बुधवार, 9 फ़रवरी 2022

सोलह सुखो का ये संसार

 पहला सुख निरोगी काया ।

दूजा सुख घर में हो माया ।

तीजा सुख कुलवंती नारी ।

चौथा सुख सुत आज्ञाकारी ।

पाँचवा सुख सदन हो अपना ।  

ठा सुख सिर कोई ऋण ना ।

सातवाँ सुख चले व्यापारा ।

आठवाँ सुख हो सबका प्यारा ।

नौवाँ सुख भाई औबहन हो ।

दसवाँ सुख न बैरी स्वजन हो ।

ग्यारहवाँ मित्र हितैषी सच्चा ।

बारहवाँ सुख पड़ौसी अच्छा ।

तेरहवां सुख उत्तम हो शिक्षा ।

चौदहवाँ सुख सद्गुरु से दीक्षा ।

पंद्रहवाँ सुख हो साधु समागम।

सोलहवां सुख संतोष बसे मन ।

सोलह सुख ये होते भाविक जन ।

जो पावैं सोइ धन्य हो जीवन ।

 

 

रविवार, 6 फ़रवरी 2022

मंगल का अमंगल क्यू होता हैं ?

 

संस्कृत भाषा मे मंगल शब्द का शाब्दिक अर्थ “उन सभी वस्तुओ से होता हैं जो आस्तित्व व सृजन हेतु आवश्यक होती हैं“ इसी कारण सभी सृजनात्मक कार्यो को “मांगलिक कार्य भी कहा जाता हैं | मंगल ग्रह नैसर्गिक व प्राकृतिक रूप से सृजनात्मक हैं किन्तु जब इसकी यही सृजनात्मक विशेषताएँ ग़लत रूप से प्रयुक्त होने लगती हैं तो यह विध्वंशक रूप ले लेता हैं और इसे मंगल की जगह अमंगल समझा जाने लगता हैं |

सभी ज्योतिषीय ग्रंथो मे मंगल ग्रह के कारकत्व दिये गए हैं परंतु इसके आंतरिक चरित्र के विषय मे किसी भी ग्रंथ मे कोई भी उल्लेख नहीं किया गया हैं जिससे इसका वास्तविक रूप समझ मे नहीं आ पाता हैं यह कोई भी ग्रंथ अथवा विद्वान नहीं बता पाता की इसे क्रूर ग्रह होने पर भी मंगल नाम क्यू दिया गया हैं |

मंगल शब्द संस्कृत के मूल शब्द मांग से बना हैं जिसका अर्थ चलने वाला अर्थात गति करने वाला होता हैं यह वह ऊर्जा हैं जो स्थिर अथवा जड़त्व वस्तुओ को हिलाती हैं | हम सभी जानते हैं की ब्रह्मांड मे सभी शक्तियो  का श्रोत सूर्य होता हैं परंतु यह भी सत्य हैं की सूर्य स्वयं गति नहीं करता हैं,सूर्य का वाहन मंगल हैं तथा इस मंगल की गति के कारण ही धरती पर जीवन होता हैं इसी गति अथवा बहाव को पुराणो मे गंगा कहा गया हैं यह गंगा शंब्द गम धातु से बना हैं जिसका शाब्दिक अर्थ भी मंगल की भांति चलने वाला अथवा गति करने वाला होता हैं |

इस प्रकार देखे तो मंगल व गंगा का अर्थ समान होता हैं | यहाँ यह भी ध्यान दे की मकर राशि का मंगल ग्रह व गंगा से संबंध हैं,मंगल मकर राशि मे ऊंच होता हैं वही मकर राशि के प्रतीक मकर को पुराणो के अनुसार गंगा का वाहन कहाँ गया हैं |

