बुधवार, 15 जून 2016

कुछ रोचक तथ्य

कुछ रोचक तथ्य

1)आपके जूतो के द्वारा लोग आपके विषय मे सबसे ज़्यादा आंकलन करते हैं इसलिए हमेशा अच्छे जूते ही पहने |

2)अगर आप प्रतिदिन 11 घंटे बैठकर काम करते हैं तो आपके अगले तीन वर्ष मे मर जाने की संभावना 50% हो जाती हैं |

3)दुनिया मे कम से कम 6 लोग बिलकुल आपके जैसे दिखते हैं और इस बात की 9% संभावना होती हैं की उनमे से कोई आपको कभी मिले |

4)तकिये के बिना सोना कमर दर्द मे राहत प्रदान करता हैं और आपकी रीढ़ को मजबूत रखता हैं |

5)व्यक्ति का कद उसके पिता से तथा वजन उसकी माता से परखा जाता हैं |

6)आपके शरीर का कोई भी हिस्सा अथवा अंग यदि सोया होतो आप उसे अपने सिर को हिलाकर जगा सकते हैं |
7)आप अपनी कोहनी को कभी चूम नहीं सकते |

8)मानव मस्तिष्क कभी भी इन तीन वस्तुओ को नकार नहीं सकता भोजन,आकर्षक लोग तथा खतरा |

9)दायें हाथ से काम करने वाले अपना भोजन दायें जबड़े से ज़्यादा खाते हैं |

10)प्रकृति मे सेबो की इतनी किस्मे हैं यदि हम प्रतिदिन एक नई किस्म खाये तब भी हमें उसकी 
पूरी किस्मों को खाने मे 20 वर्ष लगेंगे |

11)हम बिना खाना खाये हफ्तों जिंदा रह सकते हैं परंतु सोये बिना 11 दिन से ज़्यादा नहीं |

12)आइन्सटाइन के अनुसार यदि धरती पर मधुमक्खी ना हो तो 4 वर्ष के अंदर मानव जाति  भी नष्ट हो जाएगी |

13)जो लोग ज़्यादा हँसते हैं वह ज़्यादा स्वस्थ रहते हैं |

14)मानव मस्तिष्क विकिपीडिया से 5 गुना ज़्यादा जानकारिया रखने की क्षमता रखता हैं |

15)हमारा दाया पैर बाए पैर से ज़्यादा बड़ा होता हैं |

16)सोते समय हमारा कद बढ़ जाता हैं |

17)हम आँख खोलकर छींक नहीं सकते |

18)हमारे बाल मरने के बाद भी बढ़ते हैं |

19)दिमाग को काटने पर दर्द महसूस नहीं होता |

20)मानव मस्तिष्क स्वयं को समझ पाने मे अभी तक कामयाब नहीं हुआ हैं |



रविवार, 12 जून 2016

मुहूर्त ज्ञात करने की विधि

मुहूर्त ज्ञात करने की विधि

वार,नक्षत्र,तिथि एवं लग्न का योग कर 9 से भाग दे जो शेष आए उसका निम्न फल हो |

1)व्यवधान,भय,पीड़ा से ग्रसित

2)प्राकृतिक घटनाओ से विघ्न पड़े

3)सफलता मिलेगी

4)असफलता व अशुभता

5)शुभफल मिलेंगे

6)अशुभ फल मिलेंगे

7)सफलता व सिद्दी

8)रोग शोक संभावित

9)शुभ फल की सूचना

1)वार रविवार से गिने (1-7)

2)नक्षत्र अश्विनी से रेवती (1-27)

3)तिथि प्रथमा से पुर्णिमा (1-14)अमावस्या 30 मानी जाएगी |

4)लग्न मेष से मीन (1-12)


उदाहरण सोमवार,कृतिका नक्षत्र,प्रथमा तिथि और मेष लग्न होने पर मुहूर्त हुआ =2+3+1+1=7 अर्थात सफलता व सिद्दी मिलेगी |

