गुरुवार, 18 नवंबर 2021

नक्षत्र व उनके वृक्ष

जन्म के समय जातक विशेष की पत्रिका में कुछ ग्रह नक्षत्र उसके अनुकूल नहीं होते हैं,जो उसे उसके भावी जीवन में प्रतिकूल प्रभाव देते हैं इन ग्रह नक्षत्रो को शांत करने के लिए शास्त्रों में बहुत से उपाय बताए गए हैं जिनमें से एक उपाय उनसे संबंधित वृक्षों की पूजा अर्चना करना,उनकी सेवा व परिक्रमा करना तथा उनकी जड़ों में रोज पानी चढ़ाना आदि बताया गया है |

आइए जानते हैं कि कौन सा नक्षत्र किस वृक्ष से संबंधित माना गया है तथा उसकी पूजा - अर्चना अथवा सेवा करने से जीवन में आने वाली बाधाओं को किस प्रकार से कम किया जा सकता है |

अश्विनी नक्षत्र का वृक्ष कुचला है |

कृतिका नक्षत्र का वृक्ष गूलर है |

भरणी नक्षत्र का वृक्ष आंवला है

रोहिणी नक्षत्र का वृक्ष जामुन है

मृगशिरा व रेवती नक्षत्र का वृक्ष बेर है|

आर्द्रा नक्षत्र का वृक्ष कृष्णकमल होता है |

पुनर्वसु नक्षत्र का वृक्ष बबूल है |

पुष्य नक्षत्र का वृक्ष पीपल है |

अश्लेषा नक्षत्र का वृक्ष चंपा हैं |

मघा नक्षत्र का वृक्ष बरगद है |

पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र का वृक्ष अशोक हैं |

हस्त नक्षत्र का वृक्ष जूही हैं |

चित्रा व मूल नक्षत्र का वृक्ष बिल्व हैं |

स्वाति नक्षत्र का वृक्ष अर्जुन हैं |

ज्येष्ठा नक्षत्र का वृक्ष नीम हैं |

पूर्वषाढ़ा व श्रवण नक्षत्र का वृक्ष आक हैं |

उत्तराषाढ़ा व पूर्वाभाद्रपद नक्षत्र का वृक्ष कदंब हैं |

धनिष्ठा नक्षत्र का वृक्ष नारियल हैं |

शतभिषा नक्षत्र का वृक्ष आम हैं |

उत्तराभाद्रपद नक्षत्र का वृक्ष मेहंदी है |

इस प्रकार उपरोक्त वृक्षों की जड़ों में जल डालकर तथा उनकी पूजा अर्चना कर आप प्रतिकूल हुए नक्षत्रों को अपने अनुकूल कर उचित लाभ उठा सकते हैं तथा जीवन में आ रही बाधाओं को कम कर सकते हैं |

  

रविवार, 14 नवंबर 2021

राहू व केतू



राहू केतू छाया ग्रह माने जाते हैं भारतीय हिन्दू ज्योतिष मे इन्हे दैत्य माना जाता हैं जो सूर्य व चन्द्र को भी ग्रहण लग देते हैं | यह दोनों हमेशा

वक्रावस्था मे रहते हुये एक दूसरे के विपरीत भावो मे रहते हैं राहू को केतू से ज़्यादा भयानक माना गया हैं | पुराणो के अनुसार कश्यप ऋषि की 13 पत्नियों मे से एक पत्नी सिंहिका का पुत्र स्वरभानु था,जिसके अमृतपान कर लेने से रुष्ट होकर भगवान विष्णु ने अपने चक्र से उसके दो हिस्से कर दिये थे इस स्वरभानु के ऊपर का हिस्सा राहू तथा नीचे का हिस्सा केतू कहलाता हैं |

