी स्थिति पर ही इसका प्रभाव निर्भर करेगा,अशुभ ग्रहों के प्रभाव में अशुभ ग्रह के प्रभाव में अशुभ फल देगा और स्वतंत्र रुप से कोई फल नहीं दे पाएगा |

शुक्र मूल त्रिकोण भाग्यस्थान व सम राशि चतुर्थ में होने से अत्यंत शुभ और योगकारक हैं |

शनि मूल त्रिकोण लग्न में व सम राशि 12 भाव मे होने से शुभ है |

नोट- मंगल की भी एक राशि केंद्र दूसरे सम भाव में है परंतु शनि के मूल त्रिकोण राशि केंद्र में है जबकि मंगल की मूल त्रिकोण राशि समभाव में होने से शनि मंगल से अधिक शुभ ग्रह है |

इस प्रकार कुंडली में शुक्र,सूर्य,शनि मुख्य शुभ ग्रह हैं,मंगल साधारण शुभ,गुरू सम तथा चंद्र,बुध अशुभ ग्रह बनते है |

राहु केतु की शुभता का निर्धारण मुख्य रूप से उन पर पड़ने वाले प्रभाव अथवा उनकी स्थिति पर निर्भर करता है |

प्रस्तुत कुंडली में जन्म समय जातक के द्वारा ही दिया गया है इसलिए इसका सत्यापन करना ज़रूरी नहीं हैं इसके लग्न पर राहु में गुरु की दृष्टि का मालूम प्रभाव पड़ता है पर वास्तव में ऐसा नहीं है क्यूंकी राहु लग्न के अंशो मे करीब 9 अंश और गुरु व लग्न के अंशो मे करीब 7 अंशो का अंतरा हैं | लग्न कुंडली के भावो पर प्रभाव डालने वाले मंगल और सूर्य ही हैं | ग्रहो के आपसी संबंधो की बात करे तो  निम्नलिखित तथ्य मिलते हैं |

1)लग्नेश शनि पर भाग्य स्थान में बैठे चारों ग्रहों की दृष्टि है जिनमें शुक्र,सूर्य का प्रभाव शुभ तथा बुध का अशुभ है,गुरू सम व अस्त भी है अत:गुरु का कोई शुभ प्रभाव शनि पर नहीं हैं |

2)सप्तमेश सूर्य अन्य ग्रहों का प्रभाव इस प्रकार से है बुध सूर्य के अंशो मे 5:30 अंशो का अंतर होने से सूर्य बुध से सुरक्षित है शुक्र सूर्य के अंशों में करीब 8 अंशो का अंतर होने से शुक्र का भी सूर्य पर प्रभाव नहीं है गुरु सम ग्रह होकर सूर्य को प्रभावित कर रहा है | इस प्रकार गुरु के ऊपर 
बुध और सूर्य का प्रभाव है तथा शुक्र के ऊपर भी बुध और सूर्य का ही प्रभाव है |

सबसे पहले सूर्य सप्तमेश सूर्य नीच में होने राशि में होने से निर्बल है परंतु कुंडली में भाग्य स्थान में बैठने से बली है | सूर्य शुक्र की राशि में बैठा है इसलिए शुक्र के बल का भी विचार करना होगा शुक्र भाग्येश होने से बली हैं | साधारण बल के अनुसार अस्त व वृद्दावस्था में हैं इस प्रकार शुक्र साधारण रहता हैं | तीसरे भाव में शनि की दृष्टि शुक्र को विशेष बल प्रदान कर रही है इस प्रकार शुक्र बली हुआ शुक्र के बली होने के कारण शुक्र की राशि में बैठे अन्य 3 ग्रहो को विशेष बल प्राप्त कर रहे हैं |
इस प्रकार सूर्य गुरु बुध को विशेष बल प्राप्त हुआ और उनके फल प्रदान करने की क्षमता बढ़ गई | ग्रहों के बल का महत्व उनसे संबंधित फलों के लिए ही होता है | अशुभ फल प्रदान करने के लिए ग्रह का बल कोई महत्व नहीं रखता |

इस पत्रिका में नवांश वर्गोत्तम है इस कारण नवांश कुंडली में शुभ अशुभ ग्रहों का निर्धारण दोबारा नहीं करना पड़ेगा |

