सोमवार, 15 दिसंबर 2014

मुक़द्दमे मे विजय हेतु टोटके




मुक़द्दमे मे विजय हेतु टोटके

आजकल की भागती हुयी ज़िंदगी मे कोई भी व्यक्ति कोर्ट कचहेरी अथवा मुक़द्दमे बाजी के चक्कर मे पड़कर अपना धन व वक़्त खराब करना नहीं चाहता परंतु ना चाहते हुये भी किसी ना किसी प्रकार से यदि जातक विशेष अथवा उसका परिवार इन चक्करों मे पड गया हो तो वह नीचे दिये गए कुछ उपायो को कर राहत प्राप्त कर सकता हैं |

1)अपने बच्चे का पहना हुआ पहला कपड़ा लेकर मुक़द्दमे मे जाने से मुक़द्दमा हारने की संभावना नहीं रहती हैं |

2)प्रात: काल बजरंग बाण के सात पाठ करके हनुमान जी को लड्डू का भोग लगाए साथ ही देसी कपूर पर पाँच अखंडित लौंग जलाकर उसकी भस्म का तिलक अपने माथे पर लगाकर जाने से मुक़द्दमा अपने पक्ष मे होने की संभावना बढ़ जाती हैं |

3)अपने वजन के बराबर कच्चा कोयला जलप्रवाह करने से निर्दोष व्यक्ति मुक़द्दमे से बरी हो जाता हैं 

4)भैरव मंदिर मे 12 किलो इमरती मिठाई का भोग लगाकर गरीबो मे बाँट देने से झूठे मुक़द्दमे से छुटकारा मिल जाता हैं |

5)झूठे आरोप के मुक़द्दमे से बचने के लिए पीली कनेर का फूल घिसकर उसका तिलक लगाकर कोर्ट परिसर मे जाने से मुक़द्दमे मे सफलता मिलती हैं |

6)कोर्ट जाने से पहले 5 अभिमंत्रित गोमती चक्र जेब मे रखने से मुक़द्दमे से राहत मिल जाती हैं |

7)कुंडली के अनुसार द्वादशेश व द्वादश भाव मे स्थित ग्रह की वस्तुए उचित मात्रा मे दान करते रहने से मुक़द्दमे संबंधी योग समाप्त हो जाते हैं |

8)दुर्गा सप्तसती के 108 पाठ करने अथवा शतचंडी पाठ करवाने से भी मुक़द्दमों व बंधनो से मुक्ति मिलती हैं |

9)माता बगलामुखी देवी का जाप,अनुष्ठान किसी योग्य ब्राह्मण के द्वारा कराने से शत्रुओ पर विजय पाकर मुक़द्दमे से राहत पायी जा सकती हैं जातक स्वयं भी बगलामुखी मंत्र के 36000 जाप कर शत्रुओ पर विजय पा सकता हैं |

10)मध्य प्रदेश दतिया मे स्थित माँ पीतांबरा देवी शक्ति पीठ पर अनुष्ठान व हवन कराने से मुक़द्दमों आदि मे राहत प्राप्त होती हैं |

11)हनुमान जी के मंदिर मे हनुमान प्रतिमा के सम्मुख प्रतिदिन एक निश्चित मात्रा मे निम्न मंत्र का सवा लाख जाप करने से निश्चय ही मुक़द्दमे मे विजय प्राप्त होती  हैं |
मंत्र-“हं हनुमते रुद्रात्मकाय हुं फट “

12)विजय प्राप्ति यंत्र के सम्मुख नियत मुहूर्त के दिन निम्न पूजन मंत्र से पूजन कर इस यंत्र को अपने संग रखने से मुक़द्दमा अपने पक्ष मे हो जाता हैं |
मंत्र-“ ॐ नीली नीली महानीली (शत्रु पक्ष/जज का नाम ) जीभि तालु सर्वखिली,सही खिलो तत्क्षणाय स्वाहा “

13)कोर्ट केस मे जाने से पूर्व अंध आश्रम मे गुलाब जामुन दान करने से कोर्ट केस की तारीख आगे बढती जाती हैं |

