गुरुवार, 20 मार्च 2014

नक्षत्र व कार्य सिद्दी



किसी भी कार्य को करने से पहले यदि उस दिन के नक्षत्र अनुसार उपाय कर लिए जाए तो कार्य होने की संभावना कई गुना बढ़ जाती हैं प्रस्तुत लेख मे हमने प्रत्येक नक्षत्र के अनुसार भोजन सामग्री का सेवन करने से होने वाली कार्य सिद्दी को बताने का प्रयास किया हैं जिनको प्रयोग मे लाकर कोई भी व्यक्ति अपने कार्यो मे सफलता पा सकता हैं |

1)अश्विनी-इस नक्षत्र मे गुड से बने पदार्थ,उड़द की दाल,सीताफल की सब्जी खाकर कार्य करने से कार्यो मे सफलता मिलती हैं |

2)भरणी-तिल के बने पदार्थ तथा चावल का भोजन करने से कार्यसिद्दि होती हैं |

3)कृतिका-इस नक्षत्र मे दही,उड़द तथा मिश्री खाकर काम करने से सफलता मिलती हैं |

4)रोहिणी-इस नक्षत्र मे शुद्ध घी का बना पदार्थ खाने व गोरोचन का तिलक करने से कार्य मे सफलता मिलती हैं |

5)मृगशिरा-इस नक्षत्र मे लाल मसूर की दाल का सेवन करने तथा कस्तुरी अपने पास रखने से कार्य सिद्दी होती हैं |

6)आद्रा-इस नक्षत्र मे मक्खन खाकर कार्य करने से कार्य पूर्ण होता हैं |

7)पुनर्वसु-इस नक्षत्र मे शुद्ध घी का सेवन करने व कस्तुरी को पास रखने से कार्य सिद्दी होती हैं |

8)पुष्य-इस नक्षत्र मे कार्य सिद्दी हेतु दूध व दुग्ध पदार्थो का सेवन करना चाहिए |

9)अश्लेषा-इस नक्षत्र मे गुड तथा शक्कर का सेवन करने से व केसर का प्रयोग पुजा मे करने से कार्य सिद्द हो जाते हैं |

10)मघा-इस नक्षत्र मे कार्य सिद्दी के लिए भोजन मे केसर का प्रयोग करना चाहिए

11)पूर्वाफाल्गुनी-इस नक्षत्र मे कार्य सिद्दी के लिए आलू से बने पदार्थ व हरी इलायची खाने चाहिए |

12)उत्तराफाल्गुनी-इस नक्षत्र मे उड़द,लहसुन तथा आलू के बने भोज्य पदार्थ खाने से कार्य सिद्दी होती हैं |

13)हस्त-सिंघाड़े का सेवन इस नक्षत्र मे करने से कार्य सिद्दी होती हैं |

14)चित्रा-इस नक्षत्र मे मूंग की दाल से बने भोज्य पदार्थ का सेवन करने से कार्य सिद्दी होती हैं |

15)स्वाति-इस नक्षत्र मे कार्यसिद्दि के लिए केले व सेब का सेवन करना चाहिए |

16)विशाखा-इसमे कार्य पूर्ति के लिए आवले का सेवन करना चाहिए |

17)अनुराधा-इस नक्षत्र मे कार्य सिद्दी के लिए मिश्री व किशमिश खानी चाहिए |

18)ज्येष्ठा-इस नक्षत्र मे सफलता के लिए शककरकंद तथा मिश्री खानी चाहिए 

19)मूल-इसमे सफलता के लिए मुली का सेवन करना चाहिए |

20)पूर्वाषाढ़ा-इस नक्षत्र मे सफलता के लिए नींबू,आवला व मिश्री का सेवन करना चाहिए |

21)उत्तराषाढ़ा-इस नक्षत्र मे कार्यसिद्दि के लिए बेलपत्र व नींबू का सेवन करना चाहिए |

22)श्रवण-इस नक्षत्र मे सफलता के लिए दूध का सेवन करना चाहिए |

23)धनिष्ठा-इस नक्षत्र मे कामयाबी हेतु करेले व मूंग की दाल के बने भोजन पदार्थ का सेवन करना चाहिए |

24)शतभीषा-तुम्बे के बीज का सेवन इस नक्षत्र मे करने से कार्य पूर्ण होता हैं |

25)पूर्वाभाद्रपद-इस नक्षत्र मे सफलता के लिए करेला व दही का सेवन करना चाहिए

26)उत्तराभाद्रपद-इस नक्षत्र मे कार्य सिद्दी के लिए उड़द की दाल का सेवन करना चाहिए |

27)रेवती-इस नक्षत्र मे सफलता के लिए पानी मे उपजे फल का सेवन करना चाहिए 

बुधवार, 19 मार्च 2014

आपकी सूर्य राशि व रंग



सूर्य हर माह लगभग 15 तारीख के करीब राशि परिवर्तन करता हैं जिसके अनुसार उस राशि मे जन्मे जातको को कुछ विशेष रंग प्रयोग करने की सलाह दी जाती हैं इस लेख मे हमने इसी विषय पर प्रकाश डाला हैं |

