शुक्रवार, 29 अप्रैल 2022

अमरता प्राप्त करने तरीके

शिव पुराण मे भगवान शिव ने काल या मृत्यु को जीतकर अमरत्व प्राप्त करने की चार यौगिक साधनायें बताई हैं जो - प्राणायाम, भ्रुमध्य में अग्नि का ध्यान, मुख से वायुपान तथा मुड़ी से हुई जिव्हा द्वारा गले की घाँटी का स्पर्श करना हैं |

पार्वती शिव से बोली – प्रभो ! यदि आप प्रसन्न हैं तो योगी योगाकाशजनित वायु को जिस प्रकार प्राप्त होता है, वह सब मुझे बताइये।

भगवान शिव ने कहा – सुन्दरी ! इससे पूर्व मैने योगियों के हित की कामना से कालपर विजय प्राप्त करने की विधि का वर्णन किया है । योगी किस प्रकार वायु का स्वरूप धारण करता है, यह भी बताया है । अब और भी बताता हूँ - इससे पूर्व बताई गई विधि से योगशक्ति के द्वारा मृत्यु-दिवस को योगी जानकर और प्राणायाम में तत्पर हो जाय । ऐसा करने पर वह आधे मास में ही आनेवाले काल को जीत लेता है । हृदय में स्थित हुई प्राणवायु सदा अग्नि को उद्दीप्त करनेवाली है । उसे अग्नि का सहायक बताया गया है । वह वायु बाहर और भीतर सर्वत्र व्याप्त और महान है । ज्ञान, विज्ञान और उत्साह - सबकी प्रवृति वायु से ही होती है । जिसने वायु को जीत लिया, उसने इस सम्पूर्ण जगत पर विजय पा ली ।

साधक को चाहिये कि वह जरा (वृद्धावस्था) और मृत्यु को जीतने की इच्छा से सदा धारणा में स्थित रहे, क्योकि योगपरायण योगी को भलीभाँति धारणा और ध्यान में तत्पर रहना चाहिये । जैसे लोहार मुख से धौकनी को फूक-फूंककर उस वायु के द्वारा अपने सब कार्य सम्पन्न करता है, उसी प्रकार योगी को प्राणायाम का अभ्यास करना चाहिये । प्राणायाम के समय जिसका ध्यान किया जाता है, वे आराध्य देव परमेश्वर सहस्त्रों मस्तक, नेत्र, पैर और हाथों से युक्त हैं तथा समस्त ग्रन्थियों को आवृत करके उनसे भी दस अंगुल आगे स्थित हैं । आदि में व्याहृति और अंत में शिरोमंत्र सहित गायत्री का तीन बार जप करें और प्राणवायु को रोके रहें । प्राणों के इस आयाम का नाम प्राणायाम है ।

चन्दमा और सूर्य आदि ग्रह जा - जाकर लौट आते हैं परंतु प्राणायाम पूर्वक ध्यानपरायण योगी जाने पर भी नहीं लौटते हैं मुक्त हो जाते हैं | देवी जो द्विज 100 वर्ष तक तपस्या करके कुशों के अग्रभाग से एक बूंद जल पीता है वह जिस फल को पाता है वही ब्राह्मणों को एकमात्र धारण अथवा प्राणायाम द्वारा मिल जाता है जो द्विज प्रातः उठकर एक प्राणायाम करता है वह अपने संपूर्ण पाप को शीघ्र ही नष्ट कर देता है और ब्रह्मलोक को जाता है | जो आलस से रहित होकर सदा एकांत में प्राणायाम करता है वह जरा और मृत्यु की जीत कर वायु के समान गतिशील हो आकाश में विचरता है | वह सिद्दों के स्वरूप कांति मेधा पराक्रम और शौर्य को प्राप्त कर लेता है उसकी गति वायु के समान हो जाती है तथा उसे परम सुख की प्राप्ति होती है |

