गुरुवार, 12 अक्टूबर 2017

विवाह कब कहाँ



हिन्दू समाज मे विवाह को संस्कार के रूप मे देखा जाता हैं प्राचीन ग्रंथो मे विवाह से संबन्धित कुछ विशेष जानकारिया दी गयी हैं जैसे विवाह कब,कैसे व किस दिशा मे होगा प्रस्तुत लेख मे हम ऐसी ही कुछ जानकारी सूत्र के रूप मे देने का प्रयास कर रहे हैं |

विवाह की दिशा

1)सप्तम भाव मे स्थित अथवा सप्तम भाव पर दृस्टी डाल रहे ग्रह की दिशा मे |

2)सप्तमेश व शुक्र को जोड़कर जो राशि आए उस राशि के स्वामी की दिशा मे |

3)सप्तमेश अथवा शुक्र से सप्तमेश राशि स्वामी की दिशा मे |

4)सप्तमेश की दिग्बली दिशा मे |

5)सप्तमेश जिस भाव मे हो उस दिशा मे अथवा सप्तमेश जिस भाव मे हो उसके स्वामी की दिशा मे |

6)शुक्र सप्तमेश व सप्तम भाव मे स्थित ग्रह के योग के बराबर राशि दिशा मे |


विवाह स्थान की दूरी

1) सूर्य,चन्द्र,शुक्र व सप्तमेश कुंडली मे लग्न से सप्तम भाव तक हो तो विवाह ज्यादा दुर से नहीं होता |

2)यदि ये सब ग्रह लग्न से चतुर्थ भाव तक हो तो विवाह उसी शहर या गाँव मे होता हैं | लग्नेश लग्न मे सप्तमेश दूसरे भाव मे होतो भी विवाह उसी शहर मे होता हैं |

3)यदि ये सब ग्रह 5,8,9,भावो मे होतो विवाह 32 किलोमीटर के दायरे मे होता हैं |

4)यदि ये सभी ग्रह प्रथम या सप्तम भाव मे हो तो नजदीकी जिले मे जबकि अष्टम,दशम भाव मे 
होतो तीसरे अथवा चौथे जिले मे होता हैं |

5)सप्तमेश व कारक शुक्र 11,12 भावो मे होतो विवाह बहुत दूर अथवा विदेश मे होता हैं |

6)चन्द्र गुरु 3,4 भाव मे होतो उसी स्थान मे जबकि चन्द्र गुरु 11वे भाव मे होतो मित्र की सहायता से विवाह होता हैं |

7)सप्तम भाव मे चर राशि दूर विवाह,स्थिर राशि 100 किलोमीटर तक दूर,द्विस्वभाव राशि 100 किलोमीटर से कम दूरी |

8)नवांश चर राशि 50-60 किलोमीटर,स्थिर राशि 0-30 किलोमीटर तथा द्विस्वभाव राशि 30-60 किलोमीटर |


विवाह वर्ष व मास

1)जिस वर्ष गुरु गोचर मे लग्न,चन्द्र लग्न अथवा सप्तम भाव से गुजरे या उन्हे दृस्टी दे |  

2)जिस वर्ष गुरु जन्मकालीन शुक्र से 1,5,7,9भाव से गुजरे |

3)द्वितीयेश व अष्टमेश के राशि अंक जोड़कर प्राप्त राशि से जिस वर्ष गुरु का गोर हो |

4)वर्षफल मे जिस वर्ष चन्द्र सप्तमेश के नक्षत्र मे हो |

5)चन्द्र राशि व सप्तमेश के जोड़ की राशि से गुरु का गोचर जिस वर्ष हो |

6)गोचर मे लग्नेश व सप्तमेश की युति अथवा संबंध जिस माह बने |

7)नवांश के गुरु के साथ जब सूर्य आए उस माह |

8)नवांश मे गुरु- शुक्र की स्थिति/त्रिकोण से सूर्य भ्रमण परंतु इस सूर्य पर गुरु की दृस्टी होनी चाहिए 


आइए एक उदाहरण देखते हैं |

8/2/1971 3:20 देहरादून वृश्चिक लग्न मे जन्मे इस जातक की पत्रिका मे शुक्र सप्तमेश दूसरे भाव मे हैं जिसकी दिग्बली दिशा उत्तर हैं सप्तम भाव मे मंगल व गुरु की लग्न से दृस्टी हैं वही शुक्र से सप्तम मिथुन राशि हैं जिसका स्वामी बुध हैं | इस प्रकार विवाह की नियत दिशाए उत्तर,उत्तर पूर्व तथा दक्षिण निश्चित होती हैं | विवाह उत्तर पूर्व दिशा मे हुआ |

लग्नेश लग्न मे,सूर्य शुक्र 1 से चौथे भाव तक तथा सप्तमेश दूसरे भाव मे होने से विवाह स्थानिक अथवा लोकल हुआ | लग्न तथा नवांश स्थिर होने से भी विवाह लोकल अथवा स्थानिक हुआ | नवांश स्थिर होने से दूरी 0-30 किलोमीटर तक थी |