मेष राशि(15 अप्रैल से 15 मई )-इस राशि जातको को लाल,पीला व हल्का नीला रंग ज़्यादा प्रयोग करना चाहिए |

वृष राशि–इस राशि के लोगो को गुलाबी व सफ़ेद रंग ज़्यादा प्रयोग करना चाहिए |

मिथुन राशि-हरा,गुलाबी व सफ़ेद रंग इनके लिए लाभकारी रहता हैं |

कर्क राशि-सफ़ेद तथा हल्का व समुद्री हरा रंग इनके लिए ज़्यादा शुभ रहता हैं |

सिंह राशि-नारंगी,सुनहेरा व पीला रंग इनके लिए शुभ रहता हैं |

कन्या राशि-हरा,हल्का नीला व हल्का गुलाबी रंग इनके लिए शुभ रहता हैं |

तुला राशि-नीला,सफ़ेद व गुलाबी रंग इनके लिए शुभ रहता हैं |

वृश्चिक राशि-लाल,बैंगनी व कत्थई रंग इनके लिए शुभ रहता हैं |

धनु राशि-पीला,सुनहेरी व नीला रंग इनके लिए शुभ रहता हैं |

मकर राशि-गहरा नीला,कत्थई व काला रंग इनके लिए शुभ रहता हैं |

कुम्भ राशि- बैंगनी,काला व गहरा नीला रंग इनके लिए शुभ रहता हैं |

मीन राशि-पीला,सफ़ेद,हल्का बैंगनी रंग इनके लिए शुभ रहता हैं

संगीत से रोग भगाये


आजकल संगीत द्वारा बहुत सी बीमारियो का इलाज किया जाने लगा हैं | चिकित्सा विज्ञान भी यह मानने लगा हैं की प्रतिदिन 20 मिनट अपनी पसंद का संगीत सुनने से रोज़मर्रा की होने वाली बहुत सी बीमारियो से निजात पायी जा सकती हैं जिस प्रकार हर रोग का संबंध किसी ना किसी ग्रह विशेष से होता हैं उसी प्रकार संगीत के हर सुर व राग का संबंध किसी ना किसी ग्रह से अवश्य होता हैं यदि किसी जातक को किसी ग्रह विशेष से संबन्धित रोग हो और उसे उस ग्रह से संबन्धित राग,सुर अथवा गीत सुनाये जाये तो जातक विशेष जल्दी ही स्वस्थ हो जाता हैं प्रस्तुत लेख मे हमने इसी विषय को आधार बनाकर ऐसे बहुत से रोगो व उनसे राहत देने वाले रागो के विषय मे जानकारी देने का प्रयास किया हैं जिन शास्त्रीय रागो का उल्लेख किया किया गया हैं उन रागो मे कोई भी गीत,संगीत,भजन या वाद्य यंत्र बजा कर लाभ प्राप्त किया जा सकता हैं | यहाँ हमने उनसे संबन्धित फिल्मी गीतो के उदाहरण देने का प्रयास भी किया हैं |

1)हृदय रोग –इस रोग मे राग दरबारी व राग सारंग से संबन्धित संगीत सुनना लाभदायक हैं इनसे संबन्धित फिल्मी गीत निम्न हैं- तोरा मन दर्पण कहलाए (काजल),राधिके तूने बंसरी चुराई (बेटी बेटे ),झनक झनक तोरी बाजे पायलिया ( मेरे हुज़ूर ),बहुत प्यार करते हैं तुमको सनम (साजन),जादूगर साइया छोड़ो मोरी (फाल्गुन),ओ दुनिया के रखवाले (बैजु बावरा ),मोहब्बत की झूठी कहानी पे रोये (मुगले आजम )

2)अनिद्रा –यह रोग हमारे जीवन मे होने वाले सबसे साधारण रोगो मे से एक हैं इस रोग के होने पर राग भैरवी व राग सोहनी सुनना लाभकारी होता हैं जिनके प्रमुख गीत इस प्रकार से हैं 1)रात भर उनकी याद आती रही(गमन),2)नाचे मन मोरा (कोहिनूर),3)मीठे बोल बोले बोले पायलिया(सितारा),4)तू गंगा की मौज मैं यमुना (बैजु बावरा),5)ऋतु बसंत आई पवन(झनक झनक पायल बाजे),6)सावरे सावरे(अंनुराधा),7)चिंगारी कोई भड़के (अमर प्रेम),छम छम बजे रे पायलिया (घूँघट ),झूमती चली हवा (संगीत सम्राट तानसेन ),कुहु कुहु बोले कोयलिया (सुवर्ण सुंदरी )