मंगल की किरणों का धरती पर आना गंगा के बहाव के समान ही होता हैं राशियो मे यह सर्वप्रथम मेष राशि अर्थात कालपुरुष के सिर का स्पर्श सबसे पहले करती हैं जिसका प्रथम नक्षत्र अश्विनी होता हैं जिसके प्रतीक दो घोड़े होते हैं यह घोड़े गति का प्रतिनिधित्व करते हैं जो मंगल की विशेषता होती हैं |

पुराणो के अनुसार जब गंगा के रूप मे ऊर्जा धरती पर आई तो उसके आक्रामक बहाव अथवा वेग को शिव (कालपुरुष) ने अपने सिर (मेष राशि) से नियंत्रित किया था जिससे यह सिर पर विराजित हो गयी सिर का यह वो स्थान होता हैं जो की परम शिव का स्थान माना जाता हैं,प्रयोगिक अथवा विज्ञान के रूप मे देखे तो सिर का यह हिस्सा सेरेबेलम कहलाता हैं जिससे शरीर मे होने वाली सभी क्रियाओ का नियंत्रण होता हैं  | मंगल की सकारात्मक ऊर्जा शरीर के ऊपरी हिस्से अर्थात सिर मे तथा नकारात्मक ऊर्जा शरीर के निचले हिस्से अर्थात कुंडलिनी शक्ति के रूप मे सर्पाकार अवस्था मे रहती हैं मंगल की यह नकारात्मक ऊर्जा भावानुसार वृश्चिक राशि मे पड़ती हैं जो ज्योतिष मे कुंडलिनी शक्ति को ही दर्शाती हैं यही वह शक्ति हैं जो धरती पर सभी जीवो को जन्म देती हैं (वृश्चिक राशि प्रजनन अंगो व काम संबंधो से संबन्धित होती हैं)

इस प्रकार यह मंगल भौतिक जगत मे दो प्रकार से कार्य करता हैं तथा इसके दो भाव बनते हैं जो बाहरी शक्ति व भीतरी शक्ति को दर्शाते हैं | इसका सकारात्मक व बाहरी शक्ति का भाव मेष (अग्नि) राशि को दर्शाता हैं जो कालपुरुष के जन्म,सिर,चेहरे आदि को बताता हैं तथा इसका नकारात्मक व भीतरी शक्ति का भाव वृश्चिक (जलीय) राशि को बताता हैं जो कालपुरुष के गुप्त व उत्सृजन अंग,मृत्यु अथवा जीवन की निकासी को बताता हैं | जिससे इस मंगल के कारण धरती पर जीवन के संचालन का पता चलता हैं संभवत; इसी कारण इसे मंगल नाम दिया गया हैं |

मंगल कर्क राशि मे नीच का हो जाता हैं अर्थात प्रभावहीन हो जाता हैं कर्क का स्वामी ग्रह चन्द्र होता हैं व कर्क राशि जलीय राशि भी हैं जहां मंगल की ऊर्जा जल प्रभाव के कारण निष्प्रभावी हो जाती हैं और अपना सम्पूर्ण प्रभाव नहीं दे पाती | वही मकर राशि मे जाने पर यह मंगल ऊंच का प्रभाव देते हैं क्यूंकी मकर राशि का स्वामी शनि होता हैं जो की ठड़कता एवं किसी भी वस्तु को जमाना (जड़त्वता) का प्रतीक हैं जो जल को भी जमा सकता हैं जिस कारण इस राशि मे मंगल की ऊर्जा ठोस शक्ति का आकार ले लेती हैं जिससे मंगल अपना पूर्ण प्रभाव इस राशि मे दे पाता हैं | यहाँ यह भी ध्यान रखे की मकर शब्द का शाब्दिक अर्थ “शक्ति का होना अर्थात जिसके पास शक्ति हैं” होता हैं |

