शुक्रवार, 4 जून 2010

क्या है स्वप्न का विज्ञान ?

पं. किशोर घिल्डियाल

आदि काल से ही मानव मस्तिष्क अपनी इच्छाओं की पूर्ति करने के प्रयत्नों में सक्रिय है। परंतु जब किसी भी कारण इसकी कुछ अधूरी इच्छाएं पूर्ण नहीं हो पाती (जो कि मस्तिष्क के किसी कोने में जाग्रत अवस्था में रहती है) तो वह स्वप्न का रूप ले लती हैं।

आधुनिक विज्ञान में पाश्चात्य विचारक सिगमंड फ्रायड ने इस विषय में कहा है कि स्वप्न'' मानव की दबी हुई इच्छाओं का प्रकाशन करते हैं जिनको हमने अपनी जाग्रत अवस्था में कभी-कभी विचारा होता है। अर्थात स्वप्न हमारी वो इच्छाएं हैं जो किसी भी प्रकार के भय से जाग्रत्‌ अवस्था में पूर्ण नहीं हो पाती हैं व स्वप्नों में साकार होकर हमें मानसिक संतुष्टि व तृप्ति देती है।

सपने या स्वप्न आते क्यों है? इस प्रश्न का कोई ठोस प्रामाणिक उत्तर आज तक खोजा नहीं जा सका है। प्रायः यह माना जाता है कि स्वप्न या सपने आने का एक कारण ÷नींद' भी हो सकता है। विज्ञान मानता है कि नींद का हमारे मस्तिष्क में होने वाले उन परिवर्तनों से संबंध होता है, जो सीखने और याददाश्त बढ़ाने के साथ-साथ मांस पेशियों को भी आराम पहुंचाने में सहायक होते हैं। इस नींद की ही अवस्था में न्यूरॉन (मस्तिष्क की कोशिकाएं) पुनः सक्रिय हो जाती हैं।

वैज्ञानिकों ने नींद को दो भागों में बांटा है पहला भाग आर ई एम अर्थात्‌ रैपिड आई मुवमेंट है। (जिसमें अधिकतर सपने आते हैं) इसमें शरीर शिथिल परंतु आंखें तेजी से घूमती रहती हैं और मस्तिष्क जाग्रत अवस्था से भी ज्यादा गतिशील होता है। इस आर ई एम की अवधि १० से २० मिनट की होती है तथा प्रत्येक व्यक्ति एक रात में चार से छह बार आर ई एम नींद लेता है। यह स्थिति नींद आने के लगभग १.३० घंटे अर्थात ९० मिनट बाद आती है। इस आधार पर गणना करें तो रात्रि का अंतिम प्रहर आर ई एम का ही समय होता है (यदि व्यक्ति समान्यतः १० बजे रात सोता है तो ) जिससे सपनों के आने की संभावना बढ़ जाती है।

सपने बनते कैसे हैं : दिन भर विभिन्न स्रोतों से हमारे मस्तिष्क को स्फुरण (सिगनल) मिलते रहते हैं। प्राथमिकता के आधार पर हमारा मस्तिष्क हमसे पहले उधर ध्यान दिलवाता है जिसे करना अति जरूरी होता है, और जिन स्फुरण संदेशों की आवश्यकता तुरंत नहीं होती उन्हें वह अपने में दर्ज कर लेता है। इसके अलावा प्रतिदिन बहुत सी भावनाओं का भी हम पर प्रत्यक्ष प्रभाव पड़ता है। जो भावनाएं हम किसी कारण वश दबा लेते हैं (गुस्सा आदि) वह भी हमारे अवचेतन मस्तिष्क में दर्ज हो जाती हैं। रात को जब शरीर आराम कर रहा होता है मस्तिष्क अपना काम कर रहा होता है। (इस दौरान हमें चेतनावस्था में कोई स्कुरण संकेत भावनाएं आदि नहीं मिल रही होती) उस समय मस्तिष्क दिन भर मिले संकेतों को लेकर सक्रिय होता है जिनसे स्वप्न प्रदर्शित होते हैं। यह वह स्वप्न होते हैं जो मस्तिष्क को दिनभर मिले स्फुरण, भावनाओं को दर्शाते हैं जिन्हें दिनमें हमने किसी कारण वश रोक लिया था। जब तक यह प्रदर्शित नहीं हो पाता तब तक बार-बार नजर आता रहता है तथा इन पर नियंत्रण चाहकर भी नहीं किया जा सकता।

शकुन व इसका आधार

पं. किशोर घिल्डियाल

शकुनो में कोई ना कोई विशेष शक्ति होती है जो मनुष्यों को सावधान करने के लिए तथा शुभाशुभ फल प्रदान करने हेतु पूर्व सूचना देती है।

शकुन' विषय पर विभिन्न व्यक्तियों के विभिन्न विचार होते हैं किसी के लिए ÷शकुन' ऐसा परिणाम सूचक है जो निकट भविष्य में होने वाला है। किसी के लिए शकुन दैवीय प्रेरणा या कृपा है जो शुभाशुभ फल के रूप में प्राप्त होती है।

अनेक विद्वान ÷शकुन' को अंग विद्या का एक हिस्सा मानते हैं जो मानव जीवन को पक्षियों की गतिविधियों को आधार बनाकर फलकथन कर अपना कल्याण करने की प्रेरणा देते हैं। शकुन का अर्थ पक्षी होता है जिससे पता चलता है कि यह विद्या मानव ने पक्षियों की गतिविधियों से देखकर तथा अनुभव की कसौटी पर कस कर अपने भावी जीवन हेतु अपनाई।