यह दोनों छाया ग्रह 12 राशियो का भ्रमण 18 वर्षो मे करते हैं तथा एक राशि मे 18 माह रहते हैं | राहू को विध्वंशक तथा केतू को मोक्षकर्ता माना गया हैं | राहू जिस भाव मे स्थित होता हैं उस भाव से संबन्धित कारकत्वों को ग्रहण लगा देता हैं अर्थात उनमे कमी कर देता हैं जबकि केतु उस भाव विशेष से विरक्ति प्रदान करता हैं | राहू को स्त्रीलिंग तथा केतू को नपुंशक माना गया हैं,राहू केतू के मित्र बुध,शुक्र व शनि हैं तथा मंगल इनसे समता का भाव रखता हैं | यह दोनों छायाग्रह होने के कारण जिस राशि मे होते हैं उसके स्वामी के जैसे ही फल प्रदान करते हैं | केंद्र,त्रिकोण मे होने से यह कई प्रकार के शुभयोग प्रदान करते हैं | विशोन्तरी दशा पद्दती मे राहू को 18 तथा केतू को 7 वर्ष दिये गए हैं |

चन्द्र से केंद्र मे राहू यदि 1 से 8 भावो मे होतो जातक लंबा होता हैं और यदि केतू चन्द्र से केंद्र मे होकर 1 से 8  भावो मे होतो जातक कद मे छोटा होता हैं |

राहू 1,7,9,11 राशियो के अतिरिक्त सभी राशियो मे शुभफल प्रदान करता हैं,कन्या राशि मे इसे अंधा माना जाता हैं जिस कारण इस राशि मे यह कोई फल नहीं देता हैं |

लग्न मे राहू बहुत शुभ होने पर जातक लंबा व पतला,बहुत घूमने वाला तथा तकनीकी ज्ञान वाला होता हैं परंतु किसी ना किसी रोग से पीडित ज़रूर रहता हैं,यदि राहू चन्द्र संग होतो जातक स्वार्थी व लालची प्रवृति का तथा मानसिक विकार वाला होता हैं ऐसे मे यदि चन्द्र केंद्र का स्वामी होतो जातक माता व परिवार का वफादार नहीं होता हैं राहू उसे हावभाव पूर्ण वाणी,बहुत तरक्की तथा दो पत्नीयो का सूख प्रदान कर्ता हैं |

केतू लग्न मे जातक को छोटा कद,विकलांगता,मूर्खतापूर्ण आचरण,वाचालता तथा अन्य अशुभ प्रभाव देता हैं |

दूसरे भाव मे राहू जातक को धन व पैतृक संपत्ति देता हैं परंतु जातक का धन बचता नहीं हैं अर्थात जातक को बरकत नहीं होती ऐसा जातक किसी के मामले मे हस्तक्षेप नहीं करता,वाणी संबंधी विकार से ग्रस्त हो सकता हैं परिवार से भी ऐसे जातक की कम निभती हैं बहुधा विवाह बाद परिवार से अलग रहते हैं |

केतू यहाँ पर जातक की पूश्तैनी संपत्ति को कर्जे द्वारा नष्ट कर देता हैं जातक को बड़ा परिवार परंतु आमदनी कम देता हैं |

तीसरे भाव मे सम राशि का राहू शुभ माना जाता हैं यहाँ राहू जातक को परिवार मे सबसे छोटा बनाता हैं जो सहोदरो हेतु अशुभ होता हैं |

केतू यहाँ कर्ण रोग तथा कमजोर दिमाग देता हैं बहुधा जातक के परिवार मे सहोदर अथवा 3 सदस्य ही होते हैं |

चतुर्थ भाव मे राहू भूमि अथवा मकान के सुख मे कमी करता हैं जातक मानसिक रूप से व्याकुल व परेशान रहता हैं उसकी माँ का स्वास्थ्य भी ठीक नहीं रहता उसके मकान मे वस्तु अथवा प्रेत दोष अवश्य होता हैं |

केतू यहाँ जातक को घर से उचाट रखता हैं अर्थात जातक घर से बाहर रहना ज़्यादा पसंद करता हैं तथा उसके अपनी माँ से संबंध अच्छे नहीं होते |