विवाह के दिन 22/6/2003 को गुरु लग्न को दृस्टी दे रहा हैं सूर्य चन्द्र राशि से गुजर रहा हैं जिससे विवाह का महिना व दिन पता चल रहा हैं चन्द्र रेवती बुध के नक्षत्र मे हैं जो जन्म कालीन चन्द्र राशि हैं | गोचर मे लग्नेश सप्तमेश का संबंध बना हुआ हैं |

पत्नी की पत्रिका 30/11/1977 22:30 पौड़ी गढ़वाल कर्क लग्न व कर्क राशि इस पत्रिका शनि सप्तमेश दूसरे भाव मे हैं जिसकी दिग्बली राशि पश्चिम हैं सप्तम भाव पर लग्न से मंगल व चन्द्र की दृस्टी हैं सप्तमेश शनि से सप्तम राशि सिंह हैं जिसका स्वामी सूर्य हैं | इस प्रकार हमें विवाह हेतु नियत दिशा उत्तर पूर्व,उत्तर पश्चिम,दक्षिण व पश्चिम दिशा प्राप्त हुई | विवाह पश्चिम दिशा मे ही हुआ |

सूर्य चन्द्र शुक्र सप्तमेश एक से सप्तम भाव तक हैं जो विवाह दूर नहीं होने को बताते हैं नवांश का स्थिर होना तथा सप्तमेश का दूसरे भाव मे होना भी एक वजह हैं अत: रिश्ता लोकल ही लगभग 10 किलोमीटर के दायरे मे ही हुआ |

गोचर मे गुरु राशि कर्क मे ही था जो राशि लग्न दोनों हैं | गुरु की जन्म कालीन शुक्र पर दृस्टी हैं वही लग्नेश का सप्तमेश से संबंध भी बना हुआ हैं |

मंगलवार, 10 अक्टूबर 2017

मोदिनगर ज्योतिष गोष्ठी के मुख्य बिन्दु



दिनांक 9/10/2017 को मोदीनगर मे भारतीय वेद ज्योतिष विज्ञान संस्थानमपीतांबरा विद्यापीठमे हुई ज्योतिषीय संगोष्ठी जो विवाह की दिशा,समय व दूरी पर आधारित थी उसमे विद्वानो द्वारा दिये गए कुछ बिन्दु इस प्रकार से हैं |

बुलंशहर के विद्वान ज्योतिषी श्री सुरेन्द्र शर्मा जी ने विवाह की दिशा पर उदाहरण सहित बेहतरीन शोध प्रस्तुत किया जिसमे उन्होने अपने अनुभवो के आधार पर यह भी बताया की शुक्ल पक्ष मे किए गए विवाह ज़्यादा सफल व मंगलवार को किए गए विवाह ज़्यादा असफल पाये गए हैं | वही उनका यह भी मानना था की विवाह के समय मुख्य रूप से फेरो के समय का लग्न बहुत अहम भूमिका निभाता हैं |

हमने अपने शोध मे यह बताने का प्रयास किया की नंदी नाड़ी के अनुसार विवाह वर्ष की जो गणना बताई गयी हैं वह सही नहीं हैं जबकि वर्षफल मे चन्द्र का जन्मकालीन सप्तमेश के नक्षत्र मे होना विवाह का वर्ष सटीकता से बताता हैं वही केतू का गोचरीय सिद्धान्त भी विवाह का वर्ष सही बताता हैं लग्नेश व सप्तमेश का गोचरीय संबंध विवाह का माह तथा सूर्य का गोचर विवाह का दिन निर्धारित करता हैं | विवाह की दूरी के विषय मे कुछ अनुभव भी रखे जिनमे प्रमुख सप्तमेश का लग्न मे होना उसी स्थान मे विवाह होने के पुष्टि करता हैं तथा एकादश भाव मे चन्द्र गुरु का होना मित्र की सहायता से विवाह होने की पुष्टि करता हैं मुख्य रहे |

मोदीनगर के विद्वान ज्योतिषी मित्र श्री अखिलेश कौशिक जी ने के पी पद्दती द्वारा विवाह के दिन तीन ग्रहो का विवाह कारक भावो से संबंध होना कई कुंडलियों के उदाहरण सहित बताया जो बहुत ही सटीक व शोध से भरा हुआ था उन्होने विवाह की तिथि का निर्धारण करने का सूत्र भी बताया जिसमे उन्होने भविष्य मे होने वाली एक शादी की गणना करी हैं की विवाह उस निर्धारित तिथि को होगा |

पर्यवक्षक के रूप मे मोदीनगर के विद्वान ज्योतिषी श्री विनायक पुलह जी ने इस विषय पर ज़्यादा शोध करने पर ज़ोर दिया की विवाह का वर्ष निर्धारण के अतिरिक्त यदि विवाह की निश्चित तिथि बताई जा सके तो इस विद्या की उपयोगिता और भी बढ़ सकती हैं वही पीतांबरा विद्यापीठ के संस्थापक श्री चन्द्रशेखर शास्त्री जी ने घर बिगाड़ रहे हैं ज्योतिष सॉफ्टवेयर पर अपने अमूल्य विचार रखे |