शकुन का वैज्ञानिक आधार

शकुनों का आधार ज्योतिष के साथ-साथ वैज्ञानिक भी रहा है। जो शुभ सिद्ध होने पर लाभदायक तथा अशुभ होने पर सावधान करने वाला भी है। पक्षियों की विशेष गतिविधियों को निश्चित समय पर करते देख विज्ञान ने समय के साथ इस पर शोधकर नए-नए विषयों पर काम किया जिससे मनुष्य जीवन की बहुत सी कठिनाइयों व परेशानियों का अंत भी हुआ, जैसे मोर पक्षी का नाचना आज भी बरसात आगमन की सूचना दे देता है और इसे विज्ञान भी मानता है। भूकंप आदि आने से पहले सांप-बिच्छु आदि अपने बिल से बाहर आकर इधर-उधर दौड़ने लगते हैं।

शकुनों की सार्थकता

आज के युग में कुछ बुद्धिजीवी शकुन विज्ञान पर विश्वास न कर इन्हें व्यर्थ का मनोविकार बताते हैं वहीं कुछ लोग इन्हें सार्थक तथा व्यर्थ दोनों ही परिपेक्ष्य में गिनते हैं।

जो व्यक्ति अनुभव प्राप्त कर लेते हैं (जैसे बिल्ली के रास्ता काट जाने पर इच्छित कार्य का ना होना) वो शकुनों के प्रति विश्वासी हो जाते हैं जिससे आज के युग में भी इन शकुनों की सार्थकता बनी हुई है।

इसके विपरित जब कभी किसी मनुष्य को कोई शकुन अशुभफल प्रदान करता है तो शकुनों की विश्वसनीयता पर संदेह हो जाता है। उदाहरण हेतु यदि किसी की छत पर कौआ बोलने लगे तो यह मेहमान के आगमन की सूचना माना जाता है। परंतु यदि उस व्यक्ति की कोई कीमती वस्तु उस दिन खो जाए तो वह कौअे के इस कॉंव-कांव को ही उसका कारण मानेंगें। ऐसे में शकुन विचार विपरीत दृष्टिकोण को दर्शाएगा।

इस प्रकार ऐसे कई विवरण हो सकते हैं जिनसे यह समझा व माना जाता है कि शकुनो में कोई ना कोई विशेष शक्ति होती है जो मनुष्यों को सावधान करने के लिए तथा शुभाशुभ फल प्रदान करने हेतु पूर्व सूचना देती है।


मंगलवार, 1 जून 2010

रुद्राक्ष द्वारा चिकित्सा

आयुर्वेद में रुद्राक्ष को महा औषधि की संज्ञा दी गई है। इसके विभिन्न औषधीय गुणों के कारण रोगोपचार हेतु इसका उपयोग आदिकाल से ही होता आया है। जानकारी के अभाव में आम जन उसके इस लाभ से वंचित रह जाते हैं। पाठकों के लाभार्थ, किस रोग के उपचार में कौन-सा रुद्राक्ष उपयोगी होता है इसका एक विशद विश्लेषण यहां प्रस्तुत है।

वात, पित्त और कफ जन्य रोगों के

शमन हेतु

रुद्राक्ष के विषय में कहा गया है कि यह उष्ण और अम्लीय होता है। अपने इस गुण के कारण यह त्रिदोष जन्य रोगों का शमन करता है। अम्ल और विटामिन सी युक्त होने के कारण यह रक्त-शोधक तथा रक्त-विकार नाशक है। उष्ण होने के कारण यह सर्दी और कफ के असंतुलन से होने वाले सभी रोगों को दूर करने में उपयोगी है।

रक्तचाप को सामान्य रखने और हृदय

रोग से मुक्ति हेतु

रुद्राक्ष की माला धारण करने से उच्च रक्तचाप सामान्य होता है और हृदय रोगों से मुक्ति मिलती है। माला इस तरह धारण करें कि यह वक्षस्थल को स्पर्श करती रहे।

रुद्राक्ष और स्वर्ण भस्म बराबर मात्रा में १-१ रत्ती सुबह और शाम नियमित रूप से मलाई के साथ सेवन करें, रक्तचाप सामान्य हो जाएगा।

रुद्राक्ष घिसकर आधा चम्मच प्याज के रस तथा शहद मिलाकर खाएं और फिर लौकी का रस पीएं। यह क्रिया नियमित रूप से करें, हृदयाघात से रक्षा होगी।

चेचक जन्य पीड़ा से मुक्ति हेतु

रुद्राक्ष और काली मिर्च समान भार में लेकर दोनों को पीस लें और मिश्रण का कपड़-छान कर चेचक के रोगी को बासी पानी के साथ पिलाएं। ऐसा तीन दिनों तक करें, रोगी को जलन और बेचैनी से मुक्ति मिलेगी।

कच्चे नारियल के तेल में रुद्राक्ष का एक दाना तीन घंटे तक रखें। फिर दाने को चम्मच या किसी अन्य उपकरण से निकाल लें। ध्यान रहे, हाथ से कदापि न निकालें। फिर उस तेल से रोगी की मालिश करें, चेचक के दाग भर जाएंगे और चेहरे पर कांति आ जाएगी। यह प्रयोग एक से डेढ़ मास तक नियमित रूप से करें।