3)एसिडिटी –इस रोग के होने पर राग खमाज सुनने से लाभ मिलता हैं इस राग के प्रमुख गीत इस प्रकार से हैं 1)ओ रब्बा कोई तो बताए प्यार (संगीत),2)आयो कहाँ से घनश्याम(बुड्ढा मिल गया),3)छूकर मेरे मन को (याराना),4)कैसे बीते दिन कैसे बीती रतिया (ठुमरी-अनुराधा),5)तकदीर का फसाना गाकर किसे सुनाये ( सेहरा ),रहते थे कभी जिनके दिल मे (ममता ),हमने तुमसे प्यार किया हैं इतना (दूल्हा दुल्हन ),तुम कमसिन हो नादां हो (आई मिलन की बेला)

4)कमजोरी –यह रोग शारीरिक शक्तिहीनता से संबन्धित हैं इस रोग से पीड़ित व्यक्ति कुछ भी काम कर पाने मे खुद को असमर्थ महसूस करता हैं इस रोग के होने पर राग जय जयवंती सुनना या गाना लाभदायक होता हैं इस राग के प्रमुख गीत निम्न हैं मनमोहना बड़े झूठे(सीमा),2)बैरन नींद ना आए (चाचा ज़िंदाबाद),3)मोहब्बत की राहों मे चलना संभलके (उड़न खटोला ),4)साज हो तुम आवाज़ हूँ मैं (चन्द्रगुप्त ),5)ज़िंदगी आज मेरे नाम से शर्माती हैं (दिल दिया दर्द लिया ),तुम्हें जो भी देख लेगा किसी का ना (बीस साल बाद )

5)याददाश्त –जिन लोगो की याददाश्त कम हो या कम हो रही हो उन्हे राग शिवरंजनी सुनने से बहुत लाभ मिलता हैं इस राग के प्रमुख गीत इस प्रकार से हैं,ना किसी की आँख का नूर हूँ(लालकिला),2)मेरे नैना(महबूबा),3)दिल के झरोखे मे तुझको(ब्रह्मचारी),4)ओ मरे सनम ओ मरे सनम(संगम ),5)जीता था जिसके (दिलवाले),6)जाने कहाँ गए वो दिन(मेरा नाम जोकर )

6)खून की कमी –इस रोग से पीड़ित होने पर व्यक्ति का चेहरा निस्तेज व सूखा सा रहता हैं स्वभाव मे भी चिड़चिड़ापन होता हैं ऐसे मे राग पीलू से संबन्धित गीत सुनने से लाभ पाया जा सकता हैं | 1)आज सोचा तो आँसू भर आए (हँसते जख्म),2)नदिया किनारे घिर आए बदरा(अभिमान),3)खाली हाथ शाम आई हैं (इजाजत),4)तेरे बिन सुने नयन हमारे (लता रफी),5)मैंने रंग ली आज चुनरिया (दुल्हन एक रात की),6)मोरे सैयाजी उतरेंगे पार(उड़न खटोला),

7)मनोरोग अथवा डिप्रेसन –इस रोग मे राग बिहाग व राग मधुवंती सुनना लाभदायक होता हैं इन रागो के प्रमुख गीत इस प्रकार से हैं | 1)तुझे देने को मेरे पास कुछ नहीं(कुदरत नई),2)तेरे प्यार मे दिलदार(मेरे महबूब),3)पिया बावरी(खूबसूरत पुरानी),4)दिल जो ना कह सका (भीगी रात),तुम तो प्यार हो(सेहरा),मेरे सुर और तेरे गीत (गूंज उठी शहनाई ),मतवारी नार ठुमक ठुमक चली जाये(आम्रपाली),सखी रे मेरा तन उलझे मन डोले (चित्रलेखा)

8)रक्तचाप-ऊंच रक्तचाप मे धीमी गति और निम्न रक्तचाप मे तीव्र गति का गीत संगीत लाभ देता हैं ऊंच रक्तचाप मे “चल उडजा रे पंछी की अब ये देश ( भाभी ),ज्योति कलश छलके ( भाभी की चूड़ियाँ ),चलो दिलदार चलो ( पाकीजा ),नीले गगन के तले (हमराज़) जैसे गीत व निम्न रक्तचाप मे “ओ नींद ना मुझको आए (पोस्ट बॉक्स न॰ 909),बेगानी शादी मे अब्दुल्ला दीवाना (जिस देश मे गंगा बहती हैं ),जहां डाल डाल पर ( सिकंदरे आजम ),पंख होती तो उड़  आती रे (सेहरा ) | शास्त्रीय रागो मे राग भूपाली को विलंबित व तीव्र गति से सुना या गाया जा सकता हैं |

9)अस्थमा –इस रोग मे आस्था–भक्ति पर आधारित गीत संगीत सुनने व गाने से लाभ होता हैं राग मालकोंस व राग ललित से संबन्धित गीत इस रोग मे सुने जा सकते हैं जिनमे प्रमुख गीत निम्न हैं तू छुपी हैं कहाँ (नवरंग),तू हैं मेरा प्रेम देवता(कल्पना),एक शहँशाह ने बनवा के हंसी ताजमहल (लीडर),मन तड़पत हरी दर्शन को आज (बैजु बावरा ),आधा हैं चंद्रमा ( नवरंग )