डॉ॰ किशोर घिल्डियाल
9818564685 

बुधवार, 10 दिसंबर 2014

व्यवसाय से संबन्धित टोटके



व्यवसाय से संबन्धित टोटके

आज के इस भौतिकतावादी युग मे हर व्यक्ति कम समय मे ज्यादा से ज़्यादा धन अर्जन करना चाहता हैं और इसके लिए हर कोई अपना व्यवसाय आरंभ करता हैं या करना चाहता हैं प्रस्तुत लेख मे हम व्यापार से जुड़े कुछ टोटके दे रहे हैं जिनसे व्यापार मे तरक्की अथवा सफलता प्राप्त होती हैं 

1)शुक्लपक्ष के रविवार को काले घोड़े की दायें पैर की नाल गंगाजल से धोकर व्यापार स्थल के द्वार पर ठोक देने से व्यापार मे तेजी आने लगती हैं |

2)शनिवार को सरसों तेल मे बने गुड के गुलगुले (मीठे पकोड़े) गरीबो को खिलाने से व्यापार बढ़ा समाप्त हो जाती हैं |

3)शुक्लपक्ष के समय किसी भी दिन व्यापार स्थल के मुख्य द्वार के दोनों और चुटकी भर आटा छिड़कने से व्यापार् स्थल पर लगी नज़र समाप्त हो जाती हैं |

4)वर्षभर हर बुधवार को फिटकरी के पानी मे भीगी साबुत मूंग दाल पक्षियो को खिलाने से व्यापार निर्बाध रूप से चलता रहता हैं |

5)केसर से रंगे हुये कच्चे सूत के धागे को व्यापारस्थल मे बांधने से व्यापार बढ्ने लगता हैं |

6)वर्ष मे एक बार कढ़ी-चावल का भंडारा करने से व्यापार मे बहुत वृद्दि होती हैं |

7)व्यापार स्थल मे कमाल गट्टे की माला पर श्रीयंत्र स्थापित करने से व्यापार का भी विस्तार होने लगता हैं |

8)व्यापार स्थल की चौखट पर 12 गोमती चक्र कपड़े मे बांधकर लटकाने से व्यापार वृद्दि होती हैं |

9)एकांक्षी नारियल को गल्ले मे रखने से ग्राहकी बढ़ जाती हैं |

10)काली हल्दी,केसर को गंगाजल मे पीसकर महीने के पहले बुधवार को मशीनों पर लगाने से मशीन खराब नहीं होती |

11) देसी कपूर और रोली को जलाकर उसकी राख़ गल्ले मे रखने से व्यापाय दिन दूनी रात चौगुनी तरक्की करता हैं |

12)व्यवसाय स्थल मे प्रतिदिन चाँदी के पात्र का जल छिड़कने से बिक्री बढ़ जाती हैं |

13)शुक्रवार को गुड व चने का प्रसाद बांटने से ग्राहक व्यवसाय स्थल से बंधे रहते हैं |

14)प्रतिदिन दुकान मे लोबान अथवा लौंग,कपूर की धुनि घुमाने से दुकान पर नज़र,टोका इत्यादि नहीं लगती और व्यापार निर्बाध चलता रहता हैं |

15)व्यापारस्थल मे बरगद की जड़ रखने से कीड़े,मकोड़े,चूहे,इत्यादि से व्यापार स्थल मे हानी नहीं होती |

16)दुकान अथवा व्यवसाय स्थल मे आए पहले ग्राहक को कभी भी खाली हाथ ना लौटाए ऐसा करने से व्यापार मे रुकावट आने लगती हैं |

17)सफ़ेद कपड़े की बनी ध्वजा पीपल के पेड़ पर लगाने से व्यापार मे वृद्दि होती हैं तथा बाधाए दूर हो जाती हैं |

18)व्यवसाय स्थल मे नागकेसर व श्रीयंत्र रखने से व्यापार मे वृद्दि होती हैं |

19)दुकान खोलते व बंद करते समय मुख्य द्वार को स्पर्श कर माथे से हाथ लगाना चाहिए इससे व्यापार मे स्थिरता आती हैं |

20)अपने व्यापारस्थल अथवा दुकान के गल्ले मे 3 गोमती चक्रो को तांबे की तार से बांधकर कील द्वारा ठोक देने से गल्ला कभी खाली नहीं होता |

इस प्रकार उपरोक्त छोटे छोटे टोटको को करने से व्यापार मे वृद्दि की जा सकती हैं |

डॉ॰ किशोर घिल्डियाल

रविवार, 30 नवंबर 2014

त्राटक

त्राटक

किसी भी बिन्दु या दीपक की लौ पर टकटकी लगाकर बिना पालक झपकाए दृस्टी शक्ति को बढ़ाने की क्रिया त्राटक कहलाती हैं इससे विचारशून्यता आती हैं |