स्मरण शक्ति की कमी, खांसी और

दमा रोग से मुक्ति के लिए

रुद्राक्ष को दूध में उबालकर पीने से स्मरण शक्ति तीव्र होती है।

दस मुखी रुद्राक्ष को गाय के ताजे दूध के साथ घिसकर दिन में तीन बार उसका सेवन करें। यह क्रिया नियमित रूप से करते रहें, कुछ ही दिनों में पुरानी से पुरानी खांसी से मुक्ति मिलेगी।

पांच मुखी रुद्राक्ष के कुछ दानें फोड़कर उबाल लें और उस पानी का सेवन करें। ऐसा नियमित रूप से करें, दमे व श्वास रोग से राहत मिलेगी।

रुद्राक्ष को घिसकर शहद के साथ दिन में ३ बार लें, खांसी से मुक्ति मिलेगी।

एक भाग छह मुखी रुद्राक्ष और चार भाग सितोपलादि का चूर्ण मिलाकर शहद के साथ नियमित रूप से लें, श्वास रोग से बचाव होगा।

कोलेस्टेरॉल के स्तर को सामान्य

करने के लिए

एक कप दूध उबालकर उसमें एक रुद्राक्ष तथा लहसुन की फांक रखें। कुछ देर छोड़ दें और फिर रुद्राक्ष को निकाल कर दूध का सेवन करें और लहसुन की फांक खा लें। ऐसा तीन महीने तक नियमित रूप से करते रहें, कोलेस्टेरॉल का स्तर सामान्य हो जाएगा।

मानसिक शांति हेतु

गाय के दूध में ४ रुद्राक्ष उबालकर दूध का सेवन करें, मानसिक रोग से मुक्ति मिलेगी और मन शांत रहेगा। यह क्रिया तीन माह तक करें।

बवासीर एवं गुर्दे के रोग से बचाव

के लिए

एक रुद्राक्ष और उसके चार गुने भार के बराबर अपामार्ग के बीज सवा लीटर पानी में खौलाएं। जब पानी का लगभग दसवां भाग रह जाए, तो उसमें गाय का दो गुना घी मिला दें। फिर इसकी १२ से १५ बूंदों की मात्रा का प्रतिदिन सेवन करें, बवासीर और गुर्दे की बीमारी से राहत मिलेगी।

प्रदर रोग से मुक्ति हेतु

प्रदर रोग से ग्रस्त स्त्रियां एक भाग रुद्राक्ष, दो भाग चौलाई की जड़ और दो भाग रसौत का चूर्ण बनाकर चार गुने पानी में मिलाएं और उसे मिट्टी के पात्र में रात भर रखें। सुबह उसे छान लें और चावल के धोवन के साथ दस ग्राम की मात्रा में सेवन करें, प्रदर रोग से मुक्ति मिलेगी।

रुद्राक्ष धारण से लाभ

शिखा में अथवा मस्तक पर रुद्राक्ष धारण करें, सिर-दर्द, आंखों के धुंधलेपन, नजला-जुकाम, दिमाग की कमजोरी, स्मरण शक्ति में कमी आदि से रक्षा होगी।

कंठ में रुद्राक्ष धारण करें, टॉन्सिल अपनी सामान्य स्थिति में रहेगा, स्वर का भारीपन दूर होगा तथा हकलाहट कम होगी।

वात रोग के प्रकोप से मुक्ति हेतु दायीं भुजा तथा स्नायविक विकारों से मुक्ति हेतु बायीं भुजा पर रुद्राक्ष धारण करें। दोनों भुजाओं पर रुद्राक्ष धारण करने से ऊपर वर्णित रोगों से मुक्ति के साथ-साथ पक्षाघात से भी बचाव होता है।

कमर में रुद्राक्ष धारण करने से कमर दर्द, रीढ़ की हड्डी के रोग, पेट की बीमारी आदि से मुक्ति मिलती है। महिलाओं के लिए कमर में रुद्राक्ष धारण करना अत्यधिक लाभप्रद होता है। इससे उनका प्रदर रोग तथा अनियमित रजोधर्म से बचाव होता है। साथ ही, प्रसव भी सरलता से होता है। ध्यान रहे, रुद्राक्ष कमर में नाभि के ऊपर ही धारण करें।

ग्रह जन्य रोगों से मुक्ति तथा बचाव

में रुद्राक्ष का उपयोग

ब्रह्मांड में फैले ग्रह विभिन्न रोगों के कारक हैं। विभिन्न मुखों वाले रुद्राक्ष विभिन्न ग्रहों का प्रतिनिधित्व करते हैं। यहां किस ग्रह के कारण उत्पन्न रोग से मुक्ति हेतु कौन सा रुद्राक्ष धारण करना चाहिए, इसका एक संक्षिप्त विवरण प्रस्तुत है।

सूर्य मस्तिष्क ज्वर, शरीर में जलन, पित्त रोग, हृदय रोग, नेत्र-पीड़ा, हड्डी के रोग आदि का कारक है। इन रोगों से मुक्ति हेतु एक और बारह मुखी रुद्राक्ष धारण करें।

मिर्गी, अपस्मार, नींद की कमी या नींद न आना, कफ, सर्दी, जुकाम, नजला, छाती में बलगम जमना, अतिसार, संग्रहणी, स्त्रियों के रजोधर्म में अनियमितता, निमोनिया, सर्दी के कारण बुखार आदि चंद्र के कारण होते हैं। इनसे मुक्ति के लिए दो मुखी रुद्राक्ष धारण करें।

मंगल ग्रह जनित रोगों जैसे उच्च रक्तचाप, रक्ताल्पता अथवा रक्त विकार, मज्जा के रोग, गुल्म रोग आदि से बचाव हेतु तीन मुखी रुद्राक्ष धारण करें।