10)सिरदर्द –इस रोग के होने पर राग भैरव सुनना लाभदायक होता हैं इस राग के प्रमुख गीत इस प्रकार से हैं मोहे भूल गए सावरियाँ (बैजु बावरा),राम तेरी गंगा मैली (शीर्षक),पूंछों ना कैसे मैंने रैन बिताई(तेरी सूरत मेरी आँखें),सोलह बरस की बाली उम्र को सलाम (एक दूजे के लिए )

मंगलवार, 18 मार्च 2014

चैत्र विक्रम संवत 2071


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शनिवार, 8 फ़रवरी 2014

स्त्री जातक व तिल

स्त्री जातक व तिल

तिलो का शरीर पर अपना अलग ही महत्व होता हैं प्रस्तुत लेख मे हम स्त्री जातक के शरीर मे विभिन्न हिस्सो पर पाये जाने वाले तिलो के विषय मे जानकारी दे रहे हैं जिनसे स्त्री के आचरण,व्यवहार,विचार व भाग्य इत्यादि का पता लगाया जा सकता हैं |

1)स्त्री के सिर के मध्य भाग मे तिल उसे पति का पूर्ण सुख पाने वाली,शुद्ध हृदय व सम्पूर्ण ऐश्वर्या प्राप्त करने वाली बनाता हैं | सिर की दायीं ओर का तिल समाज मे प्रतिष्ठित परंतु उदास स्वभाव वाली स्त्री का होना बताता हैं जिसे विवाह के बाद विदेश मे रहना पड़ता हैं तथा सिर के बाईं ओर का तिल उसे दुर्भाग्यशाली बनाता हैं |

2)जिस स्त्री के ललाट पर काले रंग का तिल होता हैं वह पुत्रवान,सौभाग्यवान,धार्मिक स्वभाव व दयालु प्रवृति की होती हैं | ललाट की दायीं और तिल स्त्री के जन्म स्थान से दूर रहने वाली,अच्छे स्वभाव की स्त्री होना बताता हैं जिसे संतान कष्ट रहता हैं | ललाट के बीचोबीच तिल स्त्री को कला कुशल परन्तु कठोर वचन कहने वाली बनाता हैं | जबकि ललाट के बाईं और का तिल स्त्री को पति सुख मे कमी दर्शाता हैं |

3)स्त्री के भोहों के मध्य भाग मे तिल उसे सरकार से ऊंच पद का लाभ प्राप्त करवाता हैं अर्थात वह या उसका पति सरकारी नौकरी वाले होते हैं |किसी एक भोह मे बना तिल स्त्री के स्वभाव मे ओछेपन का प्रतीक होता हैं ऐसी स्त्री का विवाह बेमेल होता हैं |

4)स्त्री की आँखों के ऊपर या नीचे तिल होतो वह स्त्री अनुचित तरीके से धन संचय करने वाली तथा संतान विहीन होती हैं जो अपने स्वास्थ्य की सही से देखभाल नहीं करती हैं उसकी आयु भी कम होती हैं |जबकि स्त्री की आँख मे तिल पति की प्रियतमा होने की सूचना देता हैं |

5)स्त्री की दायीं ओर आँख के नीचे गाल पर तिल होतो स्त्री धार्मिक व सदाचारिणी होती हैं जिसे हर जगह मान समान व यश प्राप्त होता हैं जबकि बाईं ओर आँख के नीचे गाल पर तिल होतो ऐसी स्त्री अत्यधिक काम वासना से पीड़ित रहती हैं जिसके उसकी उम्र से छोटे कई प्रेमी होते हैं |

6)स्त्री के कान मे तिल उसके आभूषण प्रिया होने की सूचना देते हैं जबकि कान के नीचे तिल उसकी अन्य स्त्रीओ से शत्रुता के बारे मे बताते हैं |

7)स्त्री के नाक के अग्रभाग मे लाल रंग का तिल उसके सौभाग्यशाली व  ऊंचाधिकारी की पत्नी होने का सूचक होता हैं |

8)स्त्री के मुख मे तिल उसके सुखी,सम्पन्न व सज्जन होने की सूचना देता हैं उपरी होंठ पर तिल स्त्री के शिक्षावान होने का संकेत देता हैं ऐसी स्त्री अच्छी वक्ता या शिक्षिका होती हैं |

9)स्त्री के बाएँ गाल मे काला तिल उसके ऐश्वर्या पूर्ण जीवन के बारे मे बताता हैं जो भोग विलास मे अधिक रुचि रखती हैं जबकि लाल तिल उसके मिष्ठान प्रिय होने के बारे मे बताता हैं तथा दायें गाल पर तिल स्त्री को किसी असाध्य बीमारी होने के बारे मे बताता हैं |