त्राटक के भेद-त्राटक के 3 भेद हैं

1)निकट त्राटक-प्रात: 4 बजे से सूर्योदय तक का समय इसके लिए उपयुक्त होता हैं पहले आँखों को बाएँ दायें ऊपर नीचे चलाना चाहिए फिर सफ़ेद पत्थर का गोल टुकड़ा 2 फूट कि दूरी पर रखकर टकटकी लगाकर देखना चाहिए इसके बाद मोमबत्ती की लौ पर दृस्टी डालने का अभ्यास करना चाहिए फिर नाक की नोक पर दृस्टी जमानी चाहिए उसके बाद दोनों भोहो के मध्य भाग पर दृस्टी जमाने का अभ्यास कआरएनए चाहिए इस प्रकार का अभ्यास 32 मीनट का होने पर दिव्य दृस्टी प्राप्त होती हैं |

2)दूर त्राटक –निकट त्राटक के बाद साधक को दूर त्राटक करना चाहिए किसी पहाड़ की चोटी या पेड़ की फुनगी देखनी चाहिए फिर चाँद पर दृस्टी जमानि चाहिए फिर एक तारे पर और अंत मे किसी तारे पर दृस्टी जमाने का प्रयास करना चाहिए पहले पहल सूर्य के पानी पर पड रहे प्रतिबिंब पर फिर दर्पण पर पड रहे प्रतिबिंब पर उसके बाद सीधे सूर्य पर दृस्टी जमानी चाहिए |


3)अंतर त्राटक-आँखें बंद करके भोहों के मध्य देखना चाहिए आरंभ मे साधक को आँखें बंद करने पर 3,5,7 बिन्दु दिखाई देंगे जो की सफ़ेद नीले या पीले रंग के हो सकते हैं कुछ समय बाद ज्योति से दीपित नेत्र दिखाई देने लगेगा इसी प्रकार सूर्य चाँद तारे भी दिखाई देंगे इसके बाद आकाश के मध्य तीसरा नेत्रा व तीसरे नेत्र के मध्य बिन्दु दिखाई देगा फिर यह बिन्दु भी दिखाई देना बंद हो जाएगा यही पूर्ण अवस्था हैं |

मंगलवार, 25 नवंबर 2014

ऊपरी बाधा संबंधी ज्योतिष योग

ऊपरी बाधा संबंधी ज्योतिष योग

जीवन के आपाधापी भरे माहौल मे कभी कभी व्यक्ति विशेष को कुछ असामान्य सी घटनाओ का सामना करना पड़ता हैं यह घटनाए ना सिर्फ व्यक्ति विशेष के ऊपर प्रभाव डालती हैं बल्कि उसके समस्त परिवार व आसपास के व्यक्तियों पर भी इनका प्रभाव होता हैं सामान्य व्यक्ति अचानक अजीबोगरीब हरकते करने लगता हैं डॉक्टर उसका इलाज नहीं कर पाते हैं व्यक्ति दिन प्रतिदिन सूखता चला जाता हैं अंजान भय से पीड़ित रहने लगता हैं सामान्य जीवन नहीं जी पाता असामान्य व्यवहार करने लगता हैं किसी जानकार व्यक्ति द्वारा यह बताने पर की इस पर किसी बाहरी शक्ति का साया हैं सबलोग आश्चर्यचकित व असमंजस मे रह जाते हैं |

आखिर ऐसा होता क्यूँ हैं ? क्या ऐसा सब के साथ होता हैं ? ऊपरी हवाओ,भूत प्रेत,आत्माओ आदि का प्रकोप किन किन जातको पर हो सकता हैं आइए यह जानने का प्रयास ज्योतिषीय दृस्टी से करते हैं |

1)यदि लग्नेश निर्बलावस्था मे हो,नीच का होकर पापग्रहों संग या दृस्ट हो तथा शुभग्रहों का लग्न लग्नेश दोनों पर प्रभाव ना हो तो प्रेत बाधा हो सकती हैं |

2)शनि चन्द्र की युति हो,अथवा चन्द्र शनि के नक्षत्र मे हो तो भी प्रेतात्माए प्रभावित कर सकती हैं |