शुक्रवार, 10 जून 2016

विवाह हेतु शुभाशुभ तिथि

विवाह हेतु शुभाशुभ तिथि

1)प्रथमा-वर पक्ष के लिए कन्या दुखो को जन्म देती हैं |

2)द्वितीय-वर को कन्या से अत्यधिक प्रीति मिले जीवन प्रेममय हो |

3)तृतीया –कन्या सौभाग्यवती रहे |

4)चतुर्थी-कन्या वर के धन का नाश करे |

5)पंचमी-दोनों का सुखमय जीवन हो |

6)षष्ठी-विवाह होते ही हर कार्य मे बाधा होने लगे |

7)सप्तमी-हर प्रकार से सुख प्रदान करने वाली वधू की प्राप्ति हो |

8)अष्टमी-किसी प्रकार का फल ना मिले |

9)नवमी-वर को हर समय शोक प्रदान करने वाली वधू मिले |

10)दशमी-आनंद देने वाली वधू जिससे सारे परिवार को आनंद प्राप्त होवे |

11)एकादशी-वधू का आगमन पूरे परिवार को सुख प्रदान करे |

12)द्वादशी-वधू सर्वसुख प्रदान करने वाली हो |

13)त्रियोदशी-सम्मान बढ़ाने वाला विवाह जिससे नाम कमाने वाली संतान जन्म ले |

14)चतुर्दशी-परिवार मे कलंक लगने वाला विवाह होवे |

15)पूर्णमाशी-हर प्रकार से सुख व संपन्नता देने वाला विवाह होवे |

16)अमावस्या-असफल विवाह या तो तलाक होवे या दोनों मे से एक की मृत्यु हो जाये |


बुधवार, 8 जून 2016

राहू व केतू

राहू व केतू

राहू केतू छाया गृह माने जाते हैं हिन्दू ज्योतिष मे इन्हे दैत्य माना जाता हैं जो सूर्य व चन्द्र को भी ग्रहण लग देते हैं यह दोनों हमेशा वक्रावस्था मे रहते हुये एक दूसरे के विपरीत भावो मे रहते हैं राहू को केतू से ज़्यादा भयानक माना गया हैं पुरानो के अनुसार कश्यप ऋषि की 13 पत्नियों मे से एक सिंहिका का पुत्र राहू था जिसके अमृतपान कर लेने से भगवान विष्णु ने अपने चक्रो से दो हिस्से कर दिये थे राहू ऊपर का हिस्सा तथा केतू नीचे का हिस्से कहलाता हैं |

यह दोनों 12 राशियो का भ्रमण 18 वर्षो मे करते हैं तथा एक राशि मे 18 माह रहते हैं राहू को विध्वंशक तथा केतू को मोक्षकर्ता माना गया हैं राहू जिस भाव मे स्थित होता हैं उस भाव से संबन्धित कारकत्वों को ग्रहण लगा देता हैं अर्थात कमी कर देता हैं जबकि केतु उस भाव विशेष से विरक्ति प्रदान करता हैं राहू को स्त्रीलिंग तथा केतू को नपुंशक माना गया हैं | राहू केतू के मित्र बुध,शुक्र व शनि हैं तथा मंगल इनसे समता रखता हैं | यह दोनों छायाग्रह होने के कारण जिस राशि मे होते हैं उसके स्वामी के जैसे ही फल प्रदान करते हैं | केंद्र,त्रिकोण मे होने से यह कई शुभ योग प्रदान करते हैं | विशोन्तरी दशा मे राहू को 18 तथा केतू को 7 वर्ष दिये गए हैं |

चन्द्र से केंद्र मे राहू यदि 1 से 8 भावो मे हो तो जातक लंबा होता हैं और यदि केतू चन्द्र से केंद्र मे होकर 1 से 8  भावो मे होतो जातक कद मे छोटा होता हैं राहू 1,7,9,11 राशियो के अतिरिक्त सभी राशियो मे शुभफल प्रदान करता हैं कन्या राशियो मे इसे अंधा माना जाता हैं जिस कारण इस राशि मे यह कोई फल नहीं देता हैं |

लग्न मे राहू बहुत शुभ होने पर जातक लंबा व पतला,बहुत घूमने वाला तथा तकनीकी ज्ञान वाला होता हैं परंतु किसी ना किसी रोग से पीडित ज़रूर रहता हैं यदि राहू चन्द्र संग होतो जातक स्वार्थी व लालची प्रवृति का तथा मानसिक विकार वाला होता हैं ऐसे मे यदि चन्द्र केंद्र का स्वामी होतो जातक माता व परिवार का वफादार नहीं होता हैं राहू उसे हावभाव पूर्ण वाणी,बहुत तरक्की तथा दो पत्नीयो का सूख प्रदान कर्ता हैं | केतू लग्न मे जातक को छोटा कद,विकलांगता तथा अन्य अशुभ प्रभाव देता हैं |

दूसरे भाव मे राहू जातक को धन व पैतृक संपत्ति देता हैं परंतु जातक का धन बचता नहीं हैं अर्थात जातक को बरकत नहीं होती ऐसा जातक किसी के मामले मे हस्तक्षेप नहीं करता,वाणी संबंधी विकार से ग्रस्त हो सकता हैं परिवार से भी ऐसे जातक की कम निभती हैं बहुधा विवाह बाद परिवार से अलग रहते हैं | केतू यहाँ पर जातक की पूश्तैनी संपत्ति को कर्जे द्वारा नष्ट कर देता हैं जातक को बड़ा परिवार परंतु आमदनी कम देता हैं |

तीसरे भाव मे सम राशि का राहू शुभ माना जाता हैं यहाँ राहू जातक को परिवार मे सबसे छोटा बनाता हैं जो सहोदरो हेतु अशुभ होता हैं | केतू यहाँ कर्ण रोग तथा कमजोर दिमाग देता हैं बहुधा जातक के परिवार मे 3 सदस्य होते हैं |

चतुर्थ भाव मे राहू भूमि अथवा मकान के सुख मे कमी करता हैं जातक मानसिक रूप से व्याकुल व परेशान रहता हैं उसकी माँ का स्वास्थ्य भी ठीक नहीं रहता उसके मकान मे वस्तु अथवा प्रेत दोष अवश्य होता हैं | केतू यहाँ जातक को घर से उचाट रखता हैं अर्थात जातक घर से बाहर रहना ज़्यादा पसंद करता हैं तथा उसके अपनी माँ से संबंध अच्छे नहीं होते |