पंचम भाव मे राहू शिक्षा पूर्ण नहीं होने देता परंतु बुद्दिमान बनाता हैं उसे कला,फोटोग्राफी व लेखन का शौक देता हैं जातक को विवाह सुख मे किसी ना किसी रूप मे परेशानी ज़रूर देता हैं पत्नी यदि सुंदर होती हैं तो जातक उस पर शक करता हैं उसे गर्भविकार रहते हैं जिससे संतान संबंधी कष्ट जातक के जीवन मे रहते हैं अथवा पहली संतान मे परेशानी होती हैं बहुधा जातक की पुत्र संतान नहीं होती |

केतू यहाँ संतान हेतु अशुभता देता हैं तथा शिक्षा मे रुकावट ज़रूर देता हैं |

संक्षेप मे कहे तो इस भाव मे राहू केतू शिक्षा व संतान हेतु अशुभ रहते हैं संतान पर रूखा व्यवहार रखवाते हैं परंतु संतान से बेहद लगाव भी करवाते हैं |

छठे भाव मे राहू जातक को ताकतवर बना उसे अच्छी नौकरी प्रदान करता हैं उसे मामा से लाभ प्राप्त कराता हैं पाप प्रभाव मे होने से जातक की कलाई पर निशान,नेत्र रोग तथा उसके मामा को पुत्र नहीं देता हैं |

केतू यहाँ जातक को शत्रुता से बचाता हैं अर्थात जातक के शत्रु नहीं होते |

सातवे भाव मे राहू जातक को विवाह सूख मे किसी न किसी प्रकार से कमी प्रदान करता हैं,मंगल संग होने पर राहू यहाँ जातक की पत्नी को मासिक धर्म संबंधी बीमारी देता हैं जिससे जातक के अन्य स्त्रीयों से संपर्क बन जाते हैं,मंगल,चन्द्र संग राहू यहाँ नेत्रा व गुप्त रोग देता हैं शुक्र से केंद्र मे राहू यहाँ पत्नी भक्त बनाता हैं जो दूसरों को हमेशा भला बुरा कहता रहता हैं |

केतू यहाँ जातक को पत्नी से समय समय पर दूर करता रहता हैं अर्थात जातक व उसकी पत्नी किसी भी कारण से अलग अलग रहते हैं बहुधा जातक की पत्नी वाचाल प्रवृति की होती हैं जिस कारण जातक उसे जातक बात बात पर टोकता अथवा जलील करता रहता हैं |

अष्टम भाव मे राहू जातक को लंबी बीमारी द्वारा मृत्यु देता हैं | 2,4,5,6,8,10,12 राशियो का राहू होने पर जातक की पत्नी सुंदर व मृत्यु सुखद अर्थात बेहोशी या सोते हुये होती हैं जातक को अपने जीवन काल मे उदर रोग रहता हैं |

केतू यहाँ दंतरोग,चर्मरोग इत्यादि देता हैं तथा जातक को आत्महत्या हेतु भी उकसाता रहता हैं |

नवम भाव मे राहू सरकार द्वारा लाभ प्रदान करता हैं परंतु संतान देर से देता हैं राहू यदि समराशि मे को कष्ट तथा जवानी मे जुआ खेलने की आदत देता हैं उसकी इस आदत की वजह से अच्छे लोग उससे दूर रहते हैं तथा वह ग़लत दोस्तों के कारण अपयश पाता हैं |

केतू नवम भाव मे जातक को अच्छी अध्यात्मिकता और धार्मिकता की और धकेलता हैं परंतु जातक स्वयं को धर्म अध्यात्म आदि से अलग बताता हैं |

दशम भाव मे 2,4,5,6,8,10,12 राशियो का राहू जातक को शुभता,अधिकार व प्रसिद्दि देता हैं ऐसा जातक छोटा काम नही करते प्राय 30 वर्ष बाद इनके जीवन मे बदलाव आता हैं यह राजनीति करने मे बड़े गुणी होते हैं |

केतू यहाँ जातक से निम्न कार्य कराता हैं स्वयं का व्यापार करने नहीं देता जातक का चरित्र शंकालु होता हैं तथा पिता को शुभता नहीं देता |

