रविवार, 30 नवंबर 2014

त्राटक

त्राटक

किसी भी बिन्दु या दीपक की लौ पर टकटकी लगाकर बिना पालक झपकाए दृस्टी शक्ति को बढ़ाने की क्रिया त्राटक कहलाती हैं इससे विचारशून्यता आती हैं |

त्राटक के भेद-त्राटक के 3 भेद हैं

1)निकट त्राटक-प्रात: 4 बजे से सूर्योदय तक का समय इसके लिए उपयुक्त होता हैं पहले आँखों को बाएँ दायें ऊपर नीचे चलाना चाहिए फिर सफ़ेद पत्थर का गोल टुकड़ा 2 फूट कि दूरी पर रखकर टकटकी लगाकर देखना चाहिए इसके बाद मोमबत्ती की लौ पर दृस्टी डालने का अभ्यास करना चाहिए फिर नाक की नोक पर दृस्टी जमानी चाहिए उसके बाद दोनों भोहो के मध्य भाग पर दृस्टी जमाने का अभ्यास कआरएनए चाहिए इस प्रकार का अभ्यास 32 मीनट का होने पर दिव्य दृस्टी प्राप्त होती हैं |

2)दूर त्राटक –निकट त्राटक के बाद साधक को दूर त्राटक करना चाहिए किसी पहाड़ की चोटी या पेड़ की फुनगी देखनी चाहिए फिर चाँद पर दृस्टी जमानि चाहिए फिर एक तारे पर और अंत मे किसी तारे पर दृस्टी जमाने का प्रयास करना चाहिए पहले पहल सूर्य के पानी पर पड रहे प्रतिबिंब पर फिर दर्पण पर पड रहे प्रतिबिंब पर उसके बाद सीधे सूर्य पर दृस्टी जमानी चाहिए |


3)अंतर त्राटक-आँखें बंद करके भोहों के मध्य देखना चाहिए आरंभ मे साधक को आँखें बंद करने पर 3,5,7 बिन्दु दिखाई देंगे जो की सफ़ेद नीले या पीले रंग के हो सकते हैं कुछ समय बाद ज्योति से दीपित नेत्र दिखाई देने लगेगा इसी प्रकार सूर्य चाँद तारे भी दिखाई देंगे इसके बाद आकाश के मध्य तीसरा नेत्रा व तीसरे नेत्र के मध्य बिन्दु दिखाई देगा फिर यह बिन्दु भी दिखाई देना बंद हो जाएगा यही पूर्ण अवस्था हैं |

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