देवेश्वरी ! योगी जिस प्रकार वायु से सिद्धि प्राप्त करता है, वह सब विधान मैने बता दिया है । अब तेज से जिस तरह वह सिद्धि लाभ करता है, उसे भी बता रहा हूँ । जहा दूसरे लोगों की बातचीत का कोलाहल न पहुँचता हो, ऐसे शात एकांत स्थान में अपने सुखद आसन पर बैठकर चन्द्रमा और सूर्य (वाम और दक्षिण नेत्र) की कांति से प्रकाशित मध्यवर्ती देश भूमध्यभाग में जो अग्नि का तेज अव्यक्त रूप से प्रकाशित होता है उसे आलस्यरहित योगी दीपकर रहित अधकारपूर्ण स्थान में चिन्तन करने पर निश्चय ही देख सकता है इसमें संशय नहीं है । योगी हाथ की अंगुलियों से यत्नपूर्वक दोनो नेत्रों को कुछ-कुछ दबाये रक्खे और उनके तारों को देखता हुआ एकाग चित्त से आधे मुहूर्त तक उन्हीं का चिंतन करे । तदन्तर अंधकार में भी ध्यान करने पर वह उस ईश्वरीय ज्योति को देख सकता है । वह ज्योति सेंद, लाल, पीली, काली तथा इन्द्रधनुष के समान रंग वाली होती है । भौंहों के बीच में ललाटवर्ती बालसूर्य के समान तेजवाले उन अग्निदेव का साक्षात्कार करके योगी इच्छानुसार रूप धारण करने वाला हो जाता है तथा मनोवाछित शरीर धारण करके क्रीडा करता है । वह योगी कारण तत्व को शांत करके उसमे आविष्ट होना, दूसरे के शरीर में प्रवेश करना, अणिमा आदि गुणों को पा लेना, मन से ही सब कुछ देखना, दूर की बातों को सुनना और जानना, अदृष्य हो जाना, बहुत से रूप धारण कर लेना तथा आकाश मार्ग में विचरना इत्यादि सिद्धियों को निरंतर अभ्यास प्रभाव से प्राप्त कर लेता है । जो अंधकार से परे और सूर्य के समान तेजस्वी है, उसी महान् ज्योतिर्मय पुरूष (परमात्मा) को में जानता हूँ । उन्हीं को जानकर मनुष्यकाल या मृत्यु को लॉघ जाता है मोक्ष के लिये इसके सिवा दूसरा कोई मार्ग नहीं है ।

देवी ! इस प्रकार मैने तुमसे तेजस्तत्व के चिन्न की उत्तम विधि का वर्णन किया है, जिससे योगी काल पर विजय पाकर अमरत्व को प्राप्त कर लेता हैं |

देवी अब मैं अपना तीसरा श्रेष्ठ उपाय बताता हूं जिससे मनुष्य की मृत्यु नहीं होती |

देवी ध्यान करने वाले योगियों की चौथी गति साधना बताई जाती है योगी अपने चित्त को वश में करके यथा योग्य स्थान में सुखद आसन पर बैठे | वह शरीर को ऊंचा करके अंजलि बांधकर चौकी आकृति वाले मुख के द्वारा धीरे-धीरे वायु का करे ऐसा करने पर क्षण भर में तातु के भीतर स्थित जीवनदायी जल की बूंदे टपकने लगती है उन बूंदों को वायु के द्वारा लेकर सूंघे | वह शीतल जल अमृत स्वरूप है जो योगी उसे प्रतिदिन पीता है वह कभी मृत्यु के अधीन नहीं होता उसे भूख प्यास नहीं लगती उसका शरीर और तेज महान हो जाता है वह बमें हाथी के समान तथा वेग में घोड़े के समान हो जाता है उसकी दृष्टि गरुण के समान तेज होती है और उसे दूर की बातें भी सुनाई देने लगती है उसके केकाले और घुंघराले हो जाते हैं तथा अंग की कान्ति गंधर्व एवं विद्याधरों की समानता करती है वह मनुष्य 100 वर्ष तक जीवित रहता है और अपनी उत्तम बुद्धि के द्वारा बृहस्पति के तुल्य हो जाता है उसमें इच्छा अनुसार विचरने के शक्ति आ जाती है और वह सदा सुखी रह कर आकाश मार्ग में विचरण करने की शक्ति प्राप्त कर लेता है |

देवी अब मृत्यु पर विजय पाने चौथी व अंतिम विधि बता रहा हूँ जिसे देवताओं ने भी प्रयत्न पूर्वक छुपा रखा है,तुम उसे सुनो - योगी पुरुष अपनी जिव्हा को मोड़कर तालू में लगाने का प्रयत्न करे कुछ काल तक ऐसा करने से वह क्रमशः लंबी होकर गले की घाँटी तक पहुंच जाती है तदान्तर जब जिव्हा से गले की घाँटी ती है तब शीतल सुधा का श्राव करती है उस सुधा को जो योगी सदा पीता है वह अमरता को प्राप्त होता है |