पंचम भाव मे राहू शिक्षा पूर्ण नहीं होने देता परंतु बुद्दिमान बनाता हैं उसे कला,फोटोग्राफी व लेखन का शौक देता हैं जातक को विवाह सुख मे किसी ना किसी रूप मे परेशानी ज़रूर देता हैं पत्नी यदि सुंदर होती हैं तो जातक उस पर शक करता हैं उसे गर्भविकार रहते हैं जिससे संतान संबंधी कष्ट जातक के जीवन मे रहते हैं अथवा पहली संतान मे परेशानी होती हैं बहुधा जातक की पुत्र संतान नहीं होती | केतू यहाँ संतान हेतु अशुभता देता हैं तथा शिक्षा मे रुकावट ज़रूर देता हैं | संक्षेप मे कहे तो इस भाव मे राहू केतू शिक्षा व संतान हेतु अशुभ रहते हैं संतान पर रूखा व्यवहार रखवाते हैं परंतु संतान से बेहद लगाव भी करवाते हैं |

छठे भाव मे राहू जातक को ताकतवर बना उसे अच्छी नौकरी प्रदान करता हैं उसे मामा से लाभ प्राप्त कराता हैं पाप प्रभाव मे होने से जातक की कलाई पर निशान,नेत्र रोग तथा उसके मामा को पुत्र नहीं देता केतू यहाँ जातक को शत्रुता से बचाता हैं अर्थात जातक के शत्रु नहीं होते |

सातवे भाव मे राहू जातक को विवाह सूख मे किसी न किसी प्रकार से कमी प्रदान करता हैं मंगल संग होने पर राहू यहाँ जातक की पत्नी को मासिक धर्म संबंधी बीमारी देता हैं जिससे जातक के अन्य स्त्रीयों से संपर्क बन जाते हैं मंगल,चन्द्र संग राहू यहाँ नेत्रा व गुप्त रोग देता हैं शुक्र से केंद्र मे राहू यहाँ पत्नी भक्त बनाता हैं जो दूसरों को हमेशा भला बुरा कहता रहता हैं | केतू यहाँ जातक को पत्नी से समय समय पर दूर करता रहता हैं अर्थात जातक व उसकी पत्नी किसी भी कारण से अलग अलग रहते हैं बहुधा जातक की पत्नी वाचाल प्रवृति की होती हैं जिस कारण जातक उसे जातक बात बात पर टोकता अथवा जलील करता रहता हैं |

अष्टम भाव मे राहू जातक को लंबी बीमारी द्वारा मृत्यु देता हैं | 2,4,5,6,8,10,12 राशियो का राहू होने पर जातक की पत्नी सुंदर व मृत्यु सुखद अर्थात बेहोशी या सोते हुये होती हैं जातक को अपने जीवन काल मे उदर रोग रहता हैं | केतू यहाँ दंतरोग,चर्मरोग इत्यादि देता हैं तथा जातक को आत्महत्या हेतु भी उकसाता रहता हैं |

नवम भाव मे राहू सरकार द्वारा लाभ प्रदान करता हैं परंतु संतान देर से देता हैं राहू यदि समराशि मे को कष्ट तथा जवानी मे जुआ खेलने की आदत देता हैं उसकी इस आदत की वजह से अच्छे लोग उससे दूर रहते हैं तथा वह ग़लत दोस्तों के कारण अपयश पाता हैं |

दशम भाव मे 2,4,5,6,8,10,12 राशियो का राहू जातक को शुभता,अधिकार व प्रसिद्दि देता हैं ऐसा जातक छोटा काम नही करते प्राय 30 वर्ष बाद इनके जीवन मे बदलाव आता हैं यह राजनीति करने मे बड़े गुणी होते हैं |केतू यहाँ जातक से निम्न कार्य कराता हैं स्वयं का व्यापार करने नहीं देता जातक का चरित्र शंकालु होता हैं तथा पिता को शुभता नहीं देता |

एकादश भाव मे राहू धन व पद दोनों देता हैं परंतु पुत्र केवल एक ही देता हैं ऐसा जताक कर्ण रोग से पीड़ित होता हैं तथा शीघ्र धनवान बनने की चाह मे जातक सट्टा,लॉटरी इत्यादि मे धन लगता हैं केतू यहाँ गजेट्स का शौकीन बनाता हैं तथा जाक अपने बड़ो से दूर रहना पसंद करता हैं |

द्वादश भाव मे राहू नेत्र रोग,एक से अधिक विवाह,नींद मे परेशानी तथा डींगे मारने वाला व्यक्तित्व देता हैं ऐसा जातक करता कुछ नहीं हैं परंतु बातें बड़ी बड़ी करता हैं चन्द्र संग होने पर जातक का रुझान आध्यात्मिकता की और बढ़ा देता हैं | केतू यहाँ जातक को मस्तमौला व्यक्तित्व देता हैं ऐसा जातक किसी की भी परवाह नहीं करता |


