धन भाव पर विभिन्न ग्रहों की दृष्टि का फल
यदि धन भाव पर सूर्य की दृष्टि हो तो दृष्टिमन्दता का दोष उत्पन्न होता है। दूसरा स्थान नेत्र स्थान भी है और सूर्य उग्र प्रकृति होने के साथ साथ विच्छेदात्मक भाव भी अपने में रखता है, इसलिए इसकी दृष्टि से नेत्र-ज्योति कम हो जाए तो क्या आश्चर्य? सूर्य आत्मा का कारक है, राजग्रह है, इसकी धन भाव पर दृष्टि जातक को सहनशील बना देती है। ऐसा जातक भाग्यहीन होता है ! वह जितना श्रम करता है, उतना फल नहीं मिलता, सहयोगियों से विरोध हो जाता है और जातक उपार्जित है । धन को परिस्थितिवश नष्ट कर डालता है, फलतः उसे विपन्न होना पड़ता
यदि चन्द्रमा धन भाव को देख रहा हो तो जातक का बाल्यकाल रुग्णावस्था में व्यतीत होता है। ऐसा चन्द्रमा लग्न से अष्टम भाव में होगा। अष्टम चन्द्र अरिष्टप्रद रहता है। ऐसे जातक के जल में डूबने की आशंका से इन्कार नहीं किया जा सकता। ऐसा जातक कामातुर भी होता है। परदारगमन की इच्छा बनी रहने से द्रव्य को उनके पीछे व्यय कर डालता है । बहुत ही शुभ सम्बन्ध में आया चन्द्रमा शुभ फलदाता होता है ।
धन स्थान पर मंगल की दृष्टि प्रायः शुभ मानी जाती है। सप्तम भाव में स्वराशिस्थ भौम यदि धन भाव को देख रहा हो तो जातक प्राय सम्पत्तिवान् होता है। उसे ससुराल से भी धन की प्राप्ति होती है तथा पत्नी भी पढ़ी-लिखी और कमाऊ मिलती है।
एकादश भाव से उच्च का मंगल धन भाव को देखे तो अटूट सम्पत्ति मिलती है। इसमें दो हेतु होते हैं। एक तो धनेश एकादश में होकर स्वगृह (मेष) को देखेगा, दूसरे धनेश उच्च का होकर आय स्थान में होगा।
अष्टम भाव में पड़े मंगल की धन भाव पर दृष्टि शुभ नहीं रहती, भले वह स्वयं धनेश ही क्यों न हो।ऐसे जातक को अर्श-भगन्दर जैसे रोग होते हैं तथा उसके दाम्पत्य जीवन में गत्यवरोध उत्पन्न होता है। अधिक परिश्रम करने पर भी जातक को अल्प लाभ ही मिलता है। ऐसा जातक शत्रुहन्ता होता है।
यदि धन भाव को बुध अपनी दृष्टि द्वारा प्रभावित कर रहा हो तो जातक व्यापारी होता है और इस माध्यम से धनार्जन करता है। जातक इतना अधिक स्वाभिमानी होता है कि हठी प्रतीत होने लगता है। इस स्वभाव के कारण उसे अपने जीवन में अनेक प्रकार से हानि वहन करनी पड़ती है। ऐसा जातक स्वतन्त्र विचारों वाला होता है तथा स्वतन्त्रता की प्राणपण से रक्षा करता है। यदि बुध कन्या राशि का होकर धन भाव को देख रहा हो तो जातक को दिवालिया बना देता है, क्योंकि अपने आपको आवश्यकता से अधिक चतुर मानने वाला ऐसा व्यक्ति बिना विचारे बड़ी योजनाओं या उद्योगों में पैसा फंसा देता है।
यदि धन भाव पर गुरु की दृष्टि हो तो जातक शत्रुकृत कृत्यों के कारण दुःखी रहता है। शत्रु उसके प्रत्येक कार्य अथवा योजना को नष्ट कर देते हैं। ये फल गुरु के रिपु भाव में होने से मिलते हैं।
यदि गुरु अष्टम में होकर धन भाव पर दृष्टि डाल रहा हो तो जातक अच्छे मार्ग से धन प्राप्त करता है। ऐसे जातक को पारिवारिक और सामाजिक सुख की कमी नहीं होती। मित्र, सम्बन्धी सभी सहायक होते हैं तथा ससुराल से भी उसे धन मिलता है। ऐसा जातक राज्य सेवा में भी उच्च पद प्राप्त कर लेता है। जिस समुदाय में वह रहता है तथा जहां वह नौकरी करता है वहां भी उसे महत्त्वपूर्ण व्यक्ति समझा जाता है। धन की ऐसे जातक को कभी कमी नहीं होती। यदि गुरु नीच, पापाक्रान्त व वक्री (स्वराशिस्थ या उच्च का होकर) हो तो विपरीत फल मिलते हैं।
धन भाव पर शुक्र की दृष्टि होने से जातक भौतिक सुखों का दास होता है तथा कामवासना के वशीभूत होकर परदारगमन करता है। ऐसा व्यक्ति स्त्रीलोलुप होकर धन का व्यय तो करता ही है, शरीर को भी क्षीण कर लेता है। ऐसे में यदि रतिजन्य रोग और दूसरे यौन रोग हो जायें तो क्या आश्चर्य? यौवनकाल में ही जातक धन और शरीर दोनों का नाश कर लेता है। पारिवारिक जनों तथा मित्रों का सहयोग तो उसे मिलता रहता है, आय के साधन भी बने रहते हैं, लेकिन कुकृत्यों के कारण क्षीणशरीर होकर वह दुःख ही भोगता है।
धन भाव पर पंचम भाव स्थित शनि की दृष्टि होने से जातक वैद्य, डाक्टर, वैज्ञानिक या इंजीनियर बनता है तथा जीवन में सफलता प्राप्त करता है। ऐसे जातक चिकित्सा के क्षेत्र में भी अच्छा धन-सम्मान अर्जित कर लेते हैं।
यदि शनि अष्टम भाव में स्थित होकर धन भाव पर दृष्टि डाल रहा हो तो जातक का जीवन-स्तर सामान्य ही होता है। ऐसा जातक जुआ, सट्टा, लाटरी या अस्त्र-शस्त्र के व्यवसाय से सम्बन्धित होकर जीविका चलाता है तथा वात-व्याधि से पीड़ित होता है।
व्ययगत शनि की धन भाव पर दृष्टि प्रायः अधिक अशुभ प्रभाव दिखाती है। जातक इतनी विपन्नावस्था में होता है कि उसे पराये अन्न पर जीवन यापन करना पडता है। नाना प्रकार की व्याधियां उसके शरीर को बेकार कर डालती हैं। स्वगृही या उच्च का शनि हो तो शुभ फल भी मिलते रहते हैं। इतने पर भी जातक आयु के 36 वर्षों तक कष्ट भोगता है।
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