योगकारक नहीं हैं शनि


शनि को वृष व तुला लग्नों मे योगकारक माना जाता हैं जिससे इन लग्नों मे जन्मे जातक स्वयं को भाग्यशाली समझते हैं की ब्रह्मांड का सबसे अशुभ गृह उनके लिए शुभता प्रदान करता हैं परंतु क्या वास्तव मे ऐसा हैं हमने यह जानने का प्रयास अपने इस लेख मे किया हैं |

वृष लग्न मे शनि नवम व दशम भाव का तथा तुला लग्न मे चतुर्थ व पंचम भाव का स्वामी बनता हैं जिससे शनि इन दोनों लग्नों मे योगकारक तो बन जाता हैं परंतु उसकी कुछ अन्य शर्ते भी होती हैं शनि इनके अतिरिक्त 3,6,10,11 लग्न वालो के लिए भी शुभता देता हैं इसलिए यह कहाँ जा सकता हैं की इन 6 लग्नों के लिए शनि शुभ होता हैं |

अनेकों कुंडलियों का अध्ययन करने के बाद यह ज्ञात होता हैं की शनि नैसर्गिक पाप गृह होने से लग्न की प्रकृति के अनुसार फल प्रदान करता हैं यदि शनि शुभराशि मे हो,शुभ ग्रहो के नक्षत्रो मे हो अथवा शुभ गृह के प्रभाव मे होतो लग्नानुसार शुभ प्रभाव अवश्य देता हैं परंतु शनि जिस गृह के प्रभाव मे होता हैं उसे अवश्य ही अशुभता प्रदान कर देता हैं इसलिए शनि के प्रभाव को समझने के लिए शनि का अन्य ग्रहो से संबंध अवश्य देखना व जाँचना चाहिए यह संबंध शनि की स्थितिनुसार देखना चाहिए उसकी शक्ति के अनुसार नहीं शनि का चन्द्र को छोड़ सभी शुभ ग्रहो संग रिश्ता ध्यान देने योग्य हैं विशेषकर शनि गुरु की दृस्टी,शनि शुक्र संबंध तथा शनि बुध शुक्र का संबंध इनमे से शनि शुक्र का संबंध उपरोक्त 6 लग्नों मे जातक को अच्छी ऊंचाई प्रदान करता हैं साधारणत: शुक्र का किसी भी पाप गृह संग संबंध अशुभ माना जाता हैं परंतु शनि केसाथ उसका संबंध स्वयं के अतिरिक्त शनि के कारकत्वों को भी बढ़ा देता हैं इसी प्रकार शनि स्वयं को बुध के द्वारा अथवा किसी अन्य गृह जो शुक्र बुध से संबंध रखता हो दर्शाता हैं जब शनि पर गुरु का प्रभाव होता हैं तो शनि शुभता देने लगता हैं जबकि अकेला शनि अशुभता ही देता हैं परंतु उसको स्वयं को शुभ दर्शाने के लिए माध्यम के रूप मे किसी ना किसी शुभ गृह की आवशयकता पड़ती ही हैं |

आइए अब कुछ कुंडलियों के आधार पर अपने अध्ययन की पुष्टि करते हैं |

1)8/11/1912 19:30 आगरा वृष लग्न की इस पत्रिका मे शनि शुक्र के लग्न से लग्नेश शुक्र को दृस्टी दे रहा हैं जिससे शनि मे शुक्र का प्रभाव आ गया हैं | यह जातक राजकीय परिवार से संबन्धित था तथा 19वे वर्ष इसे राजा बनाया गया शनि पर सभी शुभ ग्रहो का प्रभाव हैं | इसी प्रकार रामकृष्ण डालमिया की पत्रिका मे शनि पर शुक्र बुध की दृस्टी हैं | दलाई लामा की पत्रिका मे शनि पर गुरु की दृस्टी हैं तथा बिल गेट्स की पत्रिका मे शनि शुक्र संग शुक्र की तुला राशि मे हैं |

2)18/9/1924 5:00 दिल्ली कन्या लग्न की इस पत्रिका मे शनि ऊंच का होकर शुक्र पर दृस्टी डाल रहा हैं जातक राज्य सरकार के तकनीकी विभाग मे डिप्टी डाइरेक्टर के पद पर हैं इसी प्रकार डॉ॰ राधाकृष्णन की पत्रिका मे शनि पर गुरु की दृस्टी तथा शनि की शुक्र बुध पर दृस्टी हैं |

3)पाकिस्तान के संस्थापक जिन्नाह की कुम्भ लग्न की पत्रिका मे शनि लग्नेश होकर गुरु द्वारा दृस्त हैं तथा गुरु के घर मे भी हैं जिससे शनि के बहुत शुभ फल मिले हैं | इसी प्रकार मधुबाला की पत्रिका मे शनि शुक्र संग(मकर)मे हैं यहाँ शुक्र ने शनि का फल दिया हैं |