10)स्त्री की ठोड़ी मे तिल उसके मिलनसार ना होने का पता बताता हैं जो किसी से भी घुलना मिलना पसंद नहीं करती हैं जिन्हे आम भाषा मे लजीली स्त्री कहते हैं |

11)स्त्री के कंठ मे तिल हो तो वह अपने घर मे हुकूमत चलाना पसंद करती हैं सब पर नियंत्रण रखना चाहती हैं |

12)स्त्री के हृदय स्थान मे तिल सौभाग्य का प्रतीक होता हैं बाएँ स्तन पर लाल तिल होतो स्त्री के पुत्र जन्म बाद विधवा हो जाने का सूचक होता हैं काला तिल होतो उस स्त्री की मृत्यु किसी दुर्घटना से होती हैं जबकि दायें स्तन मे तिल स्त्री की कन्या संतान की अधिकता बताता हैं |

13)स्त्री की बाईं भुजा मे तिल उसके कला,काव्य,अभिनय,संगीत इत्यादि के क्षेत्र से जुड़ा होने का प्रतीक होता हैं जिससे उसे धन व यश प्राप्त होता हैं |

14)स्त्री के गुप्त स्थान के दायीं ओर तिल होतो वह राजा अथवा ऊंचाधिकारी की पत्नी होती हैं जिसका पुत्र भी आगे चलकर अच्छा पद प्राप्त करता हैं |

15)स्त्री की जंघा पर तिल उसके यात्रा व भ्रमण प्रिया होने की सूचना देते हैं 

16)स्त्री के पाँव के टखने मे तिल उसकी दरिद्रता भरे जीवन की सूचना देता हैं |















गुरुवार, 30 जनवरी 2014

श्राद्ध मे हैं भाव की अहमियत -

श्राद्ध मे हैं भाव की अहमियत -

भक्ति की तरह श्राद्ध मे भी भाव की अहमियत होती हैं | यदि अन्न,वस्त्र खरीदने के लिए धन ना हो तो शाक से श्राद्ध कर देना चाहिए | यदि शाक खरीदने की भी सामर्थ ना होतो तृण व काष्ठ आदि बेचकर शाक खरीदे व श्राद्ध करे यदि इसकी भी व्यवस्था ना हो सके पद्म पुराण के अनुसार यदि गाय को घास खिला दे तो भी श्राद्ध पूर्ण हो जाता हैं | यदि घास भी ना मिले तो श्राद्धकर्ता एकांत मे दोनों हाथ उठाकर निम्नलिखित श्लोक से पितरो की प्रार्थना करे |

न मेअस्ति वितनम न धनम च नान्यच्छाध्ह्योपयोग्यम स्वपित्रन्नतों अस्मि |
त्रिप्यंतु भक्त्या पितरो मयैतौ कृतौ भुजौवत्मर्नी मारुतस्य | |

अर्थात हे मेरे पित्रगण | मेरे पास श्राद्ध के लिए ना तो धन हैं ना धान्य | हाँ, मेरे पास आपके लिए श्राद्ध और भक्ति हैं | मैं इन्ही के द्वारा आपको तृप्त करना चाहता हूँ | आप तृप्त हो जाये,मैंने शास्त्रा नुसार दोनों भुजाओ को आकाश मे उठा रखा हैं |

एक अन्य मत अनुसार जातक विशेष के अपने सामर्थनुसार सोने के पिंड,चावल के पिंड व मिट्टी के पिंड द्वारा भी अपने पूर्वजो को पिंड दान कर श्राद्ध कर्म किया जा सकता हैं | 








शनिवार, 25 जनवरी 2014

सूर्य ग्रहण पर्व कुरुक्षेत्र मे क्यू ?

सूर्य ग्रहण पर्व कुरुक्षेत्र मे क्यू |

जिस प्रकार मानव शरीर मे सभी अंग विशेष की एक निश्चित जगह मानी गयी हैं उसी प्रकार कुरुक्षेत्र को वेदो के अनुसार पृथ्वी का हृदय बताया गया हैं ग्रहण के समय सूर्य की किरणे के प्राप्त ना होने से प्राण शक्ति का ह्रास होता हैं जिससे हृदय रोग होने की संभावना बढ़ जाती हैं ऐसे समय मे सांसारिक कार्य ना कर पुजा दान पुण्य ईश्वर उपासना कर प्राण शक्ति बचाई जा सकती हैं इसलिए कुरुक्षेत्र मे सूर्य ग्रहण के समय धर्म अनुष्ठान करना शुभ माना गया हैं |

वेदो के अनुसार कुरुक्षेत्र के तालाब के जल मे सोमांश रहता हैं जिसके पान से आत्मबल प्राप्त कर इंद्र ने वृत्रासुर का वध किया था |


