हमारी संस्कृति विश्व स्तरीय सर्वोच्चता प्राप्त कर मानवता को अमृतमय संदेश देती है कि भौतिक समृद्धि की अपेक्षा आत्मिक समृद्धि ही श्रेयस्कर हैं, जिसमें तृप्ति और शांति है, सुख और सबके मंगल की वास्तविक कामना है । प्रत्येक वर्ण तथा प्रत्येक आश्रम के लिए तो इसकी उपयोगिता है ही जीवन के आदर्श शिक्षण के लिए भी इसकी उपादेयता तथा महत्ता स्वयं सिद्ध है। गीता महात्म्य में इसकी महत्ता का प्रतिपादन करते हुए कहा गया है-
गीता सुगीता कर्तव्या किमन्यैः शास्त्र विस्तरैः ।
या स्वयं पद्मनाभस्य मुख पद्माद्विनिसृता ।।
अर्थात 'एक साधे सब सधे' का प्रतिपादन करते हुए विस्तुत शास्त्र समुदाय के स्थान पर एक गीता के अध्ययन का प्रावधान इस दृष्टि से किया गया है इसी के माध्यम से व्यक्ति अनायास सर्व-शास्त्र सार को ग्रहण कर सकता है।
गीता का हर अध्याय आपकी किसी न किसी समस्या का समाधान आइये आप स्वयं जानियें!
01 शनि का विषाद
मोह और कर्तव्य के बीच का तनाव शनि के प्रभाव जैसा विषाद पैदा करता है। प्रथम अध्याय का नियमित पाठन शनि की इस पीड़ा को कम करता है।
02 भगवान श्रीकृष्ण की दया
जिन कुंडलियों में शनि पर गुरू की दृष्टि हो, उन्हें दूसरे अध्याय का नियमित पाठन करना चाहिए।
03 शंका का समाधान
दसवें भाव पर शनि की दृष्टि होने पर तीसरे अध्याय का पाठन करना चाहिए। इससे जातक को अपने कर्म क्षेत्र में मंगल और गुरू का सहयोग मिलता है।
04 इष्ट साधन
जिन जातकों का लग्न कमजोर हो और इष्ट निर्धारित नहीं हो, उन्हें चतुर्य अध्याय का पाठन करना लाभ दिलाता है। इससे विचारों में भी स्थिरता आती है।
05 द्वंद् का निराकरण
कुंडली में नौंवे दसवें दोनों भावों के स्वामी ग्रह अगर शत्रु अंतर्संबंध होने पर इस अध्याय का पाठ अधिक महत्त्वपूर्ण हो जाता है |
06 समय का बदलाव
खराब दशा के बाद अच्छी दशा आने पर जातक यह अध्याय पढ़ें। गुरू और शनि ग्रहों की दशा में बेहतर होती है।
07 सांसारिक की समस्या
मोक्ष का भाव (आठवां भाव) खराब होने पर सांसारिक समस्याएं पीड़ित रखने लगती है। आठवां भाव नष्ट या पीड़ित होने पर इस अध्याय का पाठन लाभ देता है।
08 मृत्यु का भय
मृत्यु से पहले मृत्यु का भय आठवें और बारहवें भाव के संबंध से आता है। इस अध्याय का पाठन मृत्यु के भय को कम या समाप्त करता है |
09 लय पाने के लिए
क्षमता के अनुरूप प्रदर्शन नहीं कर पा रहे जातक जिनकी कुंडली में लग्नेश, नवमेश और मूल स्वभाव राशि का संबंध हो, नवम अध्याय का पाठ कर लय में आ सकते हैं ।
10 लग्नेश को मजबूत बनाएं
गीता के दसवें अध्याय का पाठन हर जातक को करना चाहिए। इससे जातक का लग्न मजबूत होता है।
11 लाभ का सौदा
काम करते-करते जातक कभी उखड़ने लगे तो यह अध्याय उपयोगी सिद्ध होता है। ग्यारहवें यानि लाभ को भाव को मजबूत बनाने के लिए इस अध्याय का नियमित पाठ किया जाना चाहिए ।
12 प्रारब्ध का बंधन
जातक की कुंडली का पांचवा और नौवा भाव कमजोर होने पर 12ve भाव का पाठन लाभ देता है । नौवे धर्म के भाव को मजबूत करने के लिए भी इस अध्याय का सहारा लिया जा सकता है ।
13 दूसरी दुनिया से संबंध
कुंडली में चंद्रमा और बारहवें भाव का संबंध होने पर व्यक्ति वैराग्य के बारे में सोचने लगता है। इस अध्याय का नियमित पाठन जातक को संसार में रहकर अपनी जिम्मेदारियां पूरी करते हुए बंधनों से मुक्त रहने में मदद करता है |
14 अकस्मात् लाभ
आठवें भाव में उच्च का ग्रह मौजूद होने पर जातक को अचानक लाभ की स्थितियां बनती है । ऐसे में गीता के चौदहवे भाव का नियमित पाठन आध्यात्मिक दृष्टि से उम्मीद से अधिक लाभ दिलाने में सहायक सिद्ध होता है |
15 संभावनाएं
प्रारब्ध में संचित अच्छे कर्मों का लाभ लेने के लिए इस अध्याय का पाठन महत्त्वपूर्ण है। पंचमेश और लग्नेश का संबंध होने पर इस अध्याय का पाठन करना लाभदायक रहता है |
16 शक्ति संतुलन
कुंडली में सूर्य और मंगल खराब स्थिति में हों तो इस अध्याय का पाठन जातक को लाभ दिला सकता है। यह अध्याय शक्तियों को संतुलित करने और उनके सही उपयोग के लिए जरूरी है |
17-18 राहु की पीड़ा
राहु की महादशा अथवा कारक ग्रह सहित कुंडली में राहु से पीड़ित होने पर सत्रहवां और अठारहवां अध्याय लाभ देता है। इन अध्यायों का पाठन जातक को खराब दशा में शक्ति देता है दूसरी ओर बुरे असर से बचाने में भी सहायक सिद्ध होता है |
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