हम शुरुआत करते हैं सप्तम भाव से साधारण धारणा के अनुसार सप्तम भाव में केतु अनिष्टकारी होता है सप्तमेश सूर्य अपनी नीच राशि मे और भाग्य स्थान में तीन ग्रह के साथ बैठा है सूर्य पर शनि और राहु की दृष्टि है तिकारक गुरु अस्त है कुंडली में विवाह संबंधी दोष नजर आते हैं | अष्टम में बैठा मंगल इन दोषो को और भी बढ़ा रहा है अतः साधारण धारणा के अनुसार कन्या की विवाह में देरी,एक से अधिक विवाह नजर आते हैं |
परंतु ध्यान से देखें तो इस पत्रिका में सप्तम भाव पर केतु का प्रभाव लागू नहीं है | सूर्य के ऊपर सिर्फ गुरु का ही प्रभाव है जोकि सम भव का स्वामी होने से स्वतंत्र रूप से भक संबंधी फल ना देकर अपना स्वाभाविक फल ही देगा यह गुरु स्त्री कुंडली में प्रतिकारक होने से सूर्य पर प्रभाव डाल रहा है अस्तगत  होने बुसे पीड़ित होने से लाभ व धन स्थान का सुख नहीं दे पाएगा | इस प्रकार सप्तम भाव सुरक्षित,सप्तमेश सूर्य पर शुभ प्रभाव सूर्य की स्थिति सप्तम भाव को सुरक्षित और बली बना रही है  नवांश कुंडली में सप्तम भाव पर मंगल व गुरु की दृष्टि है लग्नेश शनि दशम भाव में बैठा सप्तम भाव को देखता है नवांश में सप्तम भाव बली हुआ | सप्तम भाव पर चंद्रमा की दृष्टि शुभ प्रभाव को कम कर रही है अत: 3 प्रभाव शुभ और एक अशुभ प्रभाव के कारण सप्तम भाव बली हुआ सप्तमेश सूर्य दूसरे भाव में बैठा दशम भाव के राहु से दृष्ट है जो एक अशुभ स्थिति है |जिससे हमें निम्न प्रकार की बातें पता चलती है

1)सप्तम भाव लग्न कुंडली सव सुरक्षित |

2)सप्तम भाव व नवांश कुंडली बली व सुरक्षित |

3)सप्तमेश लग्न कुंडली साधारण बली |

4)सप्तमेश नवांश कुंडली सम स्थान में राहु द्वारा दूषित |

सप्तमेश के नवांश में पीड़ा विवाहोपरांत भाग्य संबंधी कष्ट देगी जो दशा पर निर्भर होंगे |


इस जातिका का विवाह 18-19 वर्ष की आयु में हुआ जब दशा मंगल में केतु की थी और अब तक इसे विवाह संबंधी कोई विशेष कष्ट नहीं मिला है इसके पति के व्यवसाय में कुछ अस्थिरता आई थी जो उसकी पत्रिका मे दिखती है विवाह संपन्न परिवार में हुआ है और आर्थिक स्थिति मजबूत है |

शुक्रवार, 9 मार्च 2018

मोदीजी के दोबारा आने की संभावना

कुछ दिन पहले हमने अपनी पोस्ट मे लिखा था की तुला का गुरु फिल्म जगत के लिए अभी और भी बुरी खबरे देगा और इसके परिणाम दिखने भी लगे हैं श्रीदेवी,शम्मी तथा वडाली ब्रदर का अचानक जाना तथा इरफान खान को बीमारी होना जैसी खबरे हम सुन ही रहे हैं | हमारी इस पोस्ट को पढ़कर हमसे हमारे एक टेलीविज़न चैनल के मित्र ने यह जानना चाहा हैं की क्या 2019 मे मोदीजी दोबारा आएंगे | इस पर हालांकि अभी कुछ भी कहना जल्दबाज़ी हो सकती हैं पर हमारे विचार इस प्रकार से हैं
मोदीजी के दोबारा आने की संभावना काफी नजर आती हैं और इसके हमारे अनुसार 3 कारण हैं |