ग्रहण काल मे “ॐ नमो भगवते चन्द्र्प्रभ जिनेन्द्राय चंद्र महिताय चंद्र किर्ति मुख रंजनी स्वाहा” इस मंत्र को ग्रहण के दिन रात्री मे जपने से श्रेष्ठ विद्या प्राप्त होती हैं |  

शनिवार, 18 जनवरी 2014

अप्रैल मे जन्मे बच्चे ज़्यादा बीमार

अप्रैल मे जन्मे बच्चे ज़्यादा बीमार

ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिको ने अपने शोध के अनुसार बताया हैं की जो बच्चे जिस माह मे होते हैं उनका स्वास्थ्य व बौद्धिक क्षमता भी उसी माह के अनुसार होती हैं जैसे बसंत माह मे जन्मे बच्चे स्वास्थ्य की दृस्टी से सबसे ज़्यादा परेशान रहते हैं जिससे उनकी पढ़ाई भी अपने साथियो के मुक़ाबले कम रहती हैं | वैज्ञानिको के अनुसार अलग अलग माह मे जन्म लेने बच्चो का स्वास्थ्य समान ना होने की प्रमुख वजह महिलाओ द्वारा गर्भावस्था मे ली गयी धूप हैं जिसे गर्भावस्था मे पर्याप्त मात्रा मे ना लेने से आगे चलकर उनके बच्चो को कई दिक्कतों का सामना करना पड़ सकता हैं,अक्तूबर से दिसंबर के मध्य होने वाले बच्चो की लंबी आयु होने के पीछे भी यही तथ्य होता हैं | वैज्ञानिको की माने तो बसंत के बजाए ठंड मे जन्म लेने वाले बच्चे 160 दिन अधिक जीते हैं तथा उनमे विभिन्न मानसिक व शारीरिक बीमारियाँ होने की संभावना 50% तक कम होती हैं

विभिन्न माह मे जन्मे बच्चो को भावी जीवन मे होने वाली बीमारियाँ

जनवरी-अल्ज़ाइमर्स,मिर्गी,शिजोफ़्रेनिया,क्रोन्स डीजीज

फरवरी-पाचन तंत्र संबंधी बीमारियाँ,अल्ज़ाइमर्स,मिर्गी,नार्कोलेप्सी

मार्च-शराब की लत,अस्थमा,मधुमेह,हृदय रोग,अल्ज़ाइमर्स,आटिज्म,

अप्रैल,मई,जून,जुलाई,-ग्लूकोमा,मासिकधर्म,पार्किंसंस,पाचनतंत्र संबंधी बीमारियाँ,शराब की 
लत,अस्थमा,मधुमेह,हृदय रोग,अल्ज़ाइमर्स,आटिज्म,डाउन सिंड्रोम,अंधापन

अगस्त-आटिज्म,अस्थमा,डाउन सिंड्रोम

सितंबर,अक्तूबर,नवंबर-अस्थमा


दिसंबर-शिजोफ़्रेनीया,क्रोन्स डीसीज |    

गुरुवार, 16 जनवरी 2014

श्री राम का विवादित जन्म वर्ष

श्री राम का विवादित जन्म वर्ष

बालकांड सर्ग 18 श्लोक 8,9,10 मे बाल्मीकी जी ने उल्लेख किया हैं श्री राम का जन्म चैत्र शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को अभिजीत मुहूर्त मे दोपहर मे हुआ | उस समय पाँच ग्रह सूर्य शनि(व),मंगल,शुक्र व गुरु ऊंच अवस्था मे थे और कर्क लग्न व चन्द्र पुनर्वसु नक्षत्र का था | श्लोक के अनुसार “यज्ञ के पश्चात छह ऋतुओ के बीत जाने पर बारहवे मास चैत्र शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को पुनर्वसु नक्षत्र व कर्क लग्न मे कौशल्या ने दिव्य लक्षणो से युक्त सर्वलोक वंदित जगदीश्वर श्री राम को जन्म दिया” | उस समय नौ मे से पाँच गृह सूर्य शुक्र मंगल गुरु व वक्री शनि अपनी ऊंच राशि मे थे और लग्न मे चन्द्र संग गुरु विराजमान था |

कंप्यूटर से गणना करने से यह 21/2/5115 ईसा पूर्व आता हैं | इस दिन नवमी तो आती हैं लेकिन नक्षत्र पुष्य आता हैं | गणना के अनुसार जब सूर्य मेष मे होता हैं तो नवमी पुनर्वसु नक्षत्र मे नहीं हो सकती क्यूंकी सूर्य और चन्द्र के मध्य की दूरी 93”20 अंश ही हो सकती हैं जबकि नवमी तिथि के आरंभ के लिए यह दूरी 96 अंश होनी चाहिए अत;बाल्मीकी जी के लेखन मे कहीं भेद हैं | नवमी तिथि के बारे मे तुलसी रामचरितमानस मे भी उल्लेख हैं एवं रामनवमी चैत्र शुक्ल की नवमी को ही मनाई जाती हैं | बालकांड के 190वे दोहे के बाद की प्रथम चौपाई मे तुलसीदास जी लिखते हैं पवित्र चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को मध्यान मे अभिजीत नुहूर्त मे श्री राम का जन्म हुआ | अत; हम नवमी तिथि का ही आधार लेकर एवं नक्षत्र की गणना को अनदेखा कर राम जन्म तिथि की गणना करते हैं तो 21/2/5115 ईसा पूर्व प्राप्त होती हैं इस प्रकार 18 अप्रैल 2013 को श्री राम के 7127 वर्ष पूरे होकर 7128वा वर्ष आरंभ हुआ 

