जिन जातकों के जन्म काल में शनि वक्री होता है वे भाग्यवादी होते हैं। उनके क्रिया-कलाप किसी अदृश्य शक्ति से प्रभावित होते हैं। वे एकांतवासी होकर प्रायः साधना में लगे रहते हैं ।
धनु, मकर, कुंभ और मीन राशि में शनि वक्री होकर लग्न में स्थित हो तो जातक राजा या गांव का मुखिया होता है और राजतुल्य वैभव पाता है।
द्वितीय स्थान का शनि वक्री हो तो जातक को देश तथा विदेश से धन की प्राप्ति होती है।
तृतीय भाव का वक्री शनि जातक को गूढ़ विद्याओं का ज्ञाता बनाता है, लेकिन माता के लिए अच्छा नहीं होता है।
चतुर्थ भावस्थ वक्री शनि मातृ हीन, भवन हीन बनाता है। ऐसा व्यक्ति घर-गृहस्थी की जिम्मेदारी नहीं निभाता और अंत में संन्यासी बन जाता है लेकिन चतुर्थ में शनि तुला, मकर या कुंभ राशि का हो तो जातक को पूर्वजों की संपत्ति प्राप्त होती है।
पंचम भाव का वक्री शनि प्रेम संबंध देता है,लेकिन जातक प्रेमी को धोखा देता है । वह पत्नी एवं बच्चे की भी परवाह नहीं करता है।
षष्ठ भाव का वक्री शनि यदि निर्बल हो तो रोग, शत्रु एवं ऋण कारक होता है।
सप्तम भाव का वक्री शनि पति या पत्नी वियोग देता है । यदि शनि मिथुन, कन्या, धनु या मीन का हो तो एक से अधिक विवाहों अथवा विवाहेतर संबंधों का कारक होता है।
अष्टम भाव में वक्री शनि हो तो जातक ज्योतिषी दैवज्ञ, दार्शनिक एवं वक्ता होता है । ऐसा व्यक्ति तांत्रिक, भूतविद्या, काला जादू आदि से धन कमाता है।
नवमस्थ वक्री शनि जातक की पूर्वजों से प्राप्त धन में वृद्धि करता है। उसे धर्म परायण एवं आर्थिक संकट आने पर धैर्यवान बनाता है।
दशमस्थ शनि वक्री हो तो जातक वकील, न्यायाधीश, बैरिस्टर, मुखिया, मंत्री या दंडाधिकारी होता है।
एकादश भाव का वक्री शनि जातक को चापलूस बनाता है ।
व्यय भावस्थ वक्री शनि निर्दयी एवं आलसी बनाता है।
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