"पूर्वकाल में पार्वती जी ने - भगवान शंकर से प्रश्न किया हे भगवन | हे देव मनुष्य में मृत्यु का चिन्ह और आयु का प्रमाण क्या है ? श्री शंकर जी बोले " हे देवि, भीतरी एवं बाहरी, स्थूल और सूक्ष्म चिन्हों द्वारा मनुष्य के शेष आयु के दिन,पक्ष,मास, ऋतु, अयन, एवं वर्ष का ज्ञान सम्भव हो सकता है "
१ -
यदि मनुष्य का शरीर सब ओर से अचानक पीला पड़ जाय और ऊपर से लाल दिखाई देने लगे |
२ -
जब मुख, कान, आंख, और
जिव्हा का अचानक स्तम्भन हो जाये |
३ -
जब पीछे से आती हुई भयावह ध्वनि न सुनाई दे |
४ -
सूर्य, चंद्रमा और अग्नि के रहने पर भी
यदि प्रकाश न दिखाई दे, और
सब कुछ काला दिखाई दे |
५ --
जिसके कंठ और मुख सूखने लगे |
६ --
जिसकी जीभ मोटी हो जाये और दोनों ओर से लार बहने लगे |
७ --
जब मनुष्य जल, तेल, घी
और दर्पण में अपनी छाया न देख सके, अथवा
विकृत छाया दिखाई दे |
८ --
यदि रात्रि में इंद्रधनुष और दोपहर में उल्कापात देखे और उसे कौए और गीध घेरने
लगें |
९ --
अगर आकाशमण्डल में छाया पथ (आकाश गंगा) और सप्तर्षिगण न दिखाई पड़ें |
१० -
अगर अचानक सूर्य और चंद्रमा को राहु से ग्रस्त और दिशाओं को घूमता हुआ देखे |
तब 6 मास
के भीतर उसकी मृत्यु निश्चित होती है ।
१ -
जब बांयाँ हाथ एक सप्ताह तक फड़कता रहे |
२ --
जब देह में टूटन हो एवं तालू सूख जाए |
३ --
जब मनुष्य अपनी छाया को सिर विहीन देखे, अथवा
छाया से रहित देखे |
४ --
अगर मनुष्य को अचानक नीले रंग की मख्खियां घेर लें |
५ -
अगर गिद्द, कौआ, अथवा
कबूतर अचानक सिर के ऊपर आकर बैठ जाये |
मनुष्य
का जीवन १ मास का शेष रहता है ।
१ --
त्रिदोष हो जाने पर, जिसकी
नासिका बहती रहे |
२ --
जब सूर्यमण्डल अथवा चन्द्रमण्डल किरणों से रहित प्रतीत हो अथवा लाल वर्ण वाला
दिखलाई पड़े |
तब जीवन
एक पक्ष (१५ दिनों) का शेष रहता है ।
इसी
प्रकार प्राण वायु शरीर मे आने जाने के लिये वाम, दक्षिण
और मध्य यह तीन नाड़ियां जानी जाती है । इनमें किसी एक के अधिक या कम चलने के बारे
से भी आयु निश्चित करने का विज्ञान है ।
काल
सभी प्राणियों के सन्निकट घूमता रहता है, बड़े
बड़े देवताओं, दैत्यों, यक्षों, राक्षसों, सर्पो
और मनुष्यों से भी काल नही मारा जा सकता है,परन्तु योगी आये हुए काल को भी वंचित कर देता
है जिससे उसकी मृत्यु नहीं होती है ।
यह
पँचभूतात्मक शरीर, आकाश, वायु, तेज
(अग्नि), जल और पृथ्वी से उत्पन्न होता है ।
जब ये पंच महाभूत शब्द, स्पर्श, रूप, रस, और
गंध अपने अपने गुणों को त्याग देते है, तब
प्राणी की मृत्यु हो जाती है और
जब अपने अपने गुणों को ग्रहण कर लेते है तब उसी को जीवन का प्रकट होना कहते हैं ।

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