सोमवार, 26 अप्रैल 2010

काल सर्प "योग या दोष"

काल सर्प योग के विषय में अनेक मत भ्रांतियां हैं कुछ विद्वान् इसे भयंकर दोषों में गिनते हैं कुछ इसके आस्तित्व को ही पूर्णतया नकार देते हैं कारण चाहे कोई भी हो मानव जीवन मुख्यत: कालसर्प के कारक राहू-केतु के प्रभावों से सबसे ज्यादा प्रभावित होते हैं यह दोनों (राहू-केतु) अद्रश्य पिंड या बिंदु हैं जो चन्द्रमा द्वारा पृथ्वी का परिभ्रमण करते हुए पृथ्वी पथ को काटने पर बनते हैं चूँकि ऐसा दो बार होता हैं अत: दो बिंदु निर्मित होते हैं जिन्हें क्रमश: राहू(दक्षिणीसम्पात बिंदु) तथा केतु (उत्तरी सम्पात बिंदु) कहा जाता हैं |चन्द्रमा हर माह दो बार पृथ्वी पथ को काटता हैं जिससे दो ही बिंदु निर्मित होते हैं परन्तु अलग अलग समय के अंतराल पर (लगभग १४ दिनों के अन्तर से) ऐसे में जब दो बिंदु एक साथ हैं ही नहीं तो इनके बीच आने या ग्रहों को इनके मध्य कैसे माना गया यह समझ से परे हैं |

खगोल विज्ञान से देखे तो भी मंगल,गुरु व शनि ग्रह पृथ्वी कक्षा से बाहर हैं और राहू केतु का निर्माण केवल चन्द्रमा द्वारा पृथ्वी पथ को काटने पर होता है अत:मंगल,गुरु व शनि इनके बीच कभी आ ही नहीं सकते हैं |यवन आचार्यो ने भी अपने २००० प्रकार के योगो में भी इस योग की चर्चा नहीं की हैं अपनी ज्योतिष के ज्ञान के आधार पर हमारे विद्वानों ने भी कही किसी पुस्तक में इस योग की चाह्चा नहीं की हैं (सर्पयोग की चर्चा हैं ) स्वयं मैंने भी ज्योतिष के अपने अनुभव व शोधो में कालसर्प योग का ज़िक्र किसी भी पुरानी ज्योतिषीय पुस्तक में नहीं पढ़ा हैं |

अगर माना भी जाये की कालसर्प योग होता हैं तो भी यह शुभ ही होना चाहिए क्यूंकि योग शब्द की उत्त्पत्ति का अर्थ ही जोड़ना होता हैं जबकि इस योग से प्रभावित व्यक्ति टूटा व बिखरा ही दिखता हैं अत:इसे योग ना कहकर दोष क्यों नहीं कहा जाता एक तरफ तो इसके भयानक प्रभाव बतलाये जाते हैं व दूसरी तरफ इसे योग का नाम दिया जाता हैं जो की किसी भी तरह से उचित नहीं हैं एक अकेले ग्रह मंगल से प्रभावित होने पर मंगल दोष कहा जाता हैं परन्तु दो क्रूर व पाप पिंडो से प्रभावित होने पर योग कहा जाये यह बात कुछ समझ से परे हैं |

आखिर राहू केतु के मध्य ग्रहों के आ जाने से विपदाए व कष्ट क्यों मिलते हैं इसका जवाब हैं की इन दोनों पिंडो का अपना कोई आस्तित्व नहीं हैं यह जिस राशी में बैठते हैं उसी राशी के स्वामी के बल में कमी या तेजी कर देते हैं जिससे व्यक्ति विशेष परेशानी महसूस करता हैं,फिर कुछ ऐसे स्थान (कुंडली) में होते हैं जो हमारे जीवन पर बेहद प्रभाव डालते हैं (केंद्र व त्रिकोण)जिनमे बहुत से ऐसे अन्य कारण भी हैं जिनसे व्यक्ति पर प्रभाव पड़ता ही हैं | अगर यह दोनों पिंड हमेशा पीड़ा ही देते हैं तो क्यों इन्हें ३,६.११वे भाव में शुभता देते देखा गया हैं एक कारण यह भी हैं की यदि एक पिंड सही स्थान पर होगा तो दूसरा पिंड इसके बिलकुल विपरीत (१८०)स्थान पर होगा जिससे अच्छे बुरे दोनों फल होंगे, अच्छे फल न बताकर बुरे ही बताये जायेंगे तो व्यक्ति और डरेगा वैसे भी आमतौर पर देखा जाए तो हर कोई इन दोनों ग्रह पिंडो से डरा ही रहता हैं |

अंत में यही कहने चाहूँगा की यदि कालसर्प होता हैं तो वह योग नहीं हो सकता दोष होगा और यदि नहीं होता तो फिर इससे डरने के ज़रूरत ही नहीं हैं |भगवान हमेशा हमारे साथ रहते हैं हम जो भी करते हैं या करना चाहते हैं उस प्रभु की आज्ञा बिना कर ही नहीं सकते |
प्रस्तुत लेख "आ़प का भविष्य" नामक पत्रिका में मई के अंक में छपा हैं |

अगले लेख में "त्रियम्बकेश्वर नामक स्थान का क्या महत्व हैं" इस पर अपने विचार बताने की चेष्टा करूँगा |

1 टिप्पणी:

Mahfooz Ali ने कहा…

बहुत अच्छी लगी यह जानकारी....
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www.lekhnee.blogspot.com


Regards...


Mahfooz..