आत्मा “लिंग“ से परे होती हैं परंतु मंगल के प्रभाव से उसमे जन्म लेने पर लिंग निर्धारण होता हैं इस प्रकार मंगल पृथ्वी पर भोग सुख अथवा यौन सुख का कारक बन पृथ्वी पर जीवन चलाता हैं जिससे सम्पूर्ण सृष्टि चलती हैं | भारतीय ज्योतिष के प्राचीन पुरोधा मंगल के इस प्रभाव से भली भांति परिचित थे इसी कारण वर वधू चयन के समय वह सबसे पहले इस मंगल ग्रह की स्थिति दोनों पत्रिकाओ मे देखते थे वह यह जानते थे की यदि मंगल की स्थिति ठीक ना हुई तो यह वैवाहिक अथवा भोग सुख मे अवश्य ही तनाव उत्पन्न करेगा जिससे यह मंगल ना होकर अमंगल हो जाएगा |

जब मंगल पत्रिका मे 1,4,7,8 व 12 भाव मे होता हैं तो वह जातक को जुनूनी,आक्रामक,गुस्सेबाज़,ऊर्जावान व अधिक कामी बनाता हैं ऐसे मे यदि उसका जीवन साथी भी उस प्रकार का ना हुआ तो उसके सांसारिक जीवन मे अवश्य ही परेशानिया हो जाएंगी | सभी वैवाहिक स्त्रीयों मे इस मंगल की संवेदन तरंग पायी जाती हैं जिस कारण उन्हे माथे अथवा मांग मे सिंदूर लगाया जाता हैं जो इस मंगल का ही प्रतीक होता हैं संभवत: इसी कारण विवाह आदि मांगलिक कारणो मे लाल रंग का प्रयोग ज़्यादा किया जाता हैं |

मंगल सृजनकर्ता हैं हमारा जन्म इसी मंगल के प्रभाव से होता हैं स्त्रीयों मे मासिक धर्म मंगल के कारण ही होता हैं जबकि मासिक चक्र चन्द्र से होता हैं यदि मंगल की स्थिति स्त्री की पत्रिका मे ठीक ना होतो उसे मासिक धर्म संबंधी रोग होते हैं और यदि इसी मंगल की खराब स्थिति के कारण उसे मासिक धर्म ही ना होतो वह संतान उत्पन्न करने मे असमर्थ होती हैं यही वह तथ्य हैं जो मंगल को सृजन करने वाला बनाता हैं इसी मंगल की दूसरी राशि वृश्चिक द्वारा ही स्त्री पुरुष के यौन अंगो अथवा जननांगो का निर्धारण होता हैं |

मंगल भूख व तृष्णा का ग्रह हैं हमारा खान पान इसी मंगल की अग्नि (जठराग्नि) से प्रभावित होता हैं जब भोजन अथवा पानी लाल रंग का प्रयोग किया जाता हैं तब हमारी भूख प्यास बढ़ जाती हैं ऐसा विज्ञान भी मानता हैं मुख्यत: देखे तो हमारी सभी पसंद-नापसंद इस मंगल पर ही निर्भर करती हैं जो भी वस्तु हमें पसंद अथवा आकर्षित करती हैं मंगल के कारण ही करती हैं इसी मंगल के कारण ही हम कुछ पैदा करते हैं नष्ट करते हैं फिर कुछ नया पैदा करते हैं सृजन करते हैं |

मंगल हमारी ऊर्जा हैं जो शुभ होने पर चन्द्र संग मिलकर हमारा रक्त संचालन करता हैं मंगल जहां रक्त व मज्जा का प्रतिनिधित्व करता हैं वही साहस,पुरुषार्थ,आत्मविश्वास हेतु भी देखा जाता हैं जो सभी प्राणियों मे पाया जाता हैं और बिना इन सबके कोई भी जीवन मे कुछ प्राप्त नहीं कर सकता,इसी मंगल के अशुभ होने पर यह अहम,क्रोध,धैर्यहीनता,झगड़ने की प्रवृति,कमजोर का शोषण करने की इच्छा,रक्तपात हेतु प्रेम,भोग प्रवृति,चौर्यक्रम व हत्या जैसे फल भी प्रदान करता हैं |       