4)रामकृष्ण जी की मकर लग्न की पत्रिका मे शनि व बुध मे राशि परिवर्तन हैं बुध शनि लग्नेश का प्रभाव दे रहा हैं साथ मे शुक्र करमेश होकर लग्न मे स्थित हैं इस प्रकार शनि बुध शुक्र का संबंध हैं | इसी प्रकार महारा णा प्रताप की कुंडली मे शनि शुक्र करमेश संग दूसरे भाव मे लग्नेश होकर स्थित हैं |

5)आइंस्टीन की मिथुन लग्न की पत्रिका मे शनि शुक्र बुध संग गुरु के घर मे हैं तथा शनि गुरु मे राशि परिवर्तन भी हैं यहाँ शनि ने लग्नेश व अस्तमेश के फल ज़्यादा दिये हैं |

6) श्री चन्द्रशेखर भारती (शृंगेरी मठ के मठाधीस )की तुला लग्न की पत्रिका मे शनि पर गुरु की दृस्टी हैं शनि  बुध की राशि मे हैं बुध लग्न मे हैं जिससे शनि के फल बुध प्रदान कर रहा हैं जातक ने धर्म व अध्यात्म के क्षेत्र मे बहुत नाम कमाया हैं इसी प्रकार माधुरी दीक्षित की पत्रिका मे भी शनि ऊंच के शुक्र संग हैं यहाँ शनि ने सारे फल शुक्र के प्रदान कर उन्हे एक कामयाब अभिनेत्री बनाया हैं |


निम्न उदाहरण हमारे पक्ष मे विस्तार देते हैं की शनि चाहे कोई भी लग्न हो शुभप्रभाव के बिना अशुभता ही देते हैं हमारे अनुभव मे ये भी आया की तुला लग्न के जातक के पिता की शनि दशा मे मृत्यु हुयी जिससे वह एकाएक सड़क पर आ गया जबकि शनि मकर राशि मे था |

शुक्रवार, 6 अक्टूबर 2017

शनि का दीर्घ प्रभाव


शनि ग्रह को हिन्दू व पाश्चात्य ज्योतिष मे सबसे अशुभ ग्रह कहा व माना गया हैं पृथ्वी से सबसे दूर स्थित शनि ग्रह अपनी मंद गति के कारण किसी को भी अपना दीर्घकालीन अनिष्ठ प्रभाव देने मे सक्षम माना जाता हैं | फलित के सिद्धांतो के अनुरूप ही शनि के फल भी विभिन्न लग्नों हेतु अलग अलग बताए गए हैं शनि को वृषभ,मिथुन,कन्या,तुला,मकर व कुम्भ लग्नों अथवा राशियो के लिए शुभ फल प्रदान कर्ता माना गया हैं |

उपचय भाव 3,6,10 व 11 मे जहां सभी पाप ग्रहो को शुभ माना जाता हैं शनि को योगकारक होने पर बहुत शुभ कहा जाता हैं इसी प्रकार मकर लग्न मे प्रथम भाव मे,तुला लग्न मे चतुर्थ भाव मे तथा कर्क व सिंह लग्नों मे सप्तम भाव का शनि शुभ माना जाता हैं ( यहाँ इन भावो मे शनि पंचमहापुरुष योग “शश” बनाता हैं )

शनि अपनी दशा अंतर्दशा के अतिरिक्त साढ़ेसाती मे भी अपना शुभाशुभ प्रभाव देते हैं क्यूंकी ऐसा कोई भी अन्य ग्रह नहीं करता संभवत: इसी कारण इनका भय सबसे ज़्यादा रहता हैं | शनि पर अन्य ग्रहो का प्रभाव भी उसकी अनिष्टता मे कमी लाता हैं विशेषकर गुरु व शुक्र के प्रभाव मे शनि शुभफल ज़्यादा देते देखे गए हैं |

शनि को रुकावट व बाधाओ का कारक माना जाता हैं ऐसा इनकी दृस्टी के कारण होता हैं यह कुंडली मे जिस भाव को देख रहे होते हैं उस भाव के कारकत्वों मे हानी अवश्य करते हैं,गोचर मे भी इनकी दृस्टी जिस भाव पर पड रही होती हैं उसकी हानी ज़रूर होती हैं | इनकी दृस्टी का सबसे ज़्यादा प्रभाव क्रमश: स्वयं से दशम,सप्तम व तृतीय भाव पर होता हैं |