रविवार, 5 जून 2016

“ल्यूकोडर्मा”

ल्यूकोडर्मा

हमारी त्वचा की दो परते होती हैं बाहरी परत व भीतरी परत |भीतरी परत के नीचे के भाग मे मेलानोफोर  नामक कोशिका मे एक तत्व “मेलानिन” होता हैं जिसका मुख्य कार्य हमारी त्वचा को प्राकतिक वर्ण अथवा रंग प्रदान करना होता हैं | जब यह तत्व किसी भी प्रकार से विकृत हो जाता हैं तब “स्वित्र” यानि “ल्यूकोडर्मा” नामक रोग हो जाता हैं जिसे आम बोलचाल की भाषा मे “सफ़ेद दाग” अथवा “फुलेरी” भी कहाँ जाता हैं|

मेलानिन नाम के तत्व त्वचा के भीतर नीचे की सतह मे उत्पन्न होकर ऊपर की ओर आकर त्वचा को प्राकतिक रंग प्रदान करते हैं | त्वचा के जिन भागो मे इस तत्वकी कमी या अभाव किसी भी वजह से होता  हैं तो वह भाग बाहरी त्वचा मे सफ़ेद दाग के रूप मे दिखाई देने लगता हैं | आयुर्वेद मे इस रोग को अनुचित खान पान के कारण होने वाले रोगो की श्रेणी मे रखा गया हैं जिसके अनुसार कफ की अधिकता के कारण त्वचा की छोटी छोटी शिराओ मे अवरोध होने से मेलानिन तत्व उत्पन्न नहीं हो पाता हैं और यह रोग जन्म ले लता हैं |

ज्योतिषीय दृस्टी से देखने पर हमें इस रोग को देखने हेतु निम्न भाव व ग्रहो का अध्ययन करना चाहिए |

भाव-लग्न,षष्ठ व अष्टम भाव

ग्रह-सूर्य,बुध,मंगल,शुक्र व लग्नेश

लग्न भाव हमारे शरीर को दर्शाता हैं हमारे शरीर मे होने वाले किसी भी प्रकार के विकार व बदलाव को हम लग्न पर पड़ने वाले प्रभाव से ही देखते हैं | इसी लग्न से हम सामान्य भौतिक स्वास्थ्य को देखते हैं |

षष्ठ भाव मुख्यत;किसी भी प्रकार के रोगो हेतु इस भाव को अवश्य देखा जाता हैं इसी भाव से बीमारी की अवधि का भी पता चलता हैं, बीमारी छोटी होगी या बड़ी यह भी इसी भाव द्वारा जाना जाता हैं |

अष्टम भाव यह बीमारी के दीर्घकालीन प्रभाव को बताता हैं इसी भाव से बड़ी बीमारी का भी पता चलता हैं |

सूर्य ग्रह- सूर्य को लग्न का व आरोग्य का कारक माना जाता हैं इसी सूर्य से हम व्यक्ति विशेष का तेज व  आत्मविश्वास भी देखते हैं इस बीमारी के होने से व्यक्ति आत्महीनता महसूस करने के कारण आत्मविश्वास खोने लगता हैं | सूर्य का किसी भी रूप मे पाप प्रभाव मे होना या अशुभ होना इस बीमारी का एक कारण हो सकता हैं |

बुध ग्रह- यह ग्रह हमारी बाहरी अथवा ऊपरी त्वचा का कारक माना जाता हैं इसी ऊपरी त्वचा पर इस बीमारी के लक्षण अथवा सफ़ेद धब्बा आने पर बीमारी का पता चलता हैं | किसी भी प्रकार के बाहरी प्रभाव का पता भी इसी त्वचा कारक से चलता हैं इसलिए इस बीमारी मे इसका अशुभ होना अवश्यंभावी हैं |

लग्नेश - शरीर का प्रतिनिधित्व करता हैं इस ग्रह का किसी भी रूप से पीड़ित होना कोई भी बीमारी होने के लिए आवशयक हैं जब तक लग्नेश पीड़ित नहीं होगा शरीर मे बीमारी नहीं हो सकती |

मंगल शरीर मे उन तत्वो का निर्माण करने मे सहायक होता हैं जो त्वचा को रंग प्रदान करते हैं | यही मंगल त्वचा मे किसी भी प्रकार के दाग-धब्बो का कारक भी होता हैं | खुजली खारिश किसी भी प्रकार के फोड़े फुंसी व संक्रमण को इसी मंगल गृह से देखा जाता हैं अत; इसका भी किसी ना किसी पाप या अशुभ प्रभाव मे होना ज़रूरी हैं |

शुक्र ग्रह- यह ग्रह त्वचा की सुंदरता,चमक व निखार का कारक हैं जिस जातक का शुक्र जितना अच्छा होता हैं उसकी त्वचा मे उतनी ही चमक होती हैं इस बीमारी के कारण त्वचा की चमक नहीं रहती जिससे यह ज्ञात होता हैं की शुक्र ग्रह को भी अशुभ या पाप प्रभावित होना चाहिए |
आइए अब इस बीमारी (ल्यूकोडर्मा) को कुछ जन्म पत्रिकाओ मे देखने का प्रयास करते हैं |