शनिवार, 5 फ़रवरी 2022

नक्षत्र और बीमारी

हर व्यक्ति के जन्म के समय सभी ग्रह किसी न किसी राशि और किसी नक्षत्र पर अवस्थित होते ही हैं किन्तु जन्म के समय चन्द्रमा जिस नक्षत्र सम्बंधी पर अवस्थित होता है उसे ही सबसे महत्वपूर्ण माना जाता हैं इसे जन्म नक्षत्र कहा जाता है अब स्वाभाविक प्रश्न है कि आखिर चन्द्र नक्षत्र का ही प्रभाव सर्वाधिक क्यों पड़ता है ? इसकी सीधी सी वजह यह है कि सब आकाशीय पिंडो में चन्द्रमा हमारे सबसे नजदीक है अत: इसी का सर्वाधिक प्रभाव हमारे मन मस्तिष्क व स्वास्थ्य पर पड़ता है । नक्षत्रानुसार राशि व सौर-मण्डल के ग्रहों की स्थित राशि का मनुष्य के स्वाभाव चरित्र व स्वास्थ्य पर पड़ता हैं |

इस प्रकार नक्षत्रानुसार राशि व सौर मंडल ग्रहो की राशि का मनुष्य के स्वभाव चरित्र व स्वस्थ्य पर प्रभाव विशेष रहता ही रहता है और वह भी ग्रहों के अंश / शक्ति, स्थिति और दशा - अतर्दशा अनुसार घटता बढ़ता रहता है।

नक्षत्र और स्वास्थ्य : जन्म नक्षत्र से संबंधित स्वस्थ्य व रोगो  का विवरण नीचे प्रस्तुत हैं |

1) अश्विनी इस नक्षत्र वालों को अनिद्रा,नकसीर,चक्कर आना,मूर्छा/बेहोशी,स्नायु शूल आदि होने की संभावना रहती हैं |

2) भरनी - इन्हे सिर दर्द,नेत्र पीड़ा,ज्वार,दिमागी बुखार तथा प्रजान संबंधी रोग होते हैं |

3) कृतिका इस नक्षत्र के जातकों को कंठरोग (टांसिल डिपथीरिया आदि) अनिद्रा, सिर दर्द और पैतृक रोगों की संभावना रहती हैं ।

4) रोहिणी - इन्हे त्रिदोष संबंधी रोग,जोडो का दर्द, महिलाओं में मासिक धर्म सम्बन्धी रोग होते हैं। 

5) मृगशिरा   - कंठरोग, चर्मरोग, बुखार कधे-बाजू दर्द व गुप्त रोगों की संभावना रहती है।

6) आर्द्रा - कान पीड़ा, सर्व गात्र पीड़ा, ज्वर,अनिद्रा व त्रिदोष रोग की संभावना रहती है।

7) पुनर्वसु - ब्रोंकाइटिस,न्यूमोनिया,टांसिल्स/अपच की शिकायतें हो सकती है ।

8) पुष्य - पेट - अल्सर,श्वास-विकार,पीलिया जैसे रोग बहुतायत से हो सकते हैं।

9) अश्लेषा -  गैस विकार, अजीर्ण,पैरों के कष्ट,जोड़ों के दर्द, ज्वर आदि हो सकते हैं

10)  मघा - हृदय रोग और रीढ़ की हड्डी के रोग होते है ।

11) पूर्वाफाल्गुनी - हृदय रोग, उच्च रक्तचाप,अल्सर,बुखार होने की सम्भावना होती है ।

12) उत्तराफाल्गुनी - जातकों को आंत-सम्बन्धी विकार,डिसेन्ट्री, अपेंडिसाइटिस,सिर पीडा,हृदय रोग की संभावना रहती है

13) हस्त - कब्ज, अजीर्ण, पेट गैस अफारा,उदरशूल होते है ।

14)  चित्रा - मूत्र रोग,रक्तचाप,आंत,अल्स,हर्निया बहुतायात से हो सकते है।

15) स्वाती - मूत्र मार्ग पथरी का रोग,ल्यूकोडर्मा,ज्वर,हृदय पीडा प्रायः होती रहती है।