बाल्मीकी रामायण के बालकांड के 20वे सर्ग के एक श्लोक मे राजा दशरथ अपनी व्यथा प्रकट करते हुये कहते हैं की उनका कमलनयन राम सोलह वर्ष का भी नहीं हुआ हैं और उसमे राक्षसो के साथ युद्ध करने की योग्यता नहीं हैं जिससे यह पता चलता हैं की 16वे वर्ष मे श्री राम ऋषि विश्वामित्र के साथ तपोवन गए थे जहां उन्होने कई राक्षसो का संहार किया और अहिल्या को स्पर्श कर उसका उद्धार किया | उसके बाद वह जनक की मिथिला नगरी गए ओर वहाँ उन्होने धनुष को तोड़ सीता से विवाह किया | तपोवन से मिथिला के मार्ग मे 23 स्मारक मिलते हैं जो श्री राम के होने की पुष्टि करते हैं |

विवाह के एक वर्ष बाद अर्थात 17 वर्ष की आयु मे उन्होने वन प्रस्थान किया एवं 31वे वर्ष वो वापस अयोध्या आए उनकी वनयात्रा के लगभग 200 स्मारक अभी भी हैं जो उनके होने की पुष्टि करते हैं जिनमे प्रमुख  रामेश्वरम,चित्रकूट,पंचवटी,शबरी व अत्री आश्रम हैं |

श्री राम व श्री कृष्ण के मध्य 60 राजाओ का उल्लेख आता हैं | यदि एक राजा का औसत काल 35 वर्ष माना जाये तो श्री राम कृष्ण से लगभग 2000 वर्ष पूर्व उत्पन्न हुये श्री कृष्ण का जन्म 21/7/3228 ईसा पूर्व को आधीरात मे मथुरा मे हुआ | मोहन जोदड़ों के 2600 ईसा पूर्व के शिलालेखों मे भी श्री कृष्ण का विवरण मिलता हैं एवं 3000 ईसा पूर्व के मिश्री पिरामिडो मे भागवत गीता के श्लोक मिलते हैं | यह माना जाता हैं की जिस दिन श्री कृष्ण ने अपनी देह त्यागी थी उसी दिन से कलयुग आरंभ हुआ था जिसकी गणना 18/2/3102 ईसा पूर्व आती हैं, श्री कृष्ण ने 126वे वर्ष अपनी देह त्यागी थी | इस प्रकार उनकी जन्मतिथि 3228 ईसा पूर्व आती हैं और इससे श्री राम की जन्मतिथि की गणना मेल खाते हुये 5115 ईसा पूर्व तय होती हैं |

एक अन्य मत अनुसार अमरीका के प्लेनेटेरियम नामक सोफ्टवेयर से देखने पर यह तिथि 10/1/5114 ईसा पूर्वा आती हैं जो की हिन्दू केलेण्डर के अनुसार चैत्र मास शुक्ल पक्ष की नवमी का दिन बताती हैं जिसके आधार पर हम सब रामनवमी इसी दिन मानते हैं |

रामायण के अयोध्या कांड (2॰4.18 )मे वर्णन आता हैं की जब राम के राज तिलक की तैयारी चल रही थी तब चर्चा आती हैं की राजा दशरथ का नक्षत्र सूर्य मंगल राहू के दुसप्रभाव से घिरा था | इस सूचना के आधार पर इस सॉफ्टवेयर से यह तिथि 5/1/5089 ईसा पूर्व आती हैं जो उस समय राम जी के 25 वर्ष के होने की पुष्टि करती हैं |

रामायण मे खर दूषण वध वनवास के 13वे वर्ष हुआ था उसके विवरण के अनुसार उस समय सूर्य ग्रहण हुआ था अत: अमावश्य तिथि थी तथा मंगल गृह कई ग्रहो से घिरा हुआ था सोफ्टवेयर के अनुसार यह तिथि 7/10/5077 ईसा पूर्व आती हैं इस दिन अमावस्या को सूर्यग्रहण हुआ था तथा मंगल के एक तरफ बुध व शुक्र थे व दूसरी तरफ सूर्य शनि थे 