1)14-6-1983 11:40 अमरावती,सिंह लग्न की इस कुंडली मे लग्न पर मंगल व लग्नेश सूर्य,त्वचाकारक बुध तथा मंगल पर गुरु वक्री(अष्टमेश)का प्रभाव हैं |शुक्र द्वादशेश चन्द्र संग द्वादश भाव मे शनि द्वारा द्र्स्ट हैं | इस प्रकार सभी अवयव प्रभावित होने से यह जातिका ल्यूकोडर्मा से पीड़ित हैं और इसका इलाज़ करा रही हैं |

2)19-4-1975 19:30 दिल्ली, तुला लग्न की इस कुंडली मे लग्न पर राहू(नक्षत्र) का प्रभाव हैं लग्नेश शुक्र स्वयं अष्टम भाव मे राहू केतू अक्ष व मंगल(शत्रु राशि) द्वारा द्र्स्ट हैं वही त्वचाकारक बुध अस्तावस्था मे केतू के  नक्षत्र मे हैं | सूर्य भी ऊंच का होकर केतू के नक्षत्र मे ही हैं इस प्रकार सभी अवयव प्रभावित होने से जातिका इस रोग से पीड़ित हैं |

3) 2-12-1987 2:30 (हरियाणा) कन्या लग्न की इस कुंडली मे लग्न पर राहू केतू प्रभाव हैं लग्नेश बुध अस्तावस्था मे सूर्य संग शनि से पीड़ित हैं मंगल अस्टमेश(राहू के स्वाति नक्षत्र मे हैं) तथा शुक्र (केतू के मूल नक्षत्र मे) होने से पाप प्रभाव मे हैं | इस प्रकार इस पत्रिका मे भी सभी अवयव प्रभावित होने से यह जातिका भी इस रोग से पीड़ित हैं |

4) 6-9-1936 13:40 गाज़ियाबाद वृश्चिक लग्न की यह कुंडली एक प्रसिद्ध वकील की हैं | पत्रिका मे लग्न पर शनि की दृस्टी हैं लग्नेश मंगल नीच राशि के हैं सूर्य पर शनि का प्रभाव हैं शुक्र नीच राशि मे हैं तथा त्वचाकारक बुध चन्द्र के नक्षत्र मे हैं जो स्वयं षष्ठ भाव मे शनि द्वारा द्र्स्ट हैं | इस प्रकार सभी अवयव के प्रभावित होने से जातक 1985 से इस रोग से पीड़ित रहे हैं |

5) 4-6-1968 19:57 दिल्ली धनु लग्न की इस कुंडली मे लग्न व लग्नेश दोनों केतू के नक्षत्र मे हैं सूर्य,शुक्र व मंगल षष्ठ भाव मे शनि द्वारा द्र्स्ट हैं व त्वचाकारक बुध राहू के नक्षत्र मे हैं | इस जातिका के समस्त चेहरे व शरीर मे यह बीमारी हैं |

6) 28-3-1954 6:04 (तमिलनाडू) मीन लग्न की इस कुंडली मे लग्न व लग्नेश दोनों पर मंगल का प्रभाव हैं (लग्नेश गुरु मंगल के नक्षत्र मे हैं)मंगल स्वयं राहू केतू व शनि के प्रभाव मे हैं सूर्य शुक्र पर भी इसी पापी मंगल का प्रभाव हैं वही त्वचा कारक बुध द्वादश भाव मे राहू के नक्षत्र मे स्थित हैं सभी अवयव प्रभावित होने से जातक को यह ल्यूकोडर्मा रोग हुआ |

7) 2-9-1943 4:20 दिल्ली कर्क लग्न की इस कुंडली मे लग्न राहू केतू प्रभाव मे तथा लग्नेश द्वादशेश बुध संग पीड़ित हैं बुध स्वयं चन्द्र नक्षत्र मे हैं सूर्य शुक्र पर शनि व मंगल की दृस्टी हैं मंगल पर शनि की दृस्टी हैं शनि अस्टमेश भी हैं | इन सभी कारणो से जातक काफी समय से ल्यूकोडर्मा से पीड़ित हैं |

8) 21-1-1993 9:01 गाज़ियाबाद कुम्भ लग्न की इस कुंडली मे लग्न राहू के नक्षत्र मे तथा लग्नेश शनि सूर्य संग द्वादश भाव मे मंगल के नक्षत्र मे हैं शुक्र मृतावस्था मे हैं बुध अस्त व मृतावस्था मे,तथा मंगल स्वयं नीचभिलाषी होकर वक्री अवस्था मे हैं यह जातक सात साल की उम्र से इस बीमारी से पीड़ित हैं |

9) 15-2-1977 00:00 सैंट लुइस (अमरीका) तुला लग्न की इस पत्रिका मे लग्न राहू केतू अक्ष मे लग्नेश शुक्र षष्ठ भाव मे हैं | मंगल और बुध पर शनि का प्रभाव हैं,सूर्य शनि राशि मे हैं | सभी अवयवो के प्रभावित होने से जातिका कई साल से इस रोग से पीड़ित हैं तथा इलाज़ करवा रही हैं |