जो ग्रह शनि के द्वारा देखा जा रहा होता हैं उसके कारकत्वों मे भी कमी अवश्य होती हैं शनि यदि सूर्य को देखे तो संघर्षमयी जीवन,पिता से तनाव व वैचारिक मतभेद,चन्द्र को देखे तो जीवन के आनंद,खुशी मे कमी व माता को कष्ट तथा आर्थिक तंगी,मंगल को देखे तो क्रूर,अविश्वासी तथा जोखिम लेने का शौकीन,बुध को देखे तो जड़त्व बुद्दि वाला,गुरु को देखे तो नैतिकता मे समझौते,कानून जानने वाला, शुक्र को देखे तो विवाह सुख मे कमी या देरी,जैसे फल जातक को मिलते हैं |

शनि के फलकथन मे 2 बातें हमेशा ध्यान मे रखनी चाहिए साढ़ेसाती व राहू दशा मे शनि की स्थिति,साढ़ेसाती के समय शनि चन्द्र राशि के अलावा चन्द्र राशि के आगे पीछे के 2 भाव भी प्रभाव मे ले लेते हैं इस समय यदि सूर्य,चन्द्र,मंगल की दशा अंतर्दशा भी चल रही हो तो जातक विशेष को बहुत कष्ट मिलते हैं ऐसे मे शनि एक साथ कई भावो पर असर डालकर जातक विशेष को बुरी तरह प्रभाव मे ले लेते हैं यदि प्रथम साढ़ेसाती होतो प्रभाव और भी भयानक मिलते हैं | उपरोक्त 6 लग्नों मे साढ़ेसाती के अतिरिक्त यदि दशा भी शुभ होतो जातक को बहुत शुभता भी प्राप्त होती हैं |


अपनी दशा के अलावा शनि का विशेष प्रभाव राहू दशा मे भी देखने को मिलता हैं इसका अनुपम उदाहरण हिटलर की पत्रिका मे देखने मे आता हैं जिसकी तुला लग्न की पत्रिका मे शनि दशम भाव मे कर्क राशि पर हैं हिटलर पर राहू दशा 1928 से 1946 तक रही जो की हिटलर के जीवन की सर्वश्रेष्ठ दशा रही इस दौरान हिटलर ने सबसे ज़्यादा ऊंचाई पायी शनि मंगल के संबंध से जातक ने क्रूरता की नई मिसाल कायम कर विश्व भर मे अपना डंका बजवाया परंतु शनि के राहू से दूसरे (मारक) भाव मे होने से हिटलर का अचानक अंत भी हुआ ( शनि आयुकारक माना जाता हैं ) राहु  की दशा हिटलर के जीवन को पूर्णता प्रदान नहीं करती यहाँ शनि उसके जीवन को पूर्ण करता हैं |     

गुरुवार, 5 अक्टूबर 2017

काल सर्प एक महान योग


कुंडली मे पाये जाने वाले अशुभ योगो मे से एक कालसर्प योग होता हैं जो जातक विशेष के जीवन मे अवश्य ही अपना प्रभाव रखता हैं बहुत से जातक जिनकी पत्रिका मे यह योग था वह बेहद प्रसिद्द,सफल व कामयाब रहे हैं वही कुछ असफल भी रहे हैं हमारे प्राचीन ज्योतिष शास्त्र इस योग के विषय मे कुछ नहीं बताते हैं प्राचीन विद्वान भट्टोपाल,ढुंढिराज आदि इसके विषय मे कुछ नहीं लिखते हैं व नाही किसी प्रकार से इसका ज़िक्र करते हैं परंतु आधुनिक काल के ज्योतिषी इस पर अपना भिन्न भिन्न मत रखते हैं जिससे समाधान कम भ्रम ज़्यादा फैलता हैं | राहू केतू के मध्य जब सभी गृह आ जाते हैं तब इस योग का निर्माण होता हैं कुछ ज्योतिषी इसे राहू केतू के वक्री होने के कारण ग्रहो के राहू से केतू के मध्य आने पर मानते हैं केतू से राहू के मध्य आने पर नहीं वही कुछ इसे दोनों अवस्था मे मानते हैं जिससे भ्रम और भी ज़्यादा फैलता हैं |

इस योग के विभिन्न भावो मे बनने का भी महत्व देखा व माना गया हैं जैसे केंद्र मे,2 व 8 भावो मे,3 व 9,5 व 11 तथा 6 व 12 भावो मे यह भी पाया गया हैं केंद्र मे इसके बनने पर शुभ प्रभाव ज़्यादा प्राप्त हुये जबकी जब यह योग 2,8व 8,2 तथा 6,12,व 12,6 के मध्य बना तब इसने ज़्यादा अशुभ प्रभाव जैसे जेलयात्रा,बंधन,किसी भी प्रकार की शुभता ना देना आदि दर्शाये | नेहरुजी की पत्रिका मे यह योग 12 से 6 के मध्य हैं सभी जानते की नेहरु जी ने कई बार जेल यात्रा करी परंतु बाद मे वह देश के प्रधानमंत्री बन देश विदेश मे प्रसिद्द हुये मुसोलिनी की पत्रिका मे भी इसी योग ने उसे साधारण से इटली का महान तानाशाह बनाया इसी प्रकार का योह जाने माने वकीलो,डॉक्टरो की पत्रिकाओ मे भी मिलता हैं |