बुध मस्तिष्क की बीमारियों, स्नायु रोग, स्मरण शक्ति की कमी, नाड़ियों से संबंधित रोग, सांस की नली, गले एवं फेफडे+ के रोग, नर्वस बे्रक-डाउन, चर्म रोग आदि का कारक है। इन रोगों से बचाव हेतु चार मुखी रुद्राक्ष धारण करें।

जंघा एवं लीवर की बीमारियां, शरीर में चर्बी एवं कोषिकाओं की वृद्धि से उत्पन्न रोग, अंतड़ियों का ज्वर, पीलिया, गुर्दे की बीमारी आदि गुरु के कारण होते हैं। इनसे बचाव हेतु पांच मुखी रुद्राक्ष धारण करें।

शुक्र ग्रह मूत्र रोग, प्रमेह, मधुमेह, जननेंद्रिय रोग, शरीर के सूखने, गुर्दे के रोग, आंखों की ज्योति की कमी आदि का कारक है। इन रोगों के शमनार्थ तीन तथा तेरह मुखी रुद्राक्ष धारण करें।

शनि के कारण उत्पन्न रोगों जैसे वायु विकार, जोडो+ं के दर्द, पक्षाघात, हड्डियों की कमजोरी, टांगों के दर्द, लड़खड़ाहट, निम्न रक्तचाप आदि से मुक्ति हेतु सात और चौदह मुखी रुद्राक्ष धारण करें।

विषादि जन्य रोग, कोढ़ आदि राहु के कारण उत्पन्न रोगों से मुक्ति हेतु आठ मुखी रुद्राक्ष धारण करें।

केतु गुप्त रोगों का कारक है। इन रोगों से मुक्ति तथा बचाव के लिए नौ मुखी रुद्राक्ष धारण करें।

रुद्राक्ष-जल चिकित्सा

स्वच्छ जल में रुद्राक्ष डुबाकर उस जल का सेवन करने से भी कुछ बीमारियां दूर होती हैं। किंतु रुद्राक्ष को जल में ज्यादा से ज्यादा तीन दिनों तक रखना चाहिए। आवश्यकता पड़ने पर पुनः नया रुद्राक्ष-जल तैयार कर लेना चाहिए। यहां कुछ रोगों से बचाव हेतु रुद्राक्ष-जल के उपयोग की विधि का विवरण प्रस्तुत है।

रात को सोने से पहले रुद्राक्ष के कुछ दानें स्वच्छ जल में डाल दें। प्रातः काल खाली पेट उस जल का सेवन करें, कब्ज तथा अन्य विभिन्न रोगों से मुक्ति मिलेगी।

अकारण ही बेचैनी या घबराहट महसूस होती हो, या मितली आती हो, तो रुद्राक्ष-जल के दो-तीन चम्मच थोड़ी-थोड़ी देर पर पीएं, आराम मिलेगा।

आंखों में जलन, धुंधलापन आदि से बचाव के लिए रुद्राक्ष-जल के छींटे मारें और फिर उन्हें पोंछकर कुछ पलों के लिए बंद कर लें। यह क्रिया नियमित रूप से करते रहें, लाभ होगा।

आंखों में दर्द या पीड़ा हो, अथवा किसी कारणवश सूजन आ गई हो, तो पांच मुखी रुद्राक्ष को घिसकर काजल की तरह लगाएं, आश्चर्यजनक लाभ मिलेगा।

नाक के दोनों छिद्रों से रुद्राक्ष-जल खींचें, सर्दी, जुकाम और नजले से राहत मिलेगी।

कान पक गया हो, मवाद आता हो, कम सुनाई पड़ता हो, तो रुद्राक्ष-जल की कुछ बूंदें कान में डालें, लाभ मिलेगा।

सरसों के तेल में पांच मुखी रुद्राक्ष उबालकर उसे ठंडा होने के लिए कुछ देर छोड़ दें। फिर उसकी एक से दो बूंदें कान में डालें, दर्द दूर होगा।

घाव, पके फोडे+-फुंसियों आदि को रुद्राक्ष-जल से धोएं, राहत मिलेगी।

पांच मुखी रुद्राक्ष की भस्म को गोमूत्र अथवा गोबर और गंगाजल में मिलाकर चर्म रोग से ग्रस्त स्थान पर लगाएं, लाभ होगा।

जिह्‌वा के चटक जाने, स्वर में भारीपन आ जाने अथवा गले में किसी प्रकार का रोग हो जाने पर रुद्राक्ष-जल के गरारे करें, आराम मिलेगा।

रुद्राक्ष-भस्म, लेप तथा चूर्ण चिकित्सा

ब्राह्मण जाति के नौ मुखी रुद्राक्ष की भस्म बना लें और तुलसी के पत्तों के रस के साथ उसका लेप बनाकर कुष्ठग्रस्त अंग पर लगाएं। लेप नियमित रूप से लगाते रहें, कुछ ही सप्ताहों में आराम मिलेगा।

रुद्राक्ष को नीम की पत्तियों के साथ घिसकर खुजलीग्रस्त अंग पर उसका लेप करें। यह क्रिया नियमित रूप से करते रहें, खुजली से मुक्ति मिलेगी।

रुद्राक्ष को जल के साथ चंदन की तरह घिस लें। फिर इस लेप को फोडे+-फुंसियों पर लगाएं, लाभ होगा। यह लेप रक्त-दोष या एलर्जी के चकत्तों को भी दूर करता है।