10) 15-10-1987 2:30 वांकानेर (गुजरात) सिंह लग्न के इस जातक की कुंडली मे लग्न केतू नक्षत्र मे शनि द्वारा द्र्स्ट तथा लग्नेश सूर्य राहू केतू अक्ष मे मंगल संग दूसरे भाव मे हैं | शुक्र व बुध स्वाति नामक राहू नक्षत्र मे हैं तथा अष्टमेश गुरु वक्री द्वारा द्र्स्ट हैं | इन्ही सब कारणो से जातक काफी समय से ल्यूकोडर्मा से पीड़ित हैं |

11) 2-5-1988 23:25 राजामुन्द्री, धनु लग्न के इस जातक की कुंडली मे लग्न मे शनि वक्र अवस्था मे हैं लग्नेश गुरु अस्त हैं, सूर्य पर मंगल द्वादशेश का प्रभाव हैं, त्वचाकारक बुध षष्ठ भाव मे अस्त अवस्था मे हैं तथा शुक्र पर शनि की पूर्ण दृस्टी हैं |इन सभी कारणो से जातक के शरीर के अधिकतर हिस्से मे सफ़ेद दाग अर्थात ल्यूकोडर्मा हैं |

12) 23-11-1983 14:20 कानपुर,मीन लग्न की इस कुंडली मे लग्न पर शुक्र (नीच व अस्ट्मेश) तथा मंगल का प्रभाव हैं वही लग्नेश गुरु सूर्य तथा बुध संग राहू-केतू अक्ष मे पीड़ितवस्था मे हैं | मंगल नीच के शुक्र संग हैं |


इन सभी अवयवो के अलावा हमने कही-कही चन्द्र ग्रह को भी प्रभावित पाया संभवत; जिन जातको के चेहरे पर इस बीमारी के दाग थे उनका चन्द्र ग्रह प्रभावित रहा हो (चन्द्र ग्रह हमारे चेहरे को दर्शाता हैं) एक अन्य तथ्य भी जो हमने प्राप्त किया की शुक्र व बुध की दोनों राशियो मे से कोई ना कोई राशि अवश्य ही पाप प्रभाव मे थी 

गुरुवार, 2 जून 2016

"कारको भाव नाशाय"

कारको भाव नाशाय

ज्योतिष मे ऐसे कई सूत्र हैं जो जातक विशेष को ज्योतिषी द्वारा संतुष्ट नहीं कर पाते हैं ऐसा ही एक सूत्र भावार्थ रत्नाकर मे दिया गया हैं जिसमे कहा गया हैं की कारक ग्रह यदि अपने भाव मे होतो वह अपने फलो की हानी करता हैं जबकि समान्यत: यह माना जाता हैं की अपने भाव मे बैठा ग्रह अपने सभी फलो को प्रदान कर जातक विशेष को शुभता देता हैं |

सूर्य को पिता,आत्मा,सरकार व ऊंच सफलता का प्रतीक माना गया हैं तथा कारकत्व के रूप जिसे लग्न व नवम भाव के कारकत्व दिये गए हैं | इस सूत्र के अनुसार यदि सूर्य नवम मे होगा तो जातक के पिता की आयु कम होगी अथवा जातक को पित्र सुख कम प्राप्त होगा |
यह सूत्र मुग़ल सम्राट औरंगजेब (कुंडली संख्या 1) की पत्रिका मे सही साबित होता हैं जो अपने पिता का आजीवन शत्रु रहा उसकी पत्रिका मे सूर्य नवम भाव मे ही हैं परंतु यह सूर्य अपनी नीच राशि मे होने से उसके पिता की आयु काफी रही अत: यह कहा जा सकता हैं की निम्न सूत्र पूर्ण रूप से लागू नहीं हो रहा हैं |
6/4/1974 12:56 कर्क लग्न में जन्मे इस जातक के माता पिता दोनों जीवित हैं तथा इसके उनसे संबंध भी अच्छे हैं जबकि नवम भाव में पिता सूर्य का अकेले कारक बनकर स्थित है |

12/9/1993 13:41 दिल्ली में जन्मी धनु लग्न में जन्मे जाति का के पिता से संबंध तनावपूर्ण है जबकि सूर्य नवम भाव में स्वराशि का होकर स्थित है |


चन्द्र को मन,माता,भूमि,मित्र,मकान सुख व चतुर्थ भाव का कारकत्व दिया गया हैं सूत्र अनुसार जिस जातक का चन्द्र चतुर्थ भाव मे होगा उस जातक की माँ की आयु कम होगी |