एकादश भाव मे राहू धन व पद दोनों देता हैं परंतु पुत्र केवल एक ही देता हैं ऐसा जताक कर्ण रोग से पीड़ित होता हैं तथा शीघ्र धनवान बनने की चाह मे जातक सट्टा,लॉटरी इत्यादि मे धन लगता हैं |

केतू यहाँ गजेट्स का शौकीन बनाता हैं तथा जातक अपने बड़ो से दूर रहना पसंद करता हैं |

द्वादश भाव मे राहू नेत्र रोग,एक से अधिक विवाह,नींद मे परेशानी तथा डींगे मारने वाला व्यक्तित्व देता हैं ऐसा जातक करता कुछ नहीं हैं परंतु बातें बड़ी बड़ी करता हैं चन्द्र संग होने पर जातक का रुझान आध्यात्मिकता की और बढ़ा देता हैं |

केतू यहाँ जातक को मस्तमौला व्यक्तित्व देता हैं ऐसा जातक किसी की भी परवाह नहीं करता |

 

सोमवार, 25 अक्टूबर 2021

लाल किताब के अनुसार दृष्टि

1-7/4-10 की दृष्टि सौ प्रतिशत होती है |

3- 5,9 को 50% दृष्टि

8-12 को 25% 2 को 100%

2-6  को 25%

5-9 को 50% दृष्टि देता है |

लाल किताब - कुंडली व ग्रह प्रकार

 


1)अंधा
टेवा - जब दसवें भाव में दो या अधिक शत्रु ग्रह बैठ जाए तो टेवा अंधा देवा कहलाता है,जैसे बुध गुरु अथवा शुक्र मंगल राहु दसवें भाव में हो तो यह देवा अंधा टेवा होगा |

उपाय के तौर पर 10 अंधों को हर वर्ष भोजन कराएं |

2)रतांध ग्रह -  सूर्य चौथे भाव में हो तथा शनि सातवें भाव में हो तो ऐसे में शनि को सोया हुआ माना जाता है |

लग्न खाली होतो है इसके लिए मिट्टी के लोटे में शहद जमीन में दबाए |

यदि शनि जागा हुआ हो (लग्न मे ग्रह होतो)  तो बांसुरी में देसी खांड जमीन में दबाए |

3)धर्मी ग्रह - चौथे भाव में राहु केतु ,ग्यारहवें भाव में शनि, गुरु शनि (5 9 11 12) भाव में हो तो टेवा धर्मी ग्रह का टेवा कहलाता हैं |

4)टकराव के ग्रह 1/8 में बैठे हुए ग्रह अशुभ फल देते हैं |

5)बुनियादी ग्रह - 1/5 भाव में ग्रह बैठे हो तो शुभ फल प्रदान करते हैं |

6)मुकाबले का ग्रह - दो मित्र के संग शत्रु ग्रह (एक ग्रह का चाहे दोनों ग्रहो का ) बैठ जाए तो मुकाबले का ग्रह बन जाता है जैसे सप्तम भाव में शुक्र बुध संसूर्य  हो तो पत्नी बीमार रहती है |

7)साथी ग्रह -  अपने-अपने घर पर राशि बदलकर बैठे हुए ग्रह को साथी ग्रह कहा जाता है |

शुक्रवार, 15 अक्टूबर 2021

आर्यन खान कब मिलेगी राहत - कुंडली व प्रश्न कुंडली विश्लेषण

हमारी इस पोस्ट में हमने शाहरुख खान के बेटे आर्यन खान को कब जेल से राहत मिलेगी यह बताने का प्रयास शाहरुख खान की पत्रिका आर्यन खान की चंद्र पत्रिका तथा प्रश्न कुंडली के माध्यम से देने का प्रयास किया है हमें आशा है कि हमारे ज्योतिष मित्रों को यह पोस्ट पसंद आएगी |

https://youtu.be/FV1fajMbLRQ

शनिवार, 2 अक्टूबर 2021

कब होगा कल्कि अवतार ?