 

 

 

सोमवार, 25 अप्रैल 2022

शनि का कुम्भ राशि परिवर्तन

हमारे सौरमंडल में भ्रमण करते हुए जब भी ग्रह एक राशि से दूसरी राशि में जाते हैं तो धरती पर जीवो पर उनका प्रभाव पड़ता रहता है हम सभी जानते हैं कि शनि पूरे ढाई वर्ष बाद राशि परिवर्तन करते हैं अपनी मंद गति के भ्रमण के कारण शनि का किसी भी राशि में प्रवेश करना धरती पर प्रत्येक प्राणी पर सबसे ज़्यादा असर डालता है | इस वर्ष 29 अप्रैल 2022 को शनि कुंभ राशि में मकर राशि से परिवर्तन कर प्रवेश करेंगे |

प्रस्तुत लेख में हम जाने का प्रयास करेंगे कि शनि का यह कुम्भ राशि गोचर विभिन्न राशि वालों पर क्या प्रभाव डालेगा | शनि के इस कुम्भ राशि में गोचर करने से मकर,कुम्भ व मीन राशि वालों को शनि साढ़ेसाती का प्रभाव रहेगा जिसेमें मकर राशि वालों को साढ़ेसाती का तीसरा चरण अर्थात उतरती हुई साढ़ेसाती जबकि कुंभ राशि वालों के लिए बीच की अर्थात मध्य साढ़ेसाती तथा मीन राशि वालों के लिए शनि की साढ़ेसाती का यह आरंभिक चरण अर्थात पहली अवस्था होगी तथा कुंभ राशि के इस शनि परिवर्तन से कर्क एवं वृश्चिक राशि वालों को शनि की ढैया का प्रभाव भी मिलने लगेगा |

शनि के राशि परिवर्तन होने पर साधारण रूप से विभिन्न राशियों पर निम्न प्रभाव होता है |

गोचर में शनि जन्म राशि से पहले स्थान में हो तो मानसिक व्यथा एवं स्थान हानि,दूसरे में कलह क्लेश, तीसरे में पराक्रम एवं सुख में वृद्धि,चौथे में शत्रु वृद्दि,पांचवें में संतान संबंधी दुख,छठे में सुख साधनों में वृद्धि,सातवें में रोग व शत्रु भय,आठवे मे दुख पीड़ा,नवे में सुख,दशम में धन हानि,एकादश में धन लाभ तथा द्वादश में अनेक प्रकार के अनर्थ मिलते हैं |

इस प्रकार देखें तो शनि का गोचर तीसरे,छठे और ग्यारहवें भाव में ही लाभकारी होता है |

शनि का पाया विचार - शनि का पाया यदि सोने का हो तो उस अवधि में संघर्षपूर्ण परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है तथा पारिवारिक एवं व्यवसायिक उलझन बढ़ती है | शत्रु एवं रोग-भय,मानसिक तनाव होता है तथा व्यर्थ में खर्च एवं कलह क्लेश रहते हैं |

चांदी का पाया हो तो जातक को पूर्व में किए गए प्रयासों से धीरे-धीरे सफलता प्राप्त होती है आकस्मिक धन लाभ,ऊंच प्रतिष्ठा,पदोन्नति,स्त्री संतान एवं भूमि वाहन आदि का सुख प्राप्त होता है |

ताम्र का पाया हो तो कार्य व्यवसाय में लाभ व उन्नति के अवसर मिलते हैं कुछ प्रतिष्ठित लोगों से संपर्क बनता है ऊंच विद्या में सफलता मिलती है विवाह एवं परिवारिक सुखों की प्राप्ति होती है वाहन आदि सुख-सुविधाओं की प्राप्ति होती है तथा देश विदेश की यात्रा के अवसर भी मिलते हैं |

लोहे का पाया हो तो जातक को आर्थिक परिवारिक परेशानियां अधिक होती हैं स्वास्थ्य में गड़बड़ तनाव एवं उलझने मिलती है दुर्घटना आदि से चोट लगने का भय,व्यवसाय में बाधाएं,प्रयास करने पर भी लाभ कम और खर्चा अधिक हो ऐसे हालात मिलते हैं |

29 अप्रैल को जब शनि कुंभ राशि में प्रवेश करेंगे तब चंद्रमा मीन राशि का होगा जिससे मेष सिंह तथा धनु राशि पर लोहे का पाया गिना जाएगा जो कि अशुभ फलदायक होगा |