प्रस्तुत दूसरी कुंडली मे जातक की माँ हमेशा बीमार रहती थी,माँ को इस जातक के प्रति लगाव भी नहीं था जातक से उनके संबंध भी ज़्यादा अच्छे नहीं थे तथा उनकी आयु भी कम ही रही इन सबके अतिरिक्त जातक का आजीवन अपना मकान नहीं बन सका जिस कारण सुखो मे कमी भी रही | इसी प्रकार 27/5/1967 14:45 लखनऊ मे जन्मे इस जातक की पत्रिका मे चतुर्थ भाव मे चन्द्र,मंगल,शुक्र शनि व राहु से दृस्ट हैं जातक की माता अब तक जीवित हैं |


मंगल को तीसरे भाव का कारकत्व दिया गया हैं जो जातक के साहस,पुरुषार्थ व भाई इत्यादि हेतु देखा जाता हैं अब यदि मंगल इसी भाव मे होतो जातक का भाई ज़्यादा समय तक जीवित नहीं रहता अथवा होता ही नहीं हैं प्रस्तुत कुंडली संख्या 3 मे ऐसा ही पाया गया जातक का छोटा भाई जल्द ही गुजर गया था जबकि जवाहर लाल नेहरू जी की पत्रिका मे मंगल तीसरे भाव मे होने से उनका छोटा भाई नहीं था | एक अन्य पत्रिका 14/9/1938 23:36 झाँसी मे मंगल तृतीयेश सूर्य संग तीसरे भाव मे हैं जिसपर सप्तमेश वक्री गुरु की दृस्टी हैं जातक के दो छोटे भाई हैं |
14/11/1889 23:03 इलाहाबाद जवाहरलाल नेहरु की पत्रिका में तीसरे भाव में मंगल होने के कारण इनका कोई छोटा भाई नहीं था |

14/1/1988 00:31 बजे वाशिंगटन में जन्मे इस जातक की पत्रिका में भी तीसरे भाव में मंगल है परंतु 1990 में इसका छोटा भाई हुआ कारक ने यहां फलों का नाश नहीं किया है |


जब गुरु ग्रह 2 अथवा 5 भावो मे होता हैं जो धन,संतान व बुद्दि से संबन्धित भाव होते हैं तो इन भावो के कारकत्वों की हानी करता हैं प्रस्तुत कुंडली संख्या 4 के जातक की कोई संतान नहीं थी तथा नवम भाव मे ऊंच के सूर्य होने के बावजूद पिता अधिक समय तक जीवित नहीं रहा था | एक अन्य पत्रिका मे हमने पाया की जातक के पंचम भाव मे ऊंच का गुरु होने के बावजूद जातक का पुत्र जीवित नहीं बचा था उसकी 3 कन्या संताने जीवित रही थी जबकि राहू दशा मे पुत्र हुआ था परंतु कुछ ही समय बाद गुजर गया था |

27/10/1926 3:30 पर लॉस एंजेलिस में कन्या लग्न में जन्मे राष्ट्रपति निक्सन के मुख्य अधिकारी की पत्रिका में पंचम भाव में गुरु होने पर भी उन्हें दो बेटे और दो बेटियों का सुख प्राप्त हुआ पंचमस्थ गुरु ने नीच होकर भी अपने कारक भाव की हानि नहीं करी |


शुक्र को कलत्र व वाहन का कारकत्व प्रदान किया गया हैं अर्थात जब शुक्र चतुर्थ व सप्तम भाव मे होगा तो इन भावो से संबन्धित फलो मे हानी करेगा चन्द्र चतुर्थ भाव ( कुंडली संख्या 2 ) वाले जातक की पत्रिका मे शुक्र भी चौथे भाव मे ही हैं जातक के पास कोई भी वाहन नहीं था |

प्रस्तुत कुंडली संख्या 5 श्री चैतन्य जी की इस पत्रिका मे मे जातक की पहली पत्नी गुजर गयी थी तथा जातक ने धर्म मार्ग के चलते इन्होने घर व अपनी दूसरी पत्नी को स्वयं छोड़ दिया था सूत्र के अनुसार शुक्र सप्तम भाव मे होने से जातक की पत्नी की आयु कम होती हैं तथा पत्नी से जातक के संबंध उसके स्वास्थ्य (मासिक धर्म की परेशानी ) के चलते ठीक नहीं होते वैवाहिक जीवन असामान्य होता हैं यह सभी बातें इस पत्रिका मे स्पष्ट पायी जा रही हैं | 

ऐसा ही प्रभाव राजकुमारी डायना (1/7/1961 17:00 लंदन ) की पत्रिका का भी हैं उनके सप्तम भाव मे शुक्र होने से उन्हे वैवाहिक सुखो मे कमी ही रही,तलाक हुआ तथा कई अन्य पुरुषो से संबंध भी बने |

11/12/1966 18:30 अजमेर राजस्थान में मिथुन लग्न में जन्मे इस जातक की पत्रिका में शुक्र सप्तम भाव में है जिस कारण इसका पत्नी से हमेशा तनाव रहता है तथा इसके दो पुत्र और एक पुत्री है और आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं है |


4/8/1932 16:00 मध्य प्रदेश खंडवा में जन्मे धनु लग्न के किशोर कुमार के सप्तम भाव में शुक्र होने के कारण इन्होंने चार विवाह किए जबकि कारक शुक्र यहां अपनी मित्र की राशि में बैठा है |