1) राजनीतिक कारण - विपक्ष का शक्तिशाली ना होना तथा किसी का भी मोदी जी के बराबर कद ना होना हैं |

2) भारत के हिन्दू - हम 2014 मे अपने पोस्ट मे लिख चुके हैं की 2019 का चुनाव हिन्दू वर्सेस ऑल का होगा | इन पांचों वर्षो मे जो कुछ भी हो रहा हैं उससे हिन्दू काफी हद तक विपक्ष की राजनीति समझ गए हैं |

3)ज्योतिषीय कारण –भारत की कुंडली मे चुनाव समय चन्द्र मे गुरु का प्रभाव होगा गुरु ग्रह का गोचर चुनाव के समय भारत के सप्तम भाव मे होगा जो विपक्ष को हानी तथा सत्तारूढ़ दल को लाभ,भारतीयो को पराक्रम तथा सरकार को लाभ देगा |    

आप सब भी अपनी राय दे |

सोमवार, 5 मार्च 2018

लाल बहादुर शास्त्री की जैमिनी दशा


9 अक्टूबर 1904 10:25 बनारस वृश्चिक लग्न सूर्य आत्मकारक,चंद्रमा अमात्यकारक,शनि भातृ कारक,शुक्र मात्र कारक,मंगल पुत्र कारक,बुध ज्ञाति कारक तथा गुरु दारा कारक है लग्न के अंश 21 अंश 15 मिनट के है नवांश लग्न मकर,ड्रेष्कोण व होरा लग्न में,घटिका लग्न धनु,आरूढ़ लग्न वृषभ,श्री लग्न वृषभ,शफूट लग्न मेष,कारकांश लग्न कर्क तथा दिव्य लग्न सिंह है | गुरु योगदा ग्रह है क्योंकि वह कुंडली,नवांश,ड्रेष्कोण लग्नों को देखता है |

लग्नेश(मंगल) तथा योदा ग्रह(गुरु) की डिग्री का योग 12 से भाग देने पर दिव्य लग्न देता है यहां 12 डिग्री 29 अंश में 3 डिग्री 53 अंश जोड़ने पर हमें 16 डिग्री 22 अंश प्राप्त होते हैं जिसे 12 से भाग देने पर 4 डिग्री 22 अंश अथवा सिंह लग्न ता है |

लग्न व चंद्र से चंद्र मजबूत है क्योंकि वह 22 डिग्री 39 मिनट का है | चंद्र कन्या राशि मे हैं जिसमें तीन ग्रह हैं | चंद्र लग्नेश बुध 8 डिग्री 6 मिनट को शुक्र 18 डिग्री 5 मिनट से जोड़कर 12 से भाग देने पर तथा 5वे भाव से गिनने पर श्री लग्न आता है जो वृषभ है |

आत्मकारक 23 डिग्री में चंद्रमा 22 डिग्री 49 मिनट जोड़ने पर और उसे 9 से भाग देने पर मेष लग्न आता है जो स्फुट नवांश लग्न बनता है |

आयु
लग्न व चंद्र स्थिर द्विस्वभाव राशि दीर्घायु,
लग्नेश व अष्टमेश स्थिर व द्विस्वभाव राशि दीर्घायु
लग्न व आत्मकारक स्थिर एवं द्विस्वभाव राशि दीर्घायु
आत्म कारक से 3 व 11 वा राशि चर व स्थिर राशि दीर्घायु |
लग्न होरा लग्न स्थि राशि मध्य आयु |
अत्यधिक प्रभाव हैं जो जातक की दीर्घायु बताते हैं | आयु ब्रह्म से महेश तक होती है स्थिर दशा 7 से 5 तक जाती है हां महेश मंगल बनता है परंतु राशिघटता है क्योंकि आत्म कारक का अष्टमेष से संबंध है तथा शनि गुरु से दशम है तो आयु सिंह से कर्क तक जाती है तुला का शेष लेने पर 2 वर्ष आते हैं क्योंकि शुक्र 18 अंश 5 मिनट का है आयु 74 वर्ष आती है |