वृष,तुला और मीन राशियों पर स्वर्ण पाया अशुभ फलदायक होगा |

मिथुन कन्या मकर राशियों पर ताम्र पाया जो की शुभ होगा तथा कर्क वृश्चिक और कुंभ राशियों पर चांदी का पाया जो की शुभ रहेगा |

आइए राशि अनुसार जानते हैं की प्रत्येक राशि वालों को शनि के इस गोचर से क्या क्या प्रभाव मिलेंगे |

मेष राशि - इस समय शनि की नीच दृस्टी इस राशि पर रहेगी | आय कम व खर्च अधिक होंगे | बनते कार्मा में रुकावते रहेगी । लोहे का पाया होने से मानसिक परेशानी तथा भाई, बहनो से विरोध रहेगा |

वृष राशि  - दशमस्थ होने से कार्य व्यवसाय मे विघ्न होने बाधाए के बावजूद निर्वाह योग्य आय के साधन बनते रहेंगे। परन्तु इस राशि को स्वर्ण पाया होने से बनते कार्यों में अड़चन तथा खर्च भी अधिक होंगे |

 मिथुन राशि – इस राशि से शनि नवमस्थ होने से भाग्योति में रुकावते एवं विलम्ब होंगे परन्तु शनि का पाया ताम्र होने से नौकरी में पदोन्नति कार्य व्यवसाय मे लाभ के अवसर बनेंगे । शुभ कार्यों पर व्यय भी होंगे |

कर्क राशि – इस राशि से शनि अष्टप्ररथ (टैय्या के कारण) होने से अशुभ प्रभाव होगा। | आय कम, बनते कामों में रुकावटे पैदा होंगी,परंतु पाया रजत होने से बीचबीच में अकस्मात धन लाभ के अवसर मिलेंगे । विदेश यात्रा के भी योग भी बनेंगे |

सिंह राशि - पर सप्तमस्थ शनि की शत्रु दृष्टि होने से व्यवसाय में संघर्ष अधिक खर्च भी बढ़ेंगे । साथ ही इस राशि पर शनि का पाया लोह होने से घरेलू तथा व्यवसाय सम्बन्धी उलझनें व परेशानियां भी बढ़ेगी ।

कन्या राशि - से शनि छठे भाव गोचर होने से अत्यन्त कठिनाईयों के पश्चात् धन प्राप्ति के साधन बनेंगे। शनि का पाया ताम्र होने तथा गुरु की दृष्टि रहने से स्वास्थ्य लाभ धर्म-कर्म में प्रवृत्ति एवं लाभाउन्नति के भी अवसर मिलेंगे।

तुला राशि - पंचमस्थ शनि पूज्य होगा । उच्च-विद्या में सफलता मिले । धन-लाभ के अवसर प्राप्त होंगे। अनावश्यक मतभेद उभरेंगे । निर्वाह योग्य धन प्राप्त होता रहेगा । शनि का पाया सुवर्ण होने से विशेष लाभ के मार्ग में विघ्न उत्पन्न हों, खर्च अधिक हो । संघर्षपूर्ण हालात रहे |

वृश्चिक राशि – इस राशि से शनि का ये चौथा गोचर होने से शनि की ढैया का अशुभ प्रभाव रहेगा जिससे धन हानी,भाई बंधुओ से लड़ाई,कलह,क्लेश व खर्चे होंगे | रजत का पाया होने तथा गुरु की शुभ दृस्टी होने से आय के श्रोत बनते रहेंगे तथा भूमि वाहन आदि की प्राप्ति भी हो सकती हैं |    

धनु राशि – इस राशि के तीसरे गोचर होने  से पपराक्रम मे वृद्दि,भूमि वाहम आदि जैसी सुख-सुविधाओं की प्राप्ति हो । परन्तु इस राशि पर शनि का पाया लौह होने से अचानक खचा में वृद्धि, शरीर कष्ट, धन सम्बन्धी चिन्ताएँ भी होंगी ।

मकर राशि – इस राशि से शनि द्वितीयस्थ होने से साढ़ेसाती का अशुभ प्रभाव अभी रहेगा । घरेलु एवं आर्थिक उलझनें, आय कम व खर्च अधिक रहेंगे । परन्तु शनि का पाया ताम्र होने के कारण बीच-बीच धन लाभ के अवसर प्राप्त होते रहेंगे ।