परंतु शनि इस सूत्र का अपवाद दर्शाते हैं शनि को अष्टम भाव का कारकत्व प्रदान किया गया हैं जो आयु का भाव होता हैं इस भाव मे बैठे शनि जातक को बहुत बड़ी आयु प्रदान करते हैं साधारणत: ऐसे जातक की आयु 80 वर्ष के आस पास पायी जाती हैं | 
प्रस्तुत पत्रिका कुंडली संख्या 6 का स्वामी भी 89 वर्ष तक जीवित रहा |

18/9/1929 21:50 इंदौर में जन्मी लता मंगेशकर की पत्रिका में शनि अष्टम भाव में है परंतु इनकी आयु बहुत अच्छी रही है जिससे शनि ने कारक भाव का नाश नहीं किया है |

28/12/1952 मीन लग्न में जन्मे अरुण जेटली की पत्रिका में शनि सप्तम भाव में है इनकी आयु भी सब जानते ही हैं |

पूर्व राष्ट्रपति गुलजारी लाल नंदा 4/7/1818 मेष लग्न |

पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर 17/01/1927 मेष लग्न |

पूर्व प्रधान राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी 11/12/1935 कर्क लग्न |


पी चिदंबरम 16/9/1945 वृश्चिक लग्न इन सब की पत्रिका में शनि अष्टम भाव में है और इनकी आयु के विषय में सब जानते ही हैं |

इन सभी पत्रिकाओ मे शनि को छोड़कर सभी ग्रहो के लिए यह कारको भाव नाशाय वाला सूत्र सही साबित होता प्रतीत होता हैं परंतु ऐसी भी कई पत्रिकाए हैं जिनमे यह सूत्र बिलकुल सही साबित नहीं होता हैं कई पत्रिकाओ का अध्ययन करने के बाद यह पाया गया की कारक यदि नीच,निर्बल अथवा शत्रु प्रभाव मे होतो वह अपने कारक भाव के शुभफल प्रदान करता हैं | लाल बहादुर शास्त्री की पत्रिका मे वक्री गुरु पंचम भाव शुक्र से दृस्ट हैं सभी जानते हैं की उनके दो पुत्र थे यहाँ प्रस्तुत एक अन्य पत्रिका कुंडली संख्या 7 इसका एक अनुपम उदाहरण हैं प्रस्तुत जातक विदेश से डिग्री प्राप्त लेक्चरार हैं जिसके 3 पुत्र हैं इनकी पत्रिका मे नीच का गुरु पंचम भाव वक्री अवस्था मे हैं | ऐसा ही इस 8 संख्या वाली पत्रिका मे शुक्र के लिए पाया गया प्रस्तुत पत्रिका के जातक की पत्नी सुंदर अच्छी व दीर्घायु रही हैं जबकि शुक्र सप्तम भाव मे सूर्य व राहू संग हैं एक अन्य स्त्री (5/5/1963 16:40 भटिंडा ) जिसके सप्तम भाव मे ऊंच शुक्र गुरु संग हैं तथा शनि व चन्द्र से दृस्ट हैं आज तक सुखमय वैवाहिक जीवन जी रही हैं | भावार्थ रत्नाकर मे यह भी कहा गया हैं की यदि कारक की कारक स्थान के स्वामी से युति होतो बहुत शुभ फल प्राप्त होते हैं अर्थात यदि सूर्य की नवमेश से युति होतो जातक के पिता की आयु बढ़ जाती हैं ऐसा हमने सही पाया भी हैं |

कई अन्य कुंडलियों को देखने पर यह भी पाया गया की कारक ग्रह यदि अपने कारक भाव मे हो परंतु पाप ग्रह के नक्षत्र मे हो तो उस पाप ग्रह के नक्षत्र मे जो अन्य ग्रह रहे हैं उन्होने भी कारक ग्रह की दशा मे अपना शुभाशुभ प्रभाव दर्शाया हैं जैसे मंगल जब तीसरे भाव मे पाप ग्रह के नक्षत्र मे था और मंगल के नक्षत्रो मे अन्य ग्रह थे उन्होने मंगल दशा मे अपनी अपनी अंतर्दशा मे जातक को भाई बहनो से संबन्धित हानी ही पहुंचाई थी इसी प्रकार पंचम भाव मे गुरु के तथा सप्तम भाव मे शुक्र के होने पर जातक विशेषो को संतान व पत्नी संबन्धित कष्ट कारक ग्रहो की दशा मे ही प्राप्त हुए थे |

अत: यह सपष्ट हैं विभिन्न ज्योतिष ग्रंथो पर आधारित सूत्र “कारको भाव नाशाय” पूर्णतया सत्य नहीं हैं | कारक अपने भाव का कुछ हद तक नाश तो करता हैं परंतु यदि कारक नीच,वक्री,कारक स्वामी संग अथवा शत्रु प्रभाव मे होतो शुभता भी देता हैं साथ साथ कारक ग्रहो के नक्षत्रो मे स्थित ग्रहो का भी प्रभाव भी कारक ग्रह के फल प्रदान करने मे अवश्य रहता हैं |