इस योग के बारे मे कितनिम शुभता व अशुभता रहेगी यह एक शोध का विषय हो सकता हैं बड़े व सफल लोगों की पत्रिका मे यह उन्हे सफल व कामयाब होने से नहीं रोक पाया हैं फलित ज्योतिष का आधार कुंडली को विस्तार से समझने का होता हैं एक नजर मे फलित करना मुश्किल ही नहीं ग़लत भी होता हैं इस योग से प्रभावित व्यक्ति अपने जीवन मे कैसे रहेंगे यह एक बहस का विषय हो सकता हैं | साधारणत; इस योग का प्रभाव जीवन पर्यंत माना जाता हैं जबकि अनुभव मे देखा गया हैं की राहू केतू की दशा मे इस योग ने अपने ज़्यादा प्रभाव दिखाये हैं यह भी देखा गया की राहू केतू दशा मे जब कोई गृह इनके सिर अथवा पुंछ से गुजरा अर्थात इनके संपर्क मे आया और नक्षत्र के चा रो चरण (13'20 अंश) तक रहा तब ज़्यादा अशुभ प्रभाव मिले थे |

राहू केतू 18 वर्षो मे अपने जन्मकालीन स्थिति से गुजरते हैं तब जातक विशेष के जीवन मे कुछ ना कुछ अच्छा या बुरा प्रभाव ज़रूर पड़ता हैं राहू केतू के मध्य लगातार भावो मे ग्रहो के होने से एक अन्य "माला योग" का निर्माण होता हैं जो की जातक को बहुत ऊंचाई प्रदान कर सकता हैं | इस कालसर्प योग को जानने के लिए शास्त्रो मे दिये गए योगो की जानकारी भी होनी चाहिए | कुछ ज्योतिषी इसे आयु हेतु अशुभ मानते हैं तो कुछ इसे धन,संपत्ति हेतु अशुभ मानते हैं जबकि कुंडलियों का अध्ययन करने पर यह सभी बातें ठीक नहीं दिखती हैं | मुख्यत: यह कहाँ जा सकता हैं की कालसर्प योग जातक को दर्द,पीड़ा प्रदान कर सफलता प्रदान करता हैं |

राहू को आध्यात्मिक ज्योतिष मे मस्तिष्क का क्षेत्र दिया गया हैं (जहां हजारो पंखुड़ियों वाला कमल जिसपर शिव विराजते हैं माना जाता हैं ) तो ऐसे मे इस गृह को पूर्ण रूप से अशुभ कैसे माना जा सकता हैं और यदि इस गृह के मध्य सभी गृह होंगे तो व अशुभता कैसे दे पाएगा | यह संभव हो सकता हैं की जब जातक को अशुभ प्रभाव ही बताए जाएंगे तब व अपने हिले हुये आत्मविश्वास के कारण अपने हर कार्य मे नुकसान व हताशा ही पाएगा जिससे उसकी सफलता असफलता मे बदल जाएगी |

ईश्वर अपने कमजोर व्यक्तियों को कालसर्प देकर नष्ट होने से बचाता हैं इस योग को जानने पर यदि माता-पिता शुरुआत मे ही हर उचित उपाय कर अपने बच्चो को उचित शिक्षा आदि प्रदान कर उनके अंधकारमय भविष्य से उन्हे बचा सकते हैं यदि कोइ बुरा समय आता भी हैं तो उसे उपासना व प्रार्थना से टाला जा सकता हैं |

लग्न से सप्तम भाव के मध्य इस योग के होने से इसे विवाह हेतु अशुभ पाया गया हैं सांसारिक रूप से वैवाहिक जीवन व स्तर दोनों हानिकारक साबित होते हैं यदि इसके दूसरे रूप को देखे तो विवाह विच्छेद होने पर जातक का आध्यात्मिक विकास होने लगता हैं यहाँ ज्योतिष जातक विशेष को पूर्व मे जानकारी प्रदान कर उसे संभाल सकता हैं | यह योग जहां एक तरफ आपको दुनिया से विमुख करता हैं वही एक तरफ अध्यात्मिकता से जोड़ता भी हैं जिससे आप ईश्वर के ज़्यादा करीब हो जाते हैं |

   

मंगलवार, 3 अक्टूबर 2017

शनि की साढेसाती



शनि का जन्म कालीन चन्द्र से 12वे,पहले तथा 2रे भाव से गोचर शनि की साढेसाती कहलाता हैं शनि धीमी गति से तथा चन्द्र तीव्र गति चलने वाला ग्रह हैं इस कारण इन दोनो का संबंध ज़बरदस्त प्रभाव उत्पन्न करता हैं जिसमे अशुभता ज़्यादा होती हैं | शनि का यह भ्रमण तीन राशियो मे साढे सात वर्ष लेता हैं ( प्रत्येक राशि पर लगभग ढाई वर्ष ) परंतु जन्मकालीन चन्द्र से 15 अंश आगे व 15 अंश पीछे का भ्रमण जातक विशेष हेतु ज़्यादा प्रभाव शाली होता हैं एक अन्य मत के अनुसार शुरुआती 5 वर्ष अशुभ तथा अंतिम ढाई वर्ष शुभ माने जाते हैं |