रुद्राक्ष और बावची का एक-एक भाग हरताल और गोमूत्र के साथ पीसकर सफेद कुष्ठ से ग्रस्त स्थान पर उसका नियमित रूप से लेप करें, लाभ होगा।

रुद्राक्ष और बावची को समभाग में नीम के पत्तों के साथ पीसकर लेप लगाने से खुजली तथा अन्य चर्म रोग दूर होते हैं।

रुद्राक्ष, हल्दी और हरी दूब को समान भाग में छाछ के साथ पीसकर लेप बनाएं और दाद, खाज, खुजली पर लगाएं, लाभ होगा।

रुद्राक्ष, आंवले, यवक्षार और राल का समान मात्रा में कंजी के साथ लेप बनाकर सेहुंआ के सफेद दागों पर लगाएं, कुछ ही दिनों में दाग दूर होने लगेंगे।

चोट या मोच आ गई हो, या किसी अन्य कारण से शरीर के किसी भाग में सूजन आ गई हो, तो रुद्राक्ष, साठी, सोंठ, देवदारु, सहजन और सफेद सरसों समान मात्रा में लेकर कंजी के साथ पीसकर उसका प्रभावित भाग पर लेप करें, राहत मिलेगी।

किसी जहरीले जानवर के काट लेने पर रुद्राक्ष को घिसकर कटे हुए भाग पर लगाएं, विष का प्रभाव दूर हो जाएगा।

विषैले बरसाती कीड़े, बिच्छू, ततैया आदि के काट लेने पर उसका विष बड़ी+ पीड़ा देता है। ऐसी स्थिति में रुद्राक्ष, कलिहारी, मूली के बीज, अतीस, कडुवी, तुंबी तथा तोरई के बीज समान मात्रा में लेकर कंजी के साथ पीसकर उसका लेप प्रभावित भाग पर लगाएं, विष का प्रभाव तुरत दूर हो जाएगा।

आग से जलने पर रुद्राक्ष और चंदन को पीसकर जले हुए स्थान पर लेप करें, शीतलता मिलेगी और घाव शीघ्र भर जाएगा।

रुद्राक्ष, गेरु, गिलोय, लाल चंदन तथा वंशलोचन का समान मात्रा में चूर्ण बनाकर उसमें गोघृत मिलाकर लेप बना लें। फिर यह लेप नियमित रूप से शरीर पर लगाते रहें, घाव शीघ्र भर जाएंगे और चेहरे पर पडे+ दाग, मुहांसे आदि मिट जाएंगे।

रुद्राक्ष के चूर्ण और मोती तथा मूंगे की भस्म का समान रूप से मिश्रण तैयार कर २ ग्राम की मात्रा का नियमित रूप से सेवन करें, स्नायु की गड़बड़ी से मुक्ति मिलेगी।

रुद्राक्ष के चूर्ण को तुलसी की डंडी के चूर्ण में मिलाकर शहद के साथ नियमित रूप से सुबह खाली पेट सेवन करें, खांसी दूर होगी।

दो ग्राम रुद्राक्ष के चूर्ण को शहद में मिलाकर दो महीने तक भोजन के बाद नियमित रूप से सेवन करें, शरीर की ऊर्जा बनी रहेगी।

मिर्गी और अपस्मार की प्रारंभिक स्थिति में 1 ग्राम रुद्राक्ष के चूर्ण को २ ग्राम सरस्वती के साथ मिलाकर १०-१५ दिनों तक दिन में २ बार सेवन करें, लाभ होगा। इस दौरान मछली, मांस, अंडे, अचार, अमचूर आदि न खाएं।

छह मुखी रुद्राक्ष को जल के साथ घिसकर उसका लेप माथे पर नियमित रूप से लगाएं, मूर्च्छा नहीं आएगी।

रुद्राक्ष चूर्ण की पिट्ठी में नींबू का रस और चंदन का चूर्ण मिलाकर चेहरे पर कुछ दिनों तक नियमित रूप से लेप करें, काले धब्बे दूर हो जाएंगे।

२ ग्राम शुद्ध रुद्राक्ष का चूर्ण और आधा ग्राम मूंगे की भस्म को शहद के साथ मिलाकर जीभ पर लेप करें। यह क्रिया २१ दिनों तक नियमित रूप से करते रहें, जीभ की लड़खड़ाहट, तुतलाहट, हकलाहट, जलन आदि से मुक्ति मिलेगी। ध्यान रहे, यह लेप करने के बाद तीस मिनट तक कुछ भी ग्रहण नहीं करें।

रुद्राक्ष के १०-१५ दानों को तिल के २०० मिली ग्राम तेल में आधे घंटे तक उबालें। फिर नीचे उतारकर ठंडा कर लें और छान लें। अब निमोनियाग्रस्त व्यक्ति की छाती पर इस तेल की मालिश करें, उसे राहत मिलेगी। इसकी मालिश से छाती के दर्द से भी बचाव होता है।

घुटनों तथा शरीर के किसी अन्य जोड़ पर सूजन आ गई हो, तो रुद्राक्ष और सीताफल के पत्तों के चूर्ण समान रूप से मिलाकर सरसों के तेल के साथ मालिष करें, सूजन कम होगी।

स्वर्णमाक्षिक और दो मुखी रुद्राक्ष की भस्मों को बराबर की मात्रा में मिला लें और दूध, दही या मलाई के साथ 1 रत्ती सुबह और 1 रत्ती षाम नियमित रूप से लें, रक्तचाप सामान्य रहेगा।

