गुरुवार, 4 जून 2026

शुक्र का स्थान योनि क्यू

 

पुराणों में एक कथा आती है जो अत्यंत ही दुर्लभ है पद्मपुराण (उत्तराखंड अध्याय 18) का कथन है कि एक बार जालंधर दैत्य और शिव जी का युद्ध चल रहा था और शुक्राचार्य संजीवनी विद्या द्वारा दैत्य जालंधर के मृत सैनिकों को जीवित कर रहे थे, जब शिव जी ने दैत्यगुरु शुक्राचार्य मारना चाहा तो शुक्र ने कहा कि ऐसा करने पर शिवजी को ब्रह्मम हत्या का दोष लगेगा क्योंकि दैत्यगुरु शुक्राचार्य ब्राह्मण है, तब शिव ने शुक्र को एक नारी की योनि में कैद करने का विचार किया ताकि कैद रहने पर वह सैनिकों को बार-बार अपनी विद्या से जीवित नहीं कर पाएंगे, शिव जी के ऐसा सोचते ही उनके तीसरे नेत्र से एक राक्षसी निकल पड़ी जिसके लंबे लंबे केश, बड़े-बड़े स्तन, विशाल नेत्र और विशाल पेट था, उस नग्न राक्षसी का नाम कृत्या था (ऐसा पद्मपुराण का मत है) शिव जी ने उस राक्षसी को आदेश दिया कि जब तक मैं जालंधर को ना मार डालू तब तक तुम शुक्राचार्य को अपनी योनि के भीतर दबा कर रखो, जब शुक्राचार्य ने राक्षसी को देखा तो, वह सब कुछ समझ कर भागने लगे लेकिन कृत्या राक्षसी ने शुक्राचार्य को दौड़ाकर पकड़ लिया उनका आलिंगन किया और उन्हें अपनी योनि डाल दिया और अदृश्य हो गई, शिव की आज्ञा से जब तक जालंधर नहीं मरा तब तक उस राक्षसी ने शुक्राचार्य को अपनी योनि से बाहर नहीं निकाला

संस्कृत के श्लोकों में यह कथा पद्मपुराण में अंकित है,तब से यौन संबंध तथा इससे प्राप्त सुख का संबंध शुक्र से जुड़ गया, शुक्र यौन अंगों और वीर्य का कारक शुक्र माना जाता है,ज्योतिष में आकर्षण और प्रेम वासना का प्रतीक शुक्र है इसलिए शुक्र से विवाह या पत्नी के लिए देखा जाता है ।


शुक्र ग्रह की अनुकूलता से व्यक्ति भौतिक सुख पाता है। शुक्र सुख, उपभोग, विलास और सुंदरता के प्रति आकर्षण पैदा करता है | शुक्र बलवान होने से व्यक्ति को स्त्री सुख/ सैया सुख प्राप्त होता है, प्रेम विवाह में सफलता का भी योगदान शुक्र के द्वारा होता है शुक्र संबंधी रोगो अर्थात यौन रोग में हीरा, रत्न धारण करना भी लाभप्रद रहता है अतः शुक्र बलवान अवश्य करना चाहिए ।

 


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