कालपुरुष की कुंडली मे शनि 10 व 11वे भाव के स्वामी होते हैं जो चन्द्र ( चतुर्थ भाव ) से देखने पर 7वा व 8वा भाव होता हैं कहाँ जाता हैं की अपने पूर्व जन्मो के किए गए कर्मो के अनुसार ही शनि की यह साढेसाती जातक विशेष को अपने प्रभाव देती हैं | 10वा भाव पूर्वजन्म के कर्म बताता हैं तथा 11 भाव दुखस्थान होता हैं शनि इन दोनों भावो का स्वामी होने के कारण पूर्व जन्मो के कर्मो के परिणाम दिखा व दर्शा पाने मे सक्षम होता हैं |

कालपुरुष की पत्रिका मे चन्द्र चतुर्थ भाव का स्वामी हैं जो मानव जीवन मे होने वाली कई घटनाओ से संबन्धित भाव होता हैं यह माता,खुशी,शिक्षा,मकान,तरक्की,भूमि,नैतिकता,स्त्री हेतु चाह,स्वादिष्ट भोजन आदि को दर्शाता हैं जो ज़्यादातर आनंद व भोग की वस्तुए हैं | प्रत्येक कार्य के अच्छे व बुरे दोनों परिणाम होते हैं सही कार्यो हेतु शुभ व ग़लत कार्यो हेतु अशुभ परिणाम प्राप्त होते हैं जिनके प्रभाव से सभी ऐसों आराम से वंचित होना पड़ता हैं जो शनि की इस साढेसाती मे अवश्य होता देखा गया हैं |

अब प्रश्न उठता हैं यह साढेसाती किस हद तक जातक विशेष को हानी अथवा परेशानी दे सकती हैं दुख कई प्रकार के हो सकते हैं जैसे गरीबी,जेल,बिछोह,नाजायज संबंध,स्वार्थीपना इत्यादि परंतु इतना निश्चित हैं की यह साढे साती भौतिक सुखो मे कमी व हानी कर जातक विशेष को परेशानी अवश्य प्रदान करती हैं | यह साढेसाती किसी भी जातक के जीवन मे 3 बार ( आज के संदर्भ मे ) आती हैं यदि पहली सही हो तो दूसरी भयावह होती हैं जबकि पहली अशुभ होतो दूसरी शुभ होती हैं तीसरी हमेशा मृत्यु प्रदान करने वाली होती हैं,कुछ जन दूसरी साढेसाती को शुभ ही मानते हैं परंतु उदाहरण उसे भयावह ही बताते हैं |

साढेसाती पर अभी तक कोई सटीक आंकलन व पुस्तक इत्यादि नहीं लिखी गयी हैं जिस कारण इस साढेसाती का कई कुंडलियों मे अध्ययन कर फलित सूत्र,दशा इत्यादि लगाकर परिणाम देखे जाते रहे हैं यहाँ इस लेख मे हम इसके निम्न तरीके से प्रभाव देख रहे हैं |

1)भाव जो लग्न से साढेसाती प्रभाव मे हैं |

2)चन्द्र शनि की स्थिति |

3)साढेसाती समय दशा नाथ से शनि व चन्द्र की स्थिती |

आइए अब कुछ उदाहरण देखते हैं |

1)4/5/1896 23:00 धनु लग्न की यह पत्रिका पूर्व रक्षा मंत्री श्री मेनन की हैं जिसमे चन्द्र अष्टमेश होकर वाणी भाव मे हैं तथा शनि वाणीपति ऊंच का होकर एकादश भाव मे हैं चन्द्र से द्वितीयेश भी शनि ही हैं जो स्वयं से दशम मे हैं शनि जब धनु मे आए तो यह बीमार हुये जब शनि मकर मे आए तो इन्हे पद से हटा दिया गया इनकी सख्त व बेबाक वाणी के कारण इनके बहुत से दुश्मन पैदा हो गएथे जिससे इनका पत्तन हुआ |

2)17/5/1911 4:00 आगरा की इस मेष लग्न की पत्रिका मे चन्द्र नवम ( रुतबे) के भाव मे हैं शनि उससे पंचम भाव मे हैं साढेसाती से अन्य भाव 8,19 प्रभावी हैं चन्द्र से शनि तीसरे (सहोदरो) का स्वामी होकर उस भाव से तीसरे बैठा हैं जहां मंगल स्थित हैं साडेसाती समय मंगल की दशा भी थी मंगल से शनि तीसरे हैं जब शनि धनु से गुजर रहा था तब भाइयो मे अनबन शुरू हुयी जिससे बंटवारा हुआ जबकि शनि जब वृश्चिक मे था तब जातक को अपने कैरियर की वजह से बहुत परेशानी रही उसे झूठे केस मे फंसाया गया यहा यह भी ध्यान दे कि धनु का शनि कैरियर हेतु परेशानी ज़रूर देता हैं  |