एक ग्राम रुद्राक्ष तथा एक ग्राम स्वर्ण भस्मों को मिलाकर २१ दिनों तक दिन में दो बार नियमित रूप से गाय के दूध के मट्ठे या मक्खन के साथ सेवन करें, अनिद्रा दूर होगी। इस दौरान उष्ण पदार्थों से परहेज करें। शीघ्र लाभ हेतु दवा के सेवन के साथ-साथ रोज शाम को टहलें।

सुंदरता में निखार की कमी को दूर

करने हेतु

रुद्राक्ष, दालचीनी, लाल चंदन, कुल्थी और कूठ समान भाग में लेकर पानी मिलाकर उबटन बनाएं तथा उसका शरीर पर लेप करें। लेप सूखने के पष्चात स्वच्छ जल से इसे धो दें या स्नान करें। साबुन, षैंपू आदि का प्रयोग नहीं करें। ऐसा नियमित रूप से करते रहें, कुछ ही दिनों में शरीर से दुर्गंधयुक्त पसीने का निकलना बंद हो जाएगा और सौंदर्य में निखार आएगा।

रुद्राक्ष से चार गुना बादाम की गिरी और मसूर की दाल इतने ही गुलाब जल के साथ पीसकर चेहरे पर लेप करें और लेप के सूख जाने पर धो डालें। यह क्रिया नियमित रूप से करते रहें, चेहरा कांतिमय और आभायुक्त हो जाएगा।

रुद्राक्ष, काली मिर्च और वंषलोचन समान मात्रा में लेकर लेप बना लें और उसका नियमित रूप से चेहरे पर लेप करें, कुछ ही दिनों में कील-मुहांसे मिट जाएंगे।

गुलाब जल में आठ मुखी रुद्राक्ष व बादाम की गिरी का चूर्ण मिलाकर चेहरे पर लगाएं और एक घंटे बाद धोएं। यह क्रिया नियमित रूप से करते रहें, सुंदरता में वृद्धि होगी।

गुप्त रोगों से मुक्ति हेतु

रुद्राक्ष की मात्रा का दोगुना हर्रे, रसौत और सिरस की छाल चार गुना की मात्रा में लेकर कूट-पीसकर चूर्ण बनाएं और कपडे+ से छान कर शहद मिलाकर घावों पर लगाएं। यह लेप नियमित रूप से करते रहें, उपदंष शीघ्र दूर होगा।

तीन मुखी रुद्राक्ष को पत्थर पर घिसकर नाभि पर लगाने से धातु रोग से बचाव होता है ।

१४ मुखी रुद्राक्ष का जल के साथ लेप बनाकर प्रतिदिन रात्रि को मस्तक पर लगाएं, कामशक्ति का विकास होगा।

अन्य बीमारियों से मुक्ति हेतु रुद्राक्ष

का उपयोग

रुद्राक्ष को प्याज के रस के साथ घिसकर सिर के गंजे भाग पर लगाएं, गंजापन दूर होगा।

दस ग्राम दूब के रस के साथ एक ग्राम रुद्राक्ष की भस्म सुबह-शाम नियमित रूप से लें, बवासीर से राहत मिलेगी।

रुद्राक्ष को नीम की छाल के साथ घिसकर शरीर के कुष्ठग्रस्त भाग पर लेप करें, कुष्ठ का बढ़ना रुक जाएगा।

रुद्राक्ष के दाने को बकरी के दूध में घिसकर सेवन करें तथा शरीर के प्रभावित भाग की सिकाई करें। यह क्रिया नियमित रूप से करें, गठिये का दर्द कम होगा।

तुलसी के रस के साथ रुद्राक्ष की भस्म दो माह तक नियमित रूप से लें, शरीर में शर्करा की मात्रा सामान्य हो जाएगी और मधुमेह से मुक्ति मिलेगी।

चार मुखी रुद्राक्ष को उबालकर उस जल सेवन करें। यह क्रिया नियमित रूप से करें, पेशाब की जलन से मुक्ति मिलेगी।

चौदह मुखी रुद्राक्ष को घिसकर सफेद चंदन के साथ माथे पर लगाएं, अवसाद से मुक्ति मिलेगी।

रुद्राक्ष के कुछ दानों को पानी से भरे तांबे के लोटे में रात भर छोड़ दें। सुबह उस जल का सेवन करें। यह क्रिया नियमित रूप से करें, थाइरॉइड से रक्षा होगी। शीघ्र लाभ हेतु रुद्राक्ष के १२ दानों की माला गले पर बांधें।

रुद्राक्ष चूर्ण २ ग्राम, सौंफ ४ ग्राम तथा मिश्री ८ ग्राम पानी से भरे तांबे के लोटे में भिगोकर पानी में ही मसल लें और उसका सेवन करें, एसिडिटी दूर होगी।

रुद्राक्ष की भस्म 1 ग्राम, वंश लोचन 1 ग्राम और भृंग श्रृंग की भस्म 1 ग्राम शहद में मिलाकर ६ माह तक सेवन करें, तपेदिक से मुक्ति मिलेगी।

बार-बार हिचकी आती हो, तो एक-एक ग्राम रुद्राक्ष व मोर पंख की भस्म शहद के साथ सेवन करें।

एक भाग रुद्राक्ष तथा चार भाग शुद्ध घी में भुने आंवले के चूर्ण को कांजी के साथ पीसकर नियमित रूप से मस्तक पर लेप करें, नकसीर से छुटकारा मिलेगा।