राजयोग
जन्म,होरा,व घटिका लग्न ग्रहों द्वारा दृष्ट है जो रायोनाते हैं पर इतने शक्तिशाली नहीं जब एक ही ग्रह से दृस्ट हो |
लग्न,नवांश,ड्रेष्कोण गुरु द्वारा दृष्ट है जो राजयोग है |
लग्न आरूढ़ लग्न केंद्र में है |
लग्न व सप्तमेश का दृष्टि संबंध |
लग्न में पंचमेश का दृष्टि संबंध |
आरूढ़ लग्न से लग्नेश और सप्तमेश संग है |
नवांश में लग्नेश सप्तमेश संग है |
ड्रेष्कोण में लग्नेश पंचमेश तथा पंचमेश सप्तमेश की युति है |
मंगल शुक्र केतु का दृष्टि संबंध कुंडली में है तथा नवमांश में तीसरे भाव में वैथनिक योग है |

इन्ही सब राजयोगों के कारण वह प्रधानमंत्री बने |

पिता की मृत्यु वृष की निरायशुल दशा मे हुई शुल राशि मकर है जो सप्तम से नवम है इस मकर राशि से नवम राशि कन्या हैं जहां पिता का कारक सूर्य स्थित है तथा अंतर्दशा मेष राशि की है जो कन्या से अष्टम भाव की राशि है पितृ राशि सिंह हैं जिसने मंगल है जो कन्या के अष्टम भाव का स्वामी है तथा मेष सिंह से नवम राशि है | प्रत्येक दशा का समय 9 वर्ष का है जिससे अंतर्दशा 9 माह की बनेगी जिससे वृषभ नौ माह तथा मेष नौ माह अर्थात 18 माह में अर्थात डेढ़ वर्ष मे पिता मरे |

23 वें वर्ष विवाह कन्या की दशा में हुआ जो 12 वर्ष की थी कन्या राशि में आत्मकारक सूर्य है जो आरूढ़ लग्न वृष से 5वे भाव की राशि तथा नवांश में पंचम से पंचम राशि हैं | अंतर्दशा तुला की थी विवाह कारक शुक्र (सप्तमेश जन्म लग्न का) हैं तथा आत्मकारक से दूसरे भाव मे भी हैं वही दारा कारक  गुरु आरूढ़ लग्न मे ही हैं गुरु आत्मकारक से सप्तमेश भी है |

चर दशा इस प्रकार से रही हैं |
वृश्चिक की 9 वर्ष
तुला की 12 वर्ष
कन्या की 12 वर्ष
सिंह की 11 वर्ष
कर्क की 10 वर्ष
मिथुन की 4 वर्ष
वृषभ की 5 वर्ष
मेष की 4 वर्ष तथा
मीन की 11 वर्ष रही


1930 में जेल गए जोकि कन्या/मकर की चर दशा थी मकर पाप राशि की दशा है जिसमें शनि है तथा मंगल राहु से दृष्ट है | 1947 में वह गृह मंत्री बने तब सिंह चर दशा थी जो लग्न से दसवीं,आरूढ़ लग्न से चतुर्थ तथा ड्रेष्कोण से 5वी,नवांश से आठवीं राशि है जिस राशि में लग्नेश मंगल हैं यह राशि दिव्य लग्न भी हैं तथा शुक्र शनि द्वारा दृष्ट भी है अंतर्दशा वृषभ राशि की जो सिंह से दसवीं राशि है लग्न से सप्तम व आरूढ़ व श्री लग्न भी है जिसको शुक्र शनि दोनों देख रहे हैं | नवांश में वृष राशि मे गुरु केतु है तथा 4 ग्रह देख रहे हैं | जिससे वृष राशि सबसे मजबूत तथा शुभ राशि बनी है जिसका स्वामी शुक्र स्वयं से छठे भाव में है तथा वृषभ राशि को देख भी रहा है लग्न से सप्तम होने से अंतरराष्ट्रीय प्रसिद्धि और गर्व भी दे रहा है

9 जून 1964 को जब प्रधानमंत्री बने तब दशा वृषभ में कुंभ की थी कुंभ राशि वृषभ राशि अथवा आरूढ़ लग्न से दसवी तथा लग्न से चौथी राशी है उसमे केतु बैठा है तथा वृष राशि के स्वामी शुक्र की उस पर दृस्टी भी हैं |