कुम्भ राशि - शनि स्वराशिगत होकर संचार करने से इस राशि पर शनि-साढ़ेसाती होने से मानसिक तथा पारिवारिक उलझनें रहेंगी परन्तु शनि का पाया चाँदी होने से धन लाभ, गत किए कार्यों में सफलता, भूमि-वाहन एवं पारिवारिक सुखों की प्राप्ति होगी ।

मीन राशि – इस राशि से शनि द्वादशस्थ (शनि-साढ़ेसाती) होने से अत्यन्त संघर्षपूर्ण परिस्थितियों का सामना रहे, बनते कार्यों में अड़चनें एवं विलम्ब हो, किसी रोग के कारण कष्ट हो । स्वर्णपाद होने से भी तनाव रहे । परन्तु गुरु के इस राशि पर संचारवश सन्तान सम्बन्धी शुभ समाचार भी प्राप्त होंगे  ।

शुक्रवार, 22 अप्रैल 2022

गोचर ग्रहो द्वारा दी जाने वाली सूचना - 4 (शनि)

7) जिसके जन्म की चन्द्र राशि में शनि गोचरवश हो वह विष और अग्नि से पीड़ित,बंधुओं से से रहित, भ्रमणशील, विदेशवास,गृह,धन,पुत्र से रहित होता है ।

द्वितीय में शनि के होने पर रूप एवं सुख से रहित शरीरवाला, अहंकार रहित एवं निर्बल होता है ।

तृतीय का शनि धन, मृत्यु, परिवार, ऊंट, भैंस, घोड़ा, धा,गृह, ऐश्वर्य एवं आरोग्य लाभ की सूचना देता है एवं कायर होने पर भी प्रबल शत्रु को अपने वश में कर लेता है ।

चतुर्थ में शनि के होने पर मित्र, धन स्त्री आदि से रहित |

पंचम का शनि पुत्र एवं धन से रहित एवं कलहयुत |

षष्ठ का शनि शत्रु रहित, निरोग एवं सुन्दर स्त्री की सूचना देता है ।

सप्तम एवं अष्टम का शनि होने पर स्त्री - पुत्र से हीन दुखी तथा दीन,चेष्टा से युक्त बीमार |

नवम का शनि दीन, हीन एवं हृदय रोगी बताता है |

दशम का शनि कर्म का लाभ, धन एवं विद्या का नाश बताता है |

एकादश के शनि से कठोर स्वभाव तथा दूसरे की स्त्री एवं धन का लाभ प्राप्त करने वाला होगा ऐसी सूचना देता है ।

द्वादश के शनि से शोक एवं कलह की प्राप्ति ज्ञात होती है ।

 

विशेष - सूर्य मंगल राशि के पूर्वार्ध में,चंद्र शनि राशि के अंत में शुभ अशुभ फल देते हैं बुध राशि के आरंभ व अंत में फल देता है इसके अतिरिक्त गुरु और शुक्र राशि के मध्य में शुभ अशुभ फल देते हैं |

नीच राशि,शत्रु राशि,अस्त एवं शत्रु ग्रह से दृष्ट ग्रह के फल अशुभ होते हैं |

सूर्य के समान शनि अशुभ फल देता है एवं सूर्य से अस्त होने पर अधिक अशुभ फल देता है बुध एवं चंद्र युक्ति के अनुसार शुभ अशुभ फल देते हैं |

जन्म राशि से उपचय (3,6,10,11) भाव में स्थित सूर्य हो तो रविवार को सोना तांबा घोड़ा लकड़ी राजा की आराधना अथवा राजा का अभिषेक करना चाहिए |

चन्द्र होतो सोमवार को मोती कमल चांदी राजा जनप्रियता के काम करने वाले कर्मों की सिद्धि होती है | मंगल होतो मंगलवार में धातु संबंधी अग्नि क्रूरता चोरी आदि |

बुध होतो बुधवार को हरित मणि विज्ञान मंत्र क्रिया आदि |

गुरु होतो गुरुवार को सोना चांदी हाथी घोड़ा देवताओं के कार्य देव प्रतिष्ठा,गृह प्रतिष्ठा |

शुक्र होतो शुक्रवार को कलाकर्म वीर्य वृद्दि के प्रयोग,वेश्या,कामशक्ति,स्त्री,यौन उपयोग,खेती तथा औषधि एवं

शनि होतो शनिवार को भैंस ऊट मृत्यु,चोरी,बंधन,नम्रता से रहित आदि कार्य करने चाहिए |