16) विशाखा - गुदामार्ग, हदय पीडा मधुमेह गर्भाशय/जनेन्दिय रोग की सम्भावना रहती होते है।

17) अनुराधा - कब्ज,बवासीर,विकार,जनेन्द्रिय रोग,मासिक धर्म विकार व गुर्दा रोग होते हैं |

18) ज्येष्ठा - पित्तरोग, मस्तिक विकार,घाव,फोडे,नासूर,भगन्दर,फिस्टुला गर्भाशय का विकार होते है ।

19) मूल इन नक्षत्र वालों को सन्निपात,स्नायु दुर्बलता,जांघ विकार आदि पाये जाते है।

20) पूर्वाषाढ़ा सायटिका,कटिपीडा,ठिया,कफ विकार,कम्पन रोग, सिर की पीड़ा होने की सम्भावना रहती हैं |

21) उत्तराषाढा - जननांग विकार,लकवा,जोड़ों का दर्द,एग्जीमा जैसा चर्म रोग,धमनी विकार की संभावना रहती हैं |

22) श्रवण - सफेद दाग, अतिसार,प्लुरिसी,उदर विकार,टीबी रोग हो सकते है।

23) धनिष्ठा - रक्त विकार/साव, अतिसार कम्पन रोग, बैंक बोन्स घुटने व हृदय दुर्बलता की सम्भावना रहती है।

24) शतभिषा - हृदय रोग, गठिया, उच्च रक्ताचाप,लकवा,पैर विकार वायु रोग सम्भावित होते हैं |

25) पूर्वाभादपद - जातकों को त्रिदोष विकार,सिरदर्द, गुर्दे के रोग,यकृत विकार हर्निया,वमन, मासिक धर्म विकार,गुर्दा रोग,चिन्ता व्याकुलता देखी जाती है।

26) उत्तराभादपद - पीलिया, अतिसार ज्वर, वायुशूल गठिया एनीमिया,मिर्गी जैस एरोग हो सकते हैं |

27) रेवती - त्रिदोष विकार उरुशूल, कान विकार,गठिया,यकृत विकार तलुविकार प्रायः होते रहते हैं |

 ज्योतिष शास्त्र में सत्ताईस नक्षत्रों नवग्रहों और द्वादश राशियों के द्वारा रोग के सम्बन्ध में जानकारी प्राप्त की जा सकती हैं कालपुरुष के विभिन्न अंगों को नियंत्रित और निश्चित करने वाली राशियों ग्रहों से शरीर के किसी न किसी अंग पर रोग का जो प्रभाव पड़ता है उसे एक ज्योतिषी व चिकित्साविद ग्रह दान,जप औषधी के द्वारा इत्यादि ठीक कर सकता है क्योकि ज्योतिष विज्ञान का और चिकित्सा शास्त्र का सम्बन्ध प्राचीन काल से रहा है।

 

 

बुधवार, 2 फ़रवरी 2022

पंचांग मे करण

करण  

एक तिथि के आधे भाग को “करण” कहते हैं (एक तिथि मे दो करण होते हैं) इसे चन्द्र के भोगांश से सूर्य के भोगांश को घटाकर शेषफल को 6 अंशो से भाग देकर जाना जाता हैं |

करण = (चन्द्र भोगांश - सूर्य भोगांश) / 6अंश

करण मुख्यत: 11 होते हैं जिनमे 7 चर करण (बव,बालव,कौलव,तैतिल,गर,वनिज व विष्टि) तथा 4 स्थिर (शकुनि,चतुष्पाद,नाग व किन्तुघ्न) करण होते हैं | यह 7 चर करण एक महीने मे 8 बार आते हैं जबकि स्थिर करण 4 बार आते हैं जिनसे कुल 60 (7*8+4=60) करण हो जाते हैं |