इसी प्रकार अन्य श्लोक के अनुसार रावण वध के समय गृह स्थिति जब सोफ्टवेयर मे डाली गयी तो 4/12/5076 ईसा पूर्व की तिथि आती हैं तथा राम जी का वनवास 2/1/5075 ईसा पूर्व को पूर्ण होता हैं जब श्री राम की आयु 39 वर्ष बनती हैं | राम सूर्यवंश के 64वे राजा थे ऋग्वेद के आधार पर इतिहासकार प्रमाणित करते हैं की राम से पूर्व इस वंश मे 63 राजा हो चुके थे |

एक अन्य मत पुष्कर भटनागर द्वारा लिखित पुस्तक “डेटिंग इरा ऑफ लॉर्ड रामा” के आधार पर श्री राम का जन्म 10 जनवरी 5114 ईसा पूर्व को 12:30 पर कर्क लग्न मे बताया गया हैं पुस्तक के अनुसार 11/1/5114 6:00 मीन लग्न मे भरत तथा 12/1/5114 को 11:30 से 13:00 बजे के मध्य लक्ष्मण व शत्रुघ्न का जन्म बताया गया हैं | यह पुस्तक रामायण काल की अन्य घटनाओ की तारीखे भी बताती हैं जो निम्न प्रकार से हैं |


राम वनवास 5/1/5089 ईसा पूर्व चैत्र शुक्ल पक्ष की नवमी पुष्य नक्षत्र व राम की आयु 25 वर्ष दशरथ मृत्यु 10/1/5089 ईसा पूर्व,खर दूषण वध 7/10/5077(सूर्य ग्रहण),सीता हरण 12/12/5077,बाली वध 3/4/5076,हनुमान लंका गमन 12/9/5076(चन्द्र ग्रहण),लंका दहन 13/9/5076,हनुमान वापसी 14/9/5076,राम सेना लंका मे 20/9/5076,मेघनाद वध 23/11/5076,रावण वध 4/12/5076 राम की अयोध्या वापसी 29/12/5076॰ पुस्तक के अनुसार यह भी बताया गया हैं की युद्ध 40 दिनो तक चला था जिसमे छठे दिन राम रावण का पहली बार सामना हुआ तथा 15वे दिन कुंभकरण का वध हुआ था |       

बुधवार, 15 जनवरी 2014

अगर ग्रहस्थ आश्रम से मोक्ष मिलता तो......................

अगर ग्रहस्थ आश्रम से मोक्ष मिलता तो........................

शुकदेवजी जब जन्म के कुछ समय बाद वन को जाने लगे तो उनके पिता व्यासजी ने ने उनसे कहा “बेटा कुछ दिन ठहरो मैं तुम्हारे कुछ संस्कार तो कर दू“ |

इस पर शुकदेवजी ने कहा अब तक जन्म जन्मांतरों मे मेरे असंख्य संस्कार हो चुके हैं जिन्होने  मुझे भटका रखा हैं इसलिए अब मैं संस्कारो से कोई सरोकार नहीं रखना चाहता

अपने पुत्र की बात सुनकर व्यासजी बोले तुम्हें ब्रह्मचर्य,ग्रहस्थ,वानप्रस्थ और सन्यास इन चारो आश्रमो मे प्रवेश करना ही चाहिए तभी तुम्हें मोक्ष प्राप्त हो सकेगा |

शुकदेव बोले “अगर ब्रह्मचर्य से मोक्ष मिलता तो नपुंसको को वह हमेशा ही प्राप्त रहता,अगर ग्रहस्थाश्रम से मोक्ष मिलता होता तब तो सारी दुनिया को ही मुक्ति मिल गयी होती,अगर वानप्रस्थों को मोक्ष मिलता होता तो सारे पशु पक्षी मुक्त हो गए होते और अगर सन्यास से मोक्ष मिलता हो,तब तो सारे दरिद्रों को वह फौरन मिलना चाहिए” |

व्यासजी ने कहा “ग्रहस्थों के लिए लोक परलोक दोनों सुखद होते हैं“| पुत्रहीन व्यक्ति नरक गमन करता हैं |

अपने पिता की बातों को काटते हुये शुकदेव ने कहा “अगर पुत्र होने से स्वर्ग मिलता तो शूकरो,कुत्तो,और टिड्डिओ को भी व मिलता होगा | व्यासजी “पुत्र के दर्शन से मनुष्य पित्रऋण से मुक्त हो जाता हैं,पौत्र दर्शन से देवऋण से मुक्त हो जाता हैं और प्रपौत्र के दर्शन से उसे स्वर्ग की प्राप्ति होती हैं” |

शुकदेव ने जवाब दिया गिद्दों की आयु बहुत लंबी होती हैं वे अपनी कई पीढ़ियाँ देखते हैं पौत्र प्रपौत्र तो उनके लिए साधारण सी बात हैं पर ना जाने उनमे से कितनों को मोक्ष मिला होगा |

यह सुनकर व्यासजी निरुत्तर हो गए |








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