3)20/7/1918 00:00 दिल्ली मेष लग्न की इस पत्रिका मे चन्द्र अष्टम भाव मे हैं चन्द्र का 8,9 भावो मे होना साढेसाती हेतु महा अशुभ होता हैं विशेषकर जब चंद्रेश भी शनि का शत्रु हो,शनि कि पहली साढेसाती मे जातक शनि महादशा के प्रभाव मे भी था उसके पिता कि मृत्यु हुई यहाँ शनि लग्न से चतुर्थ हैं तथा चन्द्र से चौथे का स्वामी हैं चन्द्र स्वयं लग्न से चौथे का स्वामी हैं यह सभी तत्व माता के लिए अनिष्ट बता रहे हैं इनके पिता कि मृत्यु शनि मे शुक्र अंतर्दशा मे हुई शुक्र नवम भाव से सप्तम तथा चन्द्र से अष्टम हैं गुरु भी ऐसा ही हैं परंतु यहाँ ध्यान रखे कि शनि अपनी दशा मे अपने फल शुक्र के माध्यम से देता हैं |

4)18/7/1919 00:30 कानपुर,मेष लग्न की इस पत्रिका मे शनि लग्न से पंचम भाव मे 10,11वे भाव का स्वामी के रूप मे हैं तथा चन्द्र शनि से द्वादसेश भी हैं जब शनि मकर मे आए इस जातक को अपने पद से हटा दिया गया और जब शनि कुम्भ मे आए तो जातक की सेवा समाप्त कर दी गयी |

5)10/7/1939 10:00 लखनऊ,सिंह लग्न की इस कुंडली का जातक अच्छे परिवार का था जो अच्छे पद पर नौकरी कर रहा था इसके लग्न से अष्टम भाव मे द्वादशेश होकर चन्द्र तथा नवम मे सप्तमेश व चन्द्र से द्वादशेश शनि स्थित हैं | साढ़ेसाती के समय 7,8 व 9 भाव प्रभावित हुये जैसे ही शनि ने सप्तम भाव कुम्भ राशि मे प्रवेश किया जातक के अन्य जाति की स्त्री से संपर्क बने जिस कारण उसकी बहुत बदनामी हुयी यहाँ शनि सप्तमेश होकर नीच राशि का तथा चन्द्र से दूसरे भाव मे हैं |

6)6/11/1954 2:00 दिल्ली,सिंह लग्न की यह पत्रिका एक सम्मानित परिवार की विधवा महिला की हैं जिसमे चन्द्र द्वादशेश होकर सप्तम भाव मे हैं वही शनि सप्तमेश होकर तीसरे भाव मे हैं शनि के मकर राशि मे आते ही जातिका को बहुत सी बीमारियाँ हुयी,बेटी के विवाह के लिए जातिका को अपनी ज़मीन बेचनी पड़ी,शनि के कुम्भ मे आते ही इस स्त्री के बाहरी पुरुष से संबंध बने जिससे इसकी बहुत बंदनामी हुयी |

अनुभव मे देखने मे आता हैं की साढ़ेसाती सप्तम भाव से लगने पर निम्न तथ्य दर्शाती हैं

1) नैतिक पत्तन

2) प्रजनन अंगो मे बीमारी,

3) जीवन साथी अथवा माता की बीमारी व मृत्यु

4) व्यापार व पद मे हानी तथा नौकरी का छूटना |

जब शनि बुध,शुक्र या स्वयं के भावो से गुजरता हैं तो कम हानी करता हैं परंतु मंगल,सूर्य,चन्द्र के लग्नों से शनि का गोचर हानी अवश्य करता हैं इसी प्रकार जन्मराशि से अथवा उससे अष्टम भाव से शनि का गोचर भी कष्टकारी साबिता होता हैं |

साढ़ेसाती से बहुत से लोग भय मान इसे श्राप समझते हैं जबकि यह मोक्षप्राप्ति मे सहायक होती हैं  साढ़ेसाती हमारी भौतिक वस्तुओ को समाप्त कर हमें अहंकारी बनाने से बचाती हैं यह हमें प्रारब्ध कर्मो से जोड़ हमारे कर्म चक्र को पूरा करती हैं जिससे हम निखरकर अपना भविष्य संवारते हैं अनुभव मे यह भी देखा गया हैं की जिन स्त्री जातको ने साढ़ेसाती का प्रथम चरण गुजार लिया था वह विवाह पश्चात अच्छी ग्रहणी साबित हुयी |


शनि के कुप्रभाव से रक्षा पाने के लिए छायापात्र का दान करने का विधान हमारे शास्त्रो मे दिया गया हैं जिसमे लोहे की कटोरी मे सरसों का तेल भरकर उसमे चेहरा देखकर डकोत को वह कटोरी दान की जाती हैं |