 


दसवे अवतार कल्कि के समय के बारे में श्रीमद भगवत महापुराण में जो वर्णन आता है उसके आधार पर हम कल्कि अवतार के जन्म समय के निर्धारण का प्रयास इस लेख में करेंगे श्रीमद भगवत पुराण के 12वीं स्कंध के द्वितीय अध्याय के 16वे श्लोक में कहा गया है कि भगवान कल्कि कलयुग के अंत में अवतार ग्रहण करेंगे | 23वे श्लोक में कहा गया है कि कलयुग के अंतिम दिनों में कल्कि भगवान की कृपा स्वरूप मनुष्य के मन में सात्विकता का संचार होगा और लोग अपने वास्तविक स्वरूप को जान सकेंगे तभी से सतयुग का प्रारंभ होगा |

हम सब जानते हैं की अभी कलयुग चल रहा है जिसकी आयु 432000 वर्ष है तथा इस समय कलयुग का प्रथम चरण चल रहा है  | 2078 विक्रमी के आरंभ तक कलयुग के केवल 5122 वर्ष व्यतीत वर्ष ही हुए हैं, अंतिम अवतार का का जन्म कलयुग के अंत में होगा, जिससे स्पष्ट हैं की अभी  निकट भविष्य मे इस कल्कि अवतार के अवतरित होने की कोई भी संभावना नहीं है | 23वे श्लोक से स्पष्ट है कि कल्कि अवतार से ही सत्य युग का प्रारंभ हो जाएगा |

इसी अध्याय के 24वे श्लोक में कहा गया है कि जिस समय चंद्रमा,सूर्य तथा गुरु एक ही साथ एक ही समय पुष्य नक्षत्र में प्रवेश करते हुये एक ही राशि,जो की वर्तमान समय के अनुसार कर्क राशि पर आते हैं उसी समय सतयुग प्रारंभ होता है |

जिससे यह स्पष्ट है कि कल्कि का अवतार और सतयुग की शुरुआत एक ही साथ होगी यानी कल्कि के जन्म के समय की ग्रह स्थिति ठीक वही होगी जो सतयुग के आरंभ के समय बताई गई है इस बात से कल्कि अवतार के जन्म समय के संदर्भ में निम्नलिखित बातें निकल कर सामने आती हैं |

पहली गुरु,सूर्य और चंद्रमा जब एक साथ पुष्य नक्षत्र में प्रवेश करेंगे तो कल्कि का जन्म होगा | पुष्य नक्षत्र कर्क राशि के अंतर्गत है (चंद्रमा जन्म के समय जिस राशि के नक्षत्र में हो व्यक्ति विशेष की जन्म राशि और नक्षत्र वही होता है ) कल्कि के जन्म की राशि कर्क और जन्म नक्षत्र पुष्य होगा |

दूसरा सूर्य कर्क राशि के पुष्य नक्षत्र में 19 जुलाई से 1 अगस्त की अवधि में रहते हैं अतः कल्कि का जन्म 19 जुलाई से 1 अगस्त के मध्य होगा |

तीसरा सूर्य और चंद्रमा का एक साथ एक नक्षत्र एवं राशि में प्रवेश करने का अर्थ है उस समय अमावस्या या उसके आसपास का समय होना अर्थात कल्कि का जन्म अमावस्या अथवा अमावस्या के आसपास होगा जिससे शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा भी संभव है यद्यपि वर्तमान में श्रावण शुक्ल पंचमी को कल्कि जयंती मनाई जाती है परंतु इस प्रमाण से यह तिथि मेल नहीं खाती है |

बृहस्पति गोचर भ्रमण करते हुए लगभग प्रत्येक 12 वर्ष में एक राशि पर पुन: आते हैं |किसी श्रेष्ठ गणना करने वाले सॉफ्टवेयर की मदद से अगर यह पता लगाया जा सके कि गुरु कर्क राशि में किस वर्ष 19 जुलाई से 1 अगस्त की अवधि में होंगे,जिसके बीच चंद्रमा का संचार भी उस अवधि में कर्क राशि के पुष्य नक्षत्र से हो तो कल्कि अवतार का संभावित समय जाना जा सकता है |