करणो का क्रम - 1)बव, 2) बालव, 3) कौलव, 4) तैतिल, 5) गर, 6) वनिज, 7) विष्टि

8) शकुनि (कृष्णपक्ष की चतुर्दशी का दूसरा भाग),9) चतुष्पाद (अमावस्या का पहला भाग),10) नाग (अमावस्या का दूसरा भाग),11) किन्तुघ्न (शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा का पहला भाग)

किन्तुघ्न से गणना आरंभ करने पर 7 (चर करण) 8 बार पुनरावरत होते हैं अर्थात दोबारा आते हैं (शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से कृष्णपक्ष की चतुर्दशी तक) अंत मे तीन स्थिर करण (कृष्ण पक्ष चतुर्दशी के दूसरे भाग से शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा के पहले भाग तक) आते हैं |

आइए इसे एक उदाहरण से समझते हैं |

23-3-2010 को सूर्य भोगांश 11राशि 8अंश 14मिनट हैं तथा चन्द्र भोगांश 2राशि 2अंश 26मिनट हैं तो करण बताए ?

= (2राशि 2अंश 26मिनट) - (11राशि 8अंश 14मिनट)/12अंश

= (14राशि 2अंश 26मिनट) - (11राशि 8अंश 14मिनट)/12अंश

= 2राशि 24अंश 12मिनट /12अंश

= 84अंश 12मिनट /12 अंश  

= 7.01(अष्टमी तिथि )

करण = 84अंश 12मिनट /6अंश        

=14.02 (पंद्रहवा करण) जो की किन्तुघ्न शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से गिनने पर “विष्टि” करण हुआ |

यदि भोगांश अंतर 0 से 180 के बीच आए तो तिथि शुक्लपक्ष की तथा 180 से 360 के बीच आए तो तिथि कृष्ण पक्ष की होगी इसी प्रकार यदि तिथि 0.50 से पहले की हो तो दिन का पहला करण व तिथि 0.50 से अधिक की हो तो दिन का दूसरा करण होगा |

इस प्रकार हम पंचांग के पांचों तत्वो को गणितीय दृस्टी से निकाल कर मुहूर्त स्वयं प्राप्त कर सकते हैं |  

     

पंचांग मे योग

योग  

कुल योगो की संख्या 27 हैं जो सूर्य और चन्द्र के भोगांश से जुड़कर समन्वय बनाते हैं | 

योग ज्ञात करने के लिए सूर्य व चन्द्र के भोगांशों को जोड़कर 13अंश 20मिनट अर्थात 800 मिनट से भाग देते हैं,जो भागफल आता हैं उसमे एक जोड़ देते हैं |

यदि सूर्य का भोगांश 4राशि 23अंश 34मिनट हैं और चन्द्र का भोगांश 5राशि 16अंश 12मिनट हैं तो योग = (4राशि 23अंश 34मिनट +5राशि 16अंश 12मिनट) =10 राशि 9अंश 46 मिनट हुआ,इसे 13 अंश 20मिनट अर्थात 800 मिनट से भाग देने पर हमें 23॰2325 प्राप्त होता हैं |

{(10*30) + 9=309अंश 46मिनट/13अंश 20मिनट=(309*60)+46/800=18586/800=23.2325 }

इस 23 मे एक जोड़ने पर 24 हुआ जो की 24वा योग अर्थात “शुक्ल” योग हुआ |

योगो के नाम निम्न हैं |

1) विषकुंभ 10) गण्ड 19) परिधि

2) प्रीति 11) वृद्धि 20) शिव

3) आयुष्मान 12) ध्रुव 21) सिद्धा

4) सौभाग्य 13) व्याघात 22) साध्य

5) शोभन 14) हर्षना 23) शुभ

6) अतिगण्ड 15) वज्र 24) शुक्ल

7) सुकर्मा 16) सिद्धि 25) ब्रह्म

8) घृती 17) व्यतिपात 26) इंद्र

9) शूल 18) वरियान 27) वैधृति

आइए अब एक उदाहरण देखते हैं |

सूर्य भोगांश 11राशि 8अंश 14मिनट हैं तथा चन्द्र भोगांश 2राशि 2अंश 26मिनट हैं योग बताए ?