3)ग्रहण के दिन का जन्म हो अथवा ग्रहण कुंडली के लग्न,6,8,12 वे भाव मे हो |

4)लग्नेश नीच का होकर शनि राहू या मंगल के प्रभाव मे हो |

5)नीच अथवा पक्षबल मे निर्बल चन्द्र शनि राहू संग हो |

6)चन्द्र और राहू का नक्षत्र परिवर्तन हो तथा चन्द्र
,लग्न व लग्नेश सब पर पाप प्रभाव हो |

7)लग्न पापकर्तरी मे हो तथा गुरु राहू संग हो
,लग्नेश पीड़ित अथवा नीच का हो |

8)अष्टमेश लग्न मे हो और लग्न व लग्नेश दोनों पाप प्रभाव मे हो |

9)राहू राशिष निर्बल व पीड़ित होकर अष्टम भाव मे हो व लग्नेश पापकर्तरी मे हो |

10) पंचम भाव मे सूर्य शनि की युति,नीच का चन्द्र सप्तम भाव मे,गुरु द्वादश लग लग्नेश दोनों पीड़ित हो |

11)लग्नेश पापकर्तरी मे हो पंचमेश अष्टमेश मे परिवर्तन हो तथा लग्न मे पाप ग्रह हो |

इस प्रकार कुंडली मे ऐसे कई ग्रह योग देखे जा सकते हैं जो जातक विशेष को प्रेतबाधा का शिकार बना सकते हैं जिनसे ऊपरी शक्तियाँ उस पर हमला कर सकती हैं |

        

गुरुवार, 20 नवंबर 2014

किस माह मे करे गृह प्रवेश

किस माह मे करे गृह प्रवेश

हमारे भारतीय परिवेश मे गृह प्रवेश तीन प्रकार से किया जाता हैं | सपूर्व गृह प्रवेश 2) द्वंद गृह प्रवेश तथा अपूर्व गृह प्रवेश |

सपूर्व गृह प्रवेश –ऐसा मकान जिसमे पहली बार प्रवेश ना किया जा रहा हो अर्थात खाली होने के बाद जिस मकान मे गृह स्वामी स्वयं निवास करने हेतु प्रवेश करे |

द्वंद गृह प्रवेश-ऐसा मकान जिसमे मकान मालिक जीर्णोद्वार के बाद प्रवेश करे |

अपूर्व गृह प्रवेश-ऐसा मकान जिसमे गृह स्वामी ही पहली बार प्रवेश कर रहा हो |

शास्त्रो के अनुसार चैत्र मास,उत्तरायन,बसंत या ग्रीष्म ऋतु मे जब सौर्य उत्तरी गोलार्ध मे हो,चन्द्र शुक्ल पक्ष और आधे से अधिक आकार का नज़र आए तभी नए मकान मे प्रवेश करना चाहिए |

गृह प्रवेश व विभिन्न भारतीय महीने

1)माघ मास-इस माह गृह प्रवेश करने से ग्रहस्वामी को धन का लाभ होता हैं |

2)फाल्गुन मास-इस मास मे प्रवेश करने से विद्या,बुद्दि,सुख शांति तथा पुत्र संतान की प्राप्ति होती हैं

3)चैत्र मास –इस मास मे गृह प्रवेश शुक्ल पक्ष मे करने से धन लाभ,सम्पदा तहा पद लाभ मिलता हैं

4)वैशाख मास-इस मास मे गृह प्रवेश करने से धन धान्य,पशु सम्पदा,वाहन सुख तथा आरोग्यता प्राप्त होती हैं |

5)ज्येष्ठ मास- इस मास मे गृह प्रवेश करने से आय मे बढोतरी तथा व्यापार मे लाभ होता हैं |

6)आषाढ़ मास- इस मास मे गृह प्रवेश करने से धनहानी व शत्रु का कोप झेलना पड़ता हैं अवमानना व पद की हानी होती हैं |

7)श्रावण मास- इस मास मे गृह प्रवेश करने से रोग व शत्रु बढते हैं चोर इत्यादि कारण भय उत्पन्न होता हैं |

8)भाद्रपद मास-इस मास मे गृह प्रवेश करने से पित्रदोष मे वृद्दि तथा धन धान्य मे हानी होती हैं

9)आश्विन मास-इस मास मे गृह प्रवेश करने से धन हानी,शत्रु भय,परीक्षा मे विफलता मिलती हैं

10)कार्तिक मास-इस मास मे गृह प्रवेश करने से गृह स्वामी को पारिवारिक क्लेश,पत्नी व संतान की पीड़ा और शुभ कार्यो मे विघ्न का अंदेशा होता हैं |