शूद्र वर्ण का रुद्राक्ष स्त्री की कमर में बांध दें, गर्भ की रक्षा होगी।

पांच मुखी रुद्राक्ष को तुलसी के रस में घिसकर उसमें नींबू का रस मिलाकर चेहरे पर क्रीम की तरह लगाएं। लेप नियमित रूप से करें, कुछ ही दिनों में त्वचा में निखार आएगा और दाग-धब्बे मिट जाएंगे।

एक भाग रुद्राक्ष और चार भाग तिल के फूलों का चूर्ण बनाकर छान लें। फिर शहद के साथ मिलाकर बालों की जड़ों में लगाएं और एक घंटे बाद धो लें। यह क्रिया नियमित रूप से करते रहें, बाल शीघ्र ही बढ़ने लगेंगे।

रुद्राक्ष के काढ़े से रोग निवारण

रुद्राक्ष का काढ़ा भी बनता है जो अनेक रोगों का शमन करता है। यह शरीर को स्वस्थ रखता है और खून साफ करता है। इसके सेवन से चुस्ती और फुर्ती बनी रहती है। रुद्राक्ष का काढ़ा बनाने की विधि और उसके सेवन का विवरण यहां प्रस्तुत है।

रुद्राक्ष, किशमिश, हर्रे और अडू+से की जड़ की छाल समान मात्रा में लेकर बत्तीस गुना जल में मिलाकर खौलाएं और १/८ अंश रह जाने पर उतार लें। फिर २ से ३ ग्राम की मात्रा में शहद मिलाकर प्रातः काल नियमित रूप से सेवन करें, सांस की बीमारी, खांसी और पित्त जन्य रोग दूर होंगे।

रुद्राक्ष, शुष्ठी, कुटकी, गिलोय, दारुहल्दी, पुनर्नवा और नीम की छाल को समान मात्रा में लेकर पीस लें और ऊपर वर्णित विधि के अनुसार जल में मिलाकर काढ़ा बनाएं। फिर उतारकर थोड़ी देर के लिए छोड़ दें। जब थोड़ा गुनगुना रह जाए, तो उसका सेवन करें। यह क्रिया नियमित रूप से करते रहें, श्वास, पीलिया, पेट तथा पसलियों के दर्द से मुक्ति मिलेगी। यह काढ़ा शोथ को भी दूर करता है।

रुद्राक्ष, देवदारु, चित्रक, शुष्ठी, गिलोय, दारुहल्दी, हर्रे और पुनर्नवा का समभाग में ऊपर वर्णित विधि के अनुसार काढ़ा बनाकर सेवन करें, हाथ, पैर, चेहरे, उदर आदि की सूजन दूर होगी।

सोमवार, 31 मई 2010

जून माह का आंकलन

जून माह का ग्रह गोचर-- सूर्य १५ तारीख को मिथुन राशी में,मंगल पुरे महीने सिंह राशी में,बुध ६ तारीख को वृष तथा २२ तारीख को मिथुन राशी में,गुरु पुरे माह मीन में,शुक्र ९ तारीख को कर्क राशी में ,शनि,राहू व केतु क्रमश:कन्या,धनु व मिथुन में रहेंगे|

इस महीने की शुरुआत मंगलवार से हो रही तथा इस माह ५ मंगल, व ५ बुधवार होंगे जिनके प्रभाव से महंगाई बढेगी जिससे जनता में आक्रोश होगा,सीमाओ पर युद्ध जैसे हालात पैदा होंगे,नए नए अविष्कार होंगे जिससे देश की उन्नति होगी |माह की शुरुआत में मंगल शनि का एक दुसरे से १२वे होना तथा गुरु शनि का समसप्तक होना भयंकर रूप से अग्निकांडो व प्राक्रतिक आपदाओं का योग बना रहा हैं |९ तारीख से मंगल व शुक्र का एक दुसरे से १२वे होना स्त्री जातियो हेतु परेशानियो को बता रहा हैं, वही इस माह शनि अमावस्या का रोहिणी नक्षत्र में होना पानी की कमी होना दर्शा रहा हैं |१५ तारीख से सूर्य का केतु संग होना व शनि की दृष्टी में आना कही न कही सत्ता परिवर्तन करवा सकता हैं,बुध ग्रह का इन दोनों से २२ तारीख को मिलना तथा २६ तारीख को चन्द्र ग्रहण पड़ना भयंकर रूप से आंधी- तूफानों का आना व कही कही सुखा तथा अकाल पड़ना दर्शा रहे हैं |

सोना चांदी-शनि ग्रह का मार्गी होना सोना,चांदी में मंदी लाएगा,परन्तु ११.१२,व १३ तारीख को सोने में फिर तेजी आएगी जो की माह के अंत तक बनी रहेगी|

विभिन्न राशियो हेतु यह माह -मेष,वृष,मिथुन,कर्क,तुला,वृश्चिक,धनु व मीन राशियो हेतु यह माह सामान्य व उन्नति दायक रहेगा,वही कन्या,मकर व कुम्भ हेतु मिश्रित जबकि सिंह राशी हेतु संघर्ष पूर्ण रहेगा |

इस माह की भविष्यवाणी-किसी बड़े ओद्योगिक घराने में कोई घोटाला व मानहानि होने का अंदेशा हो सकता हैं |