(सूर्य भोगांश व चन्द्र भोगांश) जोड़ने पर = {11राशि 8अंश 14मिनट+ 2राशि 2अंश 26मिनट}/13अंश 20मिनट = (13राशि 10अंश 40मिनट)/13राशि 20मिनट

=1राशि 10अंश 40मिनट/13अंश 20मिनट (12 राशियो से ज़्यादा होने पर 12 राशिया घटाए)

=(1*30)+10=40 अंश 40 मिनट =(40*60)+40/800=2440/800=3.05

=3+1=4 अर्थात चौथा योग जो की “सौभाग्य” नामक योग हुआ |

 

पंचांग मे नक्षत्र

 नक्षत्र - 

वैदिक ज्योतिष मे नक्षत्र का विशेष स्थान हैं प्रत्येक नक्षत्र का भोगांश 360/27=13 अंश 20 मिनट होता हैं कोई भी ग्रह किस नक्षत्र मे हैं इसका पता लगाने के लिए ग्रह के भोगांशों को 13 अंश 20 मिनट से भाग देकर भागफल मे एक जोड़ देना चाहिए जिससे ग्रह का नक्षत्र ज्ञात हो जाता हैं | हमारे यहाँ (भारत मे) चंद्रमा के नक्षत्र को जन्म नक्षत्र कहा गया हैं अत; इसी जन्म नक्षत्र से शेष भोग्य दशा की गणना होती हैं |

यदि चन्द्र का भोगांश 236 अंश 43 मिनट हैं (चन्द्र राशि को 30 से गुना किया गया हैं) तो नक्षत्र होगा |

(236*60)+43/(13*60)+20=14203/800=17.75375 अर्थात 18वा नक्षत्र जो की ज्येष्ठा नक्षत्र हैं जिसका चौथा चरण चल रहा हैं (नक्षत्र के चार चरण होते हैं) यदि दशमलव 0 से 25 हो तो पहला चरण 25 से 50 हो तो दूसरा चरण 50 से 75 हो तो तीसरा चरण और 75 से ऊपर हो तो चौथा या अंतिम चरण होता हैं |

नक्षत्रो के नाम व स्वामी इस प्रकार से हैं |

1)अश्वनी 10) मघा,19) मूल स्वामी {केतू}   |

2)भरणी 11) पूर्वाफाल्गुनी 20) पूर्वाषाढ़ा स्वामी {शुक्र} |

3)कृतिका 12) उत्तराफाल्गुनी 21) उत्तराषाढ़ा स्वामी {सूर्य} |

4)रोहिणी 13) हस्त 23) श्रवण स्वामी {चन्द्र} |

5)मृगशिरा 14) चित्रा 23) धनिष्ठा स्वामी {मंगल} |

6)आद्रा 15) स्वाति 24) शतभिषा स्वामी {राहू} |

7)पुनर्वसु 16) विशाखा 25) पूर्वा भाद्रपद स्वामी {गुरु} |

8)पुष्य 17) अनुराधा 26) उत्तरा भाद्रपद स्वामी {शनि} |

9)आश्लेषा 18) ज्येष्ठा 27) रेवती स्वामी {बुध} |

आइए अब एक उदाहरण देखते हैं |

चन्द्र का भोगांश 2राशि 2अंश तथा 26 मिनट हैं नक्षत्र बताए ?     

चन्द्र दो राशि चल चुका हैं इसलिए (2*30)+2=62 अंश 26 मिनट = (62*60)+26/800 =3746/800 =4.68 अर्थात 5 वा नक्षत्र जो की “मृगशिरा” हैं चूंकि दशमलव 50 से 75 के बीच हैं इसलिए नक्षत्र का तीसरा चरण चल रहा हैं |