11)मार्गशीर्ष मास –इस मास मे गृह प्रवेश करने से धन,स्वस्थ्य,व सुख शांति मे हानी होती हैं कारोबार मंदा होने लगता हैं |


12)पौष मास-इस मास मे गृह प्रवेश करने से सभी कामो मे रुकावट होने लगती हैं,बच्चो की शिक्षा मे रुकावट तथा विवाह बाधाए होती हैं |       

सोमवार, 10 नवंबर 2014

एकादशेश कितना शुभाशुभ



एकादशेश कितना शुभाशुभ

एकादश भाव मे सभी ग्रहो को शुभ माना जाता हैं जबकि एकादशेश को ज्योतिष के सभी प्राचीन विद्वान अशुभ मानते हैं भारतीय हिन्दू ज्योतिष के पितामह ऋषि पाराशर एकादशेश को दुखदायक अथवा अशुभ कर्ता कहते हैं उनके द्वारा बृहत पाराशर होरा शास्त्र मे “त्रिषडायाधिपा: सर्वेग्रह: पापफल: स्मृता” लिखा गया हैं |

ऋषि पाराशर ने एकादश भाव मे बैठे शुभग्रह तथा एकादशेश संग बैठे ग्रह के लिए भी अशुभ प्रभाव कहें हैं अनुभव मे एकादश भाव मे सभी ग्रह शुभता देते देखे गए हैं परंतु जब कोई ग्रह एकादशेश संग होता हैं तो वह अशुभफल ही देता हैं यदि एकादशेश को पाप ग्रह माना जाये तो एकादश भाव,एकादशेश संग बैठा ग्रह तथा एकादश भाव मे बैठा ग्रह तीनों ही अशुभ हो जाएंगे |

पराशरानुसार एकादश भाव लाभ,पुत्रवधू,दामाद,आय तथा पशुओ का माना जाता हैं |प्रत्येक व्यक्ति इस संसार मे सांसारिक वस्तुओ के पीछे भागता हैं और जब तक व्यक्ति को यह वस्तुए प्राप्त नहीं होती उसे सफल व सम्मानित नहीं माना जाता हैं यदि एकादशेश व एकादश भाव कमजोर होतो व्यक्ति चाहे कितना ही गुणवान क्यू ना हो उसे सफलता,सम्मान व आदर प्राप्त नहीं होता दूसरे शब्दो मे कहे तो जिस व्यक्ति का एकादशेश व एकादश भाव मजबूत हो उसे ही समाज मे इज्जत,सम्मान,खुशी,आदर इत्यादि प्राप्त होते हैं सभी प्रकार के लाभ इत्यादि एकादशेष तथा एकादश भाव से से जुड़े ग्रहो की दशा अंतर्दशा मे ही संभावित होते हैं इसीलिए इनसे जुड़ी दशाओ का इंतज़ार प्रत्येक व्यक्ति को रहता हैं इस प्रकार कहाँ जा सकता हैं की एकादशेश पाप ग्रह नहीं होता दूसरी तरफ से देखे तो यह उन सभी व्यक्तिओ के लिए शुभ होता हैं जो सांसारिक वस्तुओ की प्राप्ति मे लगे रहते हैं क्यूंकि एकादश भाव से जुड़े ग्रहो की दशा अंतर्दशा मे ही इन सब वस्तुओ की प्राप्ति होती हैं ऐसे मे एकादशेश का लग्नेश से संबंध भी अपना विशेष महत्व रखता हैं |

इस विषय मे भावार्थ रत्नाकर मे कहा गया है की कर्क लग्न के लिए बुध तीसरे व बारहवे घर का स्वामी होने के साथ साथ लग्नेश चन्द्र का शत्रु भी हैं जिससे यह कर्क लग्न के लिए अशुभ हुआ वही नैसर्गिक शुभ ग्रह शुक्र चतुर्थ व एकादश भाव का स्वामी होते हुये तथा केंद्र स्वामी होने के कारण अशुभ परिणाम दे सकता हैं परंतु शुक्र एकादशेश होने के कारण शुभ प्रभाव देता हैं जब यह बुध और शुक्र पंचम भाव मे होते हैं तो दोनों पंचमेश मंगल संग शत्रुता के चलते स्वयं भले ही प्रसन्न ना रहे परंतु शुभ फल ही देते हैं जिससे स्पष्ट होता हैं की एकादशेश व उसके संग बैठा पाप ग्रह शुभता ही देते हैं |

इसी प्रकार एक अन्य सूत्र मे मीन लग्न हेतु शनि का द्वादश मे होना शुभ बताया गया हैं  द्वादशेश को सम प्रभाव देने वाला माना जाता हैं जिसके सम होने से शनि कैसे शुभफल दे सकता हैं यदि उसका दशमेश से संबंध हो अर्थात शनि योगप्रदायक हो तब भी ऐसा नहीं हो सकता क्यूंकी मीन लग्न मे दशमेश व लग्नेश गुरु होने से उसे केंद्राधिपति दोष लगता हैं जिससे गुरु स्वयं प्रभावहीन हो जाता हैं फिर भी इस शनि को शुभ कहाँ गया हैं ऐसा संभवत: शनि के एकादशेश व द्वादशेश दोनों होने की वजह से कहा गया होगा |

फलदीपिका मे कहा गया हैं की एकादशेश की दशा मे जातक विशेष को संपन्नता,नौकर चाकर,मित्रता व सभी सांसारिक सुख इत्यादि प्राप्त होते हैं जिससे भी यही साबित होता हैं की एकादशेश लाभकारी ही होता हैं पाराशर जी यह भी कहते हैं की एकादशेश यदि नीच राशि मे हो 6,8,12 मे हो,पाप ग्रहो संग हो तो जातक चाहे कितना भी त्याग इत्यादि करले गरीबी मे ही जीता हैं |

यदि एकादशेष पाप प्रभाव मे हो तो हानी होगी लाभ नहीं और बिना लाभ के जीवन बेकार हैं अत: हम यह कह सकते हैं की एकादशेश यदि ठीक से स्थित होतो वह व्यक्ति के जीवन के चमकीले हिस्से को दर्शाता हैं अंधेरे हिस्से को नहीं हमे यह भी ज्ञात होता हैं की एकादश भाव शरीर का लाभ होता है और शरीर तब ही आनंद अथवा लाभ प्राप्त कर सकता हैं जब एकादशेश व एकादश भाव मजबूत हो,यह भाव परिवार व वाणी भाव से दशम होता हैं व्यक्ति तब ही परिवार मे पसंद किया जाता हैं जब वह अपने कर्मो के द्वारा उचित धन संपत्ति कमाता हो और धन तभी आता हैं जब लाभ हो,एकादशेश व एकादश भाव मजबूत हो,भाई व मित्र भी आपको धन होने पर ही पसंद करते हैं इसलिए यह तीसरे से नवम भाव हैं सुख भाव से यह अष्टम भाव होता हैं जो सुख की आयु बताता हैं पंचम से सप्तम होने से यह ये बताता हैं की लाभ पाने के लिए पूर्व पुण्य गँवाने पड़ते हैं छठे से छठा होने पर यदि यह भाव व उसका स्वामी मजबूत हो यह इस बात का संकेत होता हैं की आपके शत्रु,रोग व ऋण कभी नहीं होंगे सप्तम से पंचम भाव होने से यह जीवन साथी की शुभता के बारे मे बताता हैं अष्टम से चतुर्थ होने से यह इस बात का परिचायक बनता हैं की आयु का सूख तभी हैं जब आपको लाभ होता रहे नवम से तीसरा भाव होने से यह संदेश देता हैं की धर्म व लाभ एक साथ नहीं हो सकते दशम से दूसरा भाव होने से यह भाव कर्मो का धन भाव बन जाता हैं जो कर्म करने पर लाभ होने की प्रेरणा देता हैं यह सभी तथ्य हमें एकादशेश की शुभता ही दर्शाते हैं अर्थात इसे अशुभ कदापि नहीं कहाँ जा सकता |

संभवत: पराशरजी इसे अशुभ इसलिए कहते हैं क्यूंकी यह द्वादश का द्वाश भाव होता हैं अर्थात मोक्ष का व्यय भाव, एकादश भाव हमें लाभ की प्रेरणा देता हैं जिसके होने से हम मोक्ष प्राप्त नहीं कर सकते,यह सुख का मृत्यु भाव हैं,तथा बुद्दि,संतान व पूर्वपुण्यों का सप्तम भाव हैं यह सभी भाव हमें बांधते हैं अर्थात इनसे मुक्ति ही हमें मोक्ष दिलाती हैं |