गुरुवार, 27 मई 2010

सिंह राशी में मंगल

लीजिये मित्रो मंगल ग्रह(पिछले लगभग आठ महीनो से अपनी नीच राशी कर्क को छोड़कर) सिंह राशी में प्रवेश कर गए |सामान्यत:मंगल हर राशी में डेढ़ माह तक रहता हैं परन्तु अपनी इस नीच राशी में कुछ समय वक्री रहने की वजह से इस बार यह काफी समय से कर्क राशी में ही रहे जिसकी वजह से धरती पर काफी उथल पुथल तथा हलचल रही (ज्वालामुखी फटे,हिंसात्मक घटनाएं आदि हुई)

मंगल का यह सिंह राशी का प्रवेश भारत हेतु मंगलदायक सिद्द होगा भारत के शत्रु शांत होंगे तथा खनिज पदार्थ व बिजली के क्षेत्र में भारत काफी तरक्की हासिल करेगा, भारत का पराक्रम भी बढेगा परन्तु इस परिवर्तन से शेयर बाज़ार में ज़रूरकुछ समय के लिए गिरावट आ सकती हैं |

मंगल ग्रह की कारकता-यह अग्नि तत्त्व,पित्त प्रकृति व मज्जा का स्वामी हैं तथा शक्ति,पराक्रम,बल,भूमि,सम्पदा व सम्पति,युद्ध,सेना शस्त्र,रसोई,कृषि,धैर्य,मासिक धर्म,फोड़ा फुंसी,चर्मरोग,चेचक,मिर्गी आदि का कारक हैं |

विभिन्न राशियो पर मंगल ग्रह के इस परिवर्तन से निम्न प्रभाव पड़ेंगे |

मेष राशी-पेट के रोग हो सकते हैं,खर्चे बढ सकते हैं |हनुमान चालीसा का पाठ करे|

वृष राशी-घर में अशांति हो सकती हैं ,भू सम्पति में हानि तथा व्यवशाय में लाभ भी होगा | हनुमानाष्टक का पाठ करे |

मिथुन राशी-धन ,यश,सम्मान बढेगा तथा जीवन में सरलता आएगी |

कर्क राशी- भाग्य,धर्म,यश की वृद्दि होगी परिवार का सुख मिलेगा |

सिंह राशी- भवन, भूमि,शरीर व माँ की तरफ से सुख मिलेंगे |गायत्री मंत्र का जप करे |

कन्या राशी-शत्रु व खर्चे बढेंगे |मंगलवार को हनुमान मंदिर में दिया जलाये|

तुला राशी-धन,स्त्री,कुटुंब व सुख में वृद्दि होगी |

वृश्चिक राशी- व्यापार में सफलता तथा सांसारिक सुखो में वृद्दि होगी, हो सके तो यथा शक्ति दान करे |

धनु राशी-बहुत खर्चे होंगे,विदेश से शुभ समाचार मिलेंगे| ॐ कमल वसिन्ये नमः मंत्र का जाप करे |

मकर राशी- भूमि, माता व मकान सुख में कमी होगी परन्तु आमदनी अच्छी होगी | ॐ अंग अंगारकाय नमः मंत्र की एक माला रोजाना जपे|

कुम्भ राशी-भाग्य उदय व जीवन सुखी होगा |मंगल वस्तुए दान करे|

मीन राशी- विदेश व्यापार से नुक्सान व असंतोष होगा| ६ मंगलवार व्रत करे |

बुधवार, 19 मई 2010

१३ दिनों का पक्ष

हमारे भारतीय शास्त्रों में जब भी १३ दिनों का पक्ष का ज़िक्र हुआ हैं उसमे भयानक परिस्थितियो के बारे में कहा गया हैं|जब भी १३ दिनों का पक्ष आता हैं बहुत ज्यादा नरसंहार व जन धन की हानि होती हैं अगर हमारे इतिहास पर ध्यान दिया जाये तो हमें ऐसे बहुत से उदाहरण मिलते हैं जिनमे १३ दिनों के पक्ष के विषय में यह सभी बाते लागू होती हैं| भारत वर्ष में १५,१५ दिनों का शुक्ल व कृष्ण पक्ष होता हैं किसी भी कारण से यदि एक दिन धट जाए तो उसे तिथि क्षय माना जाता हैं परन्तु यदि दो दिन एक ही पक्ष में घट जाए तो यह प्रजा व जनता हेतु शुभ नहीं माना जाता हैं तथा इसके बेहद गंभीर व भयानक परिणाम होते हैं |
१) महाभारत का युद्ध ऐसे ही १३ दिनों के पक्ष में हुआ था |
२) दूसरा विश्व युद्ध (हिरोशिमा-नागासाकी पर परमाणु हमला) इसी पक्ष में हुआ|
३)१९५९ में भाद्रपद माह में अमरीका व चिली में भूकंप आया था |
४)१९६२ में भारत व चीन का युद्ध|
५)१९७६ में भारत में इमरजेंसी लगायी गयी तथा चीन में भूकंप आया था |
६)१९८२ में इजरायल व लेबनान में युद्ध हुआ था
ऐसे अन्य बहुत से उदाहरण हैं जिनसे इन १३ दिनों के पक्ष के विकराल व भयानक रूप के बारे में पता चलता हैं|
वैसे भारत व विश्व में इसके आगमन की दस्तक तो हो ही गयी हैं ज्वालामुखी फिर से फूट पड़ा,थाईलैंड में हिंसा भड़की,पूर्व उप राष्ट्रपति का निधन हुआ,४० जवानो की हत्या हो गयी तथा अभी २८ तारीख तक विश्व में कुछ बड़ा भयानक होने की प्रबल सम्भावना हैं ऐसा हमारा विश्वास ही नहीं